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Misguided youth भ्रमित युवा

Misguided youth

युवा जीवन कर्तव्यों से परिपूर्ण है, जिसका पालन करना युवा वर्ग का धर्म है। यथा सर्वप्रथम पारिवारिक सदस्यों की आवश्यकताओं, मान, सम्मान को ध्यान में रखना, देश के गौरव की रक्षा करना, विश्व में इसकी बेहतर छवि का निर्माण करना, समाज की परम्पराओं की रक्षा करना, स्वच्छ राजनीतिक वातावरण के निर्माण हेतु संघर्ष करना, अध्ययन के प्रति सजग रहना, नशाखोरी की प्रवृत्ति से बचकर रहना, परन्तु आज का युवा वर्ग इन कर्तव्यों से विमुख होता जा रहा है।

वर्तमान में युवा वर्ग में जितना अधिक भटकाव दिखाई दे रहा है जो शायद ही पहले कभी उसमें था। युवा वर्ग के दिग्भ्रमित होने का अर्थ है कि युवा वर्ग को अपने मूल उद्देश्यों, नैतिक कर्तव्यों तथा उचित मार्ग से विमुख होकर अनुचित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु अवांछित कार्यों का आश्रय लेते हुए गलत मार्ग पर कदम बढ़ाने लगना। सही दिशा की ओर बढ़ने की अपेक्षा अनेक गलत दिशाओं की ओर उन्मुख होना। आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके कारण हमारा युवा वर्ग कर्तव्यों को भूलकर दिग्भ्रमित हो गया है ? उसके चेतन शून्य होने के क्या कारण हैं ? युवकों में भ्रष्ट आचरण की प्रवृत्ति तथा चारित्रिक पतन जिस प्रकार दृष्टिगोचर हुआ है, यह स्थिति मुख्य रूप से सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों में आए अवमूल्यन के कारण उत्पन्न हुई है।

दूरदर्शनी संस्कृति, फिल्मी अश्लीलता, आदर्श नेतृत्व का अभाव ही युवाओं को भ्रष्टता, चारित्रिक पतन और विचार शून्यता की ओर ले जा रहे हैं। युवा वर्ग में निराशा व कुण्ठा का मुख्य कारण है- बेरोजगारी। आरक्षण नीति ने अनेक प्रतिभा सम्पन्न युवक-युवतियों को बेरोजगार व परावलम्बी बना दिया है। इस कारण अपनी इच्छाओं व महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति हेतु युवा वर्ग छोटे रास्ते ढूंढ़ता है। यह वर्तमान में उपस्थित उपभोक्ता संस्कृति से उत्पन्न मानसिकता है। जिससे प्रेरित होकर हमारे युवक अधिकार व धन पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।

युवाओं का चारित्रिक पतन एवं भ्रष्ट आचरण के अकल्पनीय कुकृत्य आज समाज में प्राय: आये दिन सुनने को व देखने को मिल रहे हैं। इन युवाओं के मन व मस्तिष्क में कुत्सित मनोवृत्ति इतनी अधिक घर कर गई है कि इनके व्यवहार से अश्लीलता स्पष्ट झलकती है। इस अश्लीलता के लिए नशीले पदार्थों का सेवन, फैशन परस्ती आदि भी कम उत्तरदायी नहीं हैं। परम्परागत मूल्यों का ह्रास भी युवाओं में भटकाव का प्रमुख कारण है। आज का युवक पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से पूर्णतया प्रभावित है। इस सभ्यता ने उनके वेशभूषा व रहन-सहन पर भी प्रभाव डाला है। आज की युवतियों के इस तरह के वस्त्र होते हैं, जिनसे उनके उत्तेजक एवं अर्द्धनग्न नजर आने वाले परिधानों के कारण मनचले युवकों में कुत्सित भावनाओं को बढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ है। इसके फलस्वरूप अश्लीलता से अन्य युवा भी भ्रष्ट हुए हैं। मनोरंजन के साधनों में पाश्चात्य अंधानुकरण होने से भटकाव आना स्वाभाविक है। देश में अशिक्षित व्यक्तियों की संख्या अधिक है। साथ ही स्त्रियों की स्थिति और भी शोचनीय है। अशिक्षित व्यक्ति की मानसिकता संकुचित होती है। यौन शिक्षा का अभाव भी युवाओं में भटकाव का मुख्य कारण है। सकारात्मक यौन शिक्षा के अभाववश उनके मन में विपरीत लिंग के प्रति उत्तेजना व जिज्ञासा बनी रहती है। इस जिज्ञासा की पूर्ति के लिए वे गलत मार्ग की ओर अग्रसर हो जाते हैं।

शिक्षा-पद्धति में राजनीति के दाँव-पेंच का समावेश होने से शिक्षण संस्थाओं में आये दिन हड़ताल बनी रहती है। इस कारण छात्र-छात्राओं को जो सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त होना चाहिए वह प्राप्त नहीं हो पाता और वे आधा-अधूरा ही ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं।

सृजनात्मक एवं रचनात्मक प्रवृत्ति का ह्रास युवाओं में देखने को मिल रहा है। युवक ही नहीं युवतियां भी नशे का शिकार हो रही हैं। युवक निरुद्देश्य घूमते हुए सिगरेट पीते हुए दिखाई देते हैं। आज युवक लूट, अपहरण, हत्या आदि अपराध करने में भी संकोच नहीं करते। इन कृत्यों में युवतियां भी उनकी सहभागी रहती हैं। युवतियों द्वारा कालगर्ल शिप के रूप में वेश्यावृत्ति को अपनाना आम बात हो गई है। चरित्र युवा वर्ग का संचित वह धन है जो शाश्वत है, स्थाई है, परन्तु यह अत्यधिक शर्म का विषय है कि जिस युवा वर्ग से हमें स्वर्णिम भविष्य की आशा है वही आज व्यथित है तथा भ्रमित हैं।

अंधकार के गर्त में डूबे हुए देश को युवा वर्ग ने ही ऊषा काल के सूर्य के समान, जन-जन को संचरित कर उस अंधकार को तिरोहित किया है। भारत वर्ष को आगे ले जाने वाला यह वर्ग ही अपने मूल उद्देश्य से भटक जाये तो देश की इससे अधिक घातक स्थिति और क्या हो सकती है।

बढी हुयी आक्रोश की भावना के ही परिणाम है कि आज देश में हत्या, बलात्कार, डकैती आदि की बाढ़ सी आ गई है। आतंकवाद भी इससे अछूता नहीं रहा है। वोटों की राजनीति और बेरोजगारी की समस्या ने हमारे देश में असंतुष्ट युवकों की एक सेना तैयार कर दी है।

युवाओं में इस भटकाव की स्थिति को रोकने के लिए इस वर्ग की शिक्षा में पुरातन, भव्य और उत्कृष्ट परम्परागत मूल्यों का समावेश होना चाहिए। माता-पिता व अभिभावकों का भी यह कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों को अपनी संस्कृति से सम्बन्धित परम्परागत मूल्यों से अवगत कराएँ। ये दुर्लभ कार्य सिद्धान्तों से ही नहीं होगा बल्कि स्व आचरण द्वारा इन बच्चों के कोमल मस्तिष्क पर अंकित कर सकते हैं तभी वे आगे चलकर अपने राष्ट्र व धर्म के प्रति कर्तव्यपरायण व निष्ठावान बन सकते हैं।

इस भटकाव पर नियंत्रण करने के लिए सर्वप्रथम पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण करना छोड़ना होगा। हमारे देश में व्याप्त मनोरंजन के साधनों को भी हमारी भारतीय संस्कृति के अनुकूल होना होगा।

इसके अतिरिक्त निर्धनता, बेरोजगारी आदि समस्या की ओर भी सरकार को समुचित कदम बढ़ना होगा। शिक्षा का प्रसार, युवाओं का दृढ़ संकल्प, महत्वाकांक्षाओं को भी युवाओं का अपने ऊपर हावी न होने देना, साथ ही मेहनत, ईमानदारी, संयम व लगन से ही स्वर्णिम भविष्य निर्माता बन सकता है, आधुनिक दिग्भ्रमित युवक।

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