alessays

Let's explore our knowledge!

Gita rahasya सप्तम स्कंध

Gita rahasya सप्तम स्कंध

छठे स्कंध में पुष्टि अनुग्रह की कथा कही गई थी। भगवत अनुग्रह के पश्चात विकार वासना को नष्ट करके अनुग्रह का यदि सदुपयोग किया जाए तो तभी वह पुष्ट हो जाता है। सेवा स्मरण में तन्मय बनकर ही जीव पुष्ट हो सकता है। ठाकुर जी कई जीवो पर अनुग्रह करते हैं किंतु उस अनुग्रह के सदुपयोग करने की विधि जीव जानता ही नहीं है परिणामतः जीव पुष्ट तो बन नहीं पाता अपितु दुष्ट बन जाता है। अब हम हिरण्य कश्यप और प्रहलाद की कथा सुनें। हिरण कश्यप दैत्य बना और प्रहलाद देव बना। हिरण्यकशिपु ने सारी संपत्ति का उपयोग भोग विलास के लिए किया अतः वह दैत्य बना। प्रहलाद ने समय तथा शक्ति का उपयोग प्रभु की भक्ति करने में किया अतः वह देव बन गया। सातवें स्कंध में वासना के तीन प्रकार बताए गए हैं- 1. असद वासना, 2.सद्वासना, 3. मिश्र वासना। इस सातवें स्कंध के आरंभ में परीक्षित राजा ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा है। आप कहते हैं कि ईश्वर सर्वत्र हैं और वह समभाव से व्यवहार करता है यदि ऐसी ही बात है तो जगत में यह विषमता क्यों दृष्टिगोचर हो रही है। चूहे में भी ईश्वर है और बिल्ली में भी तो फिर बिल्ली चूहे को क्यों मार कर खाती है। भगवान यदि सम है तो जगत में विषमता क्यों उत्पन्न करते हैं। यदि वे समभावी हैं तो फिर बार-बार देवों का पक्ष लेकर वे दैत्यों को क्यों मारते हैं। यदि वे ईश्वर है तो फिर भी विषमता क्यों करते हैं। भगवान की दृष्टि में यदि सभी प्राणी समान है तो उन्होंने इंद्र के लिए वृत्रासुर का वध क्यों किया। मैं मानता था कि देत्य तो पापी हैं अतः हरि उनकी हत्या करते हैं किंतु वृत्रासुर तो भगवत् भक्त था फिर उसकी उन्होंने हत्या क्यों की। शुकदेव जी कहते हैं राजन क्रिया में भले ही कदाचित विषमता हो भी जाए किंतु भाव में तो नहीं ही होनी चाहिए। समता अद्वैतभाव में ही होती है क्रिया में वह संभाव्य नहीं है। क्रिया में तो विषमता ही रहेगी अतः भाग में समता रखनी चाहिए। घर में माता, पत्नी, संतान आदि होते हैं। पुरुष इन सभी के प्रति प्रेम तो एक समान ही रखता है किंतु सभी के साथ एक समान बर्ताव नहीं कर सकता। वह माता को तो वंदन कर सकेगा पर पुत्री को नहीं। प्रेम आत्मा के साथ होता है देह के साथ नहीं। भावना के क्षेत्र में अद्वैतभाव होना ही चाहिए। समदर्शी बनना है समव्यवहारी नहीं। समव्यवहारी होना तो संभव ही नहीं है। शंकराचार्य ने आज्ञा दी है- भावाद्वैतं सदा कुर्यात् क्रियाद्वैतं न कर्हिचित्। भागवत को आधिभौतिक साम्यवाद साम्यवाद मान्य नहीं है, मात्र आध्यात्मिक साम्यवाद ही मान्य है। राजन तुम्हें लगता है कि देवों का पक्ष लेकर भगवान ने असुरों का नाश किया परंतु उन्होंने यह संहार तो उन असुरों पर कृपा करने के हेतु से ही किया था। एक दृष्टांत सुनो। एक चोर चोरी करने के हेतु घर से निकला किंतु मार्ग में ठेस लगने के कारण वह गिर पड़ा और उसका एक पांव टूट गया। इस कारण वह चोर चोरी ना कर सका। यह भगवान की कृपा थी या अवकृपा। इसे कृपा ही समझनी चाहिए पैर तो टूट गया किंतु उसके कारण वह पाप तो ना कर सका। राजन जैसे तुम होगे ईश्वर का रूप भी तुम्हें वैसा ही दिखाई देगा। ईश्वर का कोई एक निश्चित स्वरूप नहीं है जीव जिस भाव से उन्हें देखता है उसके लिए वे वैसे ही बन जाते हैं। वल्लभाचार्य कहते हैं कि ब्रह्म ईश्वर लीला करते हैं, अतः वे अनेक रूप धारण करते हैं। शंकराचार्य कहते हैं कि ब्रह्म सर्व व्यापक और निर्विकार हैं, उस ब्रह्म की कोई क्रिया नहीं है। कलश में रखा हुआ जल तो बाहर निकल निकाला जा सकता है किंतु अंदर समाया हुआ अवकाश या आकाश नहीं। ईश्वर को कोई बाहर नहीं निकाल सकता। ईश्वर में माया से इस क्रिया का अध्यारोप किया गया है। यह वेदांत का सिद्धांत है। माया की क्रिया ईश्वर के अधिष्ठान में आभासित होती है। लोग गाड़ी में बैठकर अहमदाबाद जाते हैं। गाड़ी के अहमदाबाद पहुंचने पर कहते हैं कि अहमदाबाद आ गया किंतु यह आने की क्रिया उस नगर की नहीं गाड़ी की ही है। ईश्वर निराकार रूप से सर्वत्र व्यापक है। ईश्वर यदि किसी स्थान पर आवागमन करेगा तो उन्हें सर्वव्यापक कैसे कहा जा सकेगा। किसी भी स्थान पर किसका अभाव ना हो उसे ही सर्वव्यापी का कहा जा सकता है। आचार्य शंकर का मत है कि ईश्वर निष्क्रिय है। माया के कारण ही उनमें क्रिया का वास होता है पर वास्तव में भगवान कुछ भी नहीं करते अतः उनमें विषमता नहीं है। अग्नि निराकार है फिर भी जब लकड़ी जलती है तो लकड़ी जैसा ही आकार अग्नि का आभासित होता है, उपाधि के कारण आकार का भास होता है। परमात्मा का वास्तविक स्वरूप व्यापक निराकार और आनंद रूप है। आचार्य शंकर का यह सिद्धांत है। महाप्रभु जी का सिद्धांत भी दिव्य है। वैष्णव मानते हैं कि ईश्वर की अक्रियात्मकता की बात बराबर ही है। ईश्वर क्रिया तो नहीं कर सकते किंतु लीला करते हैं। ईश्वर निष्क्रिय हैं यह बात सच है किंतु यह भी उतना ही सच है कि वे लीला करते हैं। जिस क्रिया में क्रिया का अभिमान नहीं होता वही लीला है। ईश्वर से स्वेच्छा से लीला करते हैं। मैं करता हूं ऐसी भावना के बिना निष्काम भाव से जो किया जाए वही लीला है। केवल अन्य को सुखी करने की भावना से जो किया की जाए वही लीला है। कृष्ण का कार्य लीला है। ईश्वर को सुख की इच्छा नहीं है, कन्हैया चोरी तो करता है किंतु औरों की भलाई के लिए ही। क्रिया बंधन कारक है लीला मुक्ति दायक। जीव जो कुछ करता है वह क्रिया ही है क्योंकि उसकी हर क्रिया के पीछे स्वार्थ, वासना और अभिमान होते हैं। दोनों सिद्धांत सत्य है। ईश्वर निराकार निर्विकल्प है और माया क्रिया करती है। यह सिद्धांत भी दिव्य है। ईश्वर कुछ भी नहीं करते किंतु उनमें क्रिया का अध्यारोप किया जाता है। माया के कारण ईश्वर के व्यवहार में विषमता का भास होता है। ईश्वर परिपूर्ण सम है। परमात्मा सम है और जगत विषम। समता ईश्वर की है। विषमता माया की है। यों तो ईश्वर सम है किंतु माया के कारण उसमें विषमता दिखाई देती है। ईश्वर के अधिष्ठान में माया पूजा करती है अतः माया जो भी क्रिया करती है उसका आरोप ईश्वर पर भी किया जाता है। दीपक स्वयं तो कुछ नहीं करता किंतु उसकी अनुपस्थिति में भी तो कुछ नहीं किया जा सकता। भगवान दैत्य को मारते नहीं तारते (उद्धार करते) हैं। विषमता क्रिया में है, भाव में नहीं। भगवान दैत्यों को मारते हैं किंतु उनके प्रहार में भी प्रेम भरा हुआ होता है। सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण प्रकृति के हैं, आत्मा के नहीं। जीव के उपभोग के लिए शरीरसर्जन की इच्छा जब भगवान करते हैं तो रजोगुण के बल में वृद्धि करते हैं। जीवो के पालन के हेतु वे सत्वगुण के बल में और संहार के लिए तमोगुण के बल में वृद्धि करते हैं। राजन जो प्रश्न आपने मुझसे पूछा वही प्रश्न आपके पितामह ने नारद जी से पूछा था। राजसूय यज्ञ में प्रथम श्री कृष्ण की पूजा की जो शिशुपाल को मान्य नहीं हुई अतः वह भगवान की निंदा करने लगा वैसे तो भगवान लंबे अरसे तक निंदा सहते रहे किंतु अंत में उन्होंने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का मस्तक उड़ा दिया। उसके शरीर में से बाहर आया हुआ आत्मतेज द्वारिकाधीश में विलीन हो गया और शिशुपाल को मुक्ति मिली। इस प्रसंग को देखकर युधिष्ठिर को आश्चर्य हुआ उन्होंने पूछा भगवान शत्रुत्व होने पर भी शिशु पाल को सद्गति क्यों प्राप्त हुई। उन्होंने भगवान को गालियां दी, फिर भी वह नरकवासी क्यों ना हुआ। ऐसी सायुज्य गति उसे क्यों मिली। भगवान से द्वेष करने वाले शिशुपाल और दंतवक्त्र नरकवासी होने चाहिए थे तो ऐसी उल्टी बात क्यों हो गई। नारद जी ने कहा श्रवण करो राजन। परमात्मा में किसी भी प्रकार तन्मय होने की आवश्यकता है। परमात्मा ने कहा है जीव चाहे जिस किसी भाव से मेरे साथ तन्मय बने मैं उसे अपने स्वरुप का दान करता हूं। राजन किसी भी भाव से मन परमात्मा के साथ एकाकार होना चाहिए। जिस प्रकार भक्ति के द्वारा ईश्वर में मन लगा कर कई मनुष्य परमात्मा की गति को पा सके हैं वैसे ही काम, द्वेष, भय या स्नेह के द्वारा भगवान से नाता लगाकर सही व्यक्ति सद्गति पा गए हैं। गोपियों ने मिलन की तीव्र कामना से, कंस ने भय से, शिशुपाल आदि कुछ राजाओं ने द्वेष से, यादव ने पारिवारिक संबंध से, आपने स्नेह और हमने भक्ति से अपने मन को भगवान से जोड़ लिया है। कुछ गोपियां कृष्ण को काम भाव से भजती थी। श्रीकृष्ण का स्वरूप देख कर भले ही उनके प्रति काम भाव जाग जाए किंतु जिस का ध्यान करते हैं वह तो निष्काम है। निष्काम कृष्ण का ध्यान करती हुई गोपियां भी निष्काम हो गए किंतु जगत के स्त्री पुरुषों का ध्यान काम भाव से करोगे तो नर्क में जाओगे। श्री कृष्ण के प्रति काम भाव रखकर उनका चिंतन करती हुई गोपियां निष्काम बनी रहीं। परमात्मा के पूर्ण निष्काम होने के कारण उन्हें अर्पित किया गया काम भी निष्काम बन गया। काम का जन्म रजोगुण में से होता है। ईश्वर बुद्धि से परे है। ईश्वर के पास काम नहीं जा सकता, सूर्य के पास अंधकार नहीं जा सकता। जिनका चिंतन किया गया था वह श्रीकृष्ण निष्काम होने के कारण उनका काम भाव से चिंतन करने वाली गोपियां भी निष्काम बन गईं। कंस डर के मारे तन्मय हो गया था। उसे देवकी का आठवां पुत्र ही हमेशा दिखता रहता था। शिशुपाल अपने शत्रु के रूप में भगवान का चिंतन करता था। इस प्रकार ईश्वर में किसी भी भाव से तन्मय होना चाहिए। अतः हर किसी व्यक्ति को चाहिए कि वह श्रीकृष्ण से मन जोड़ ले। यह शिशुपाल साधारण व्यक्ति नहीं था वह तो विष्णु भगवान का पार्षद था। नारद जी ने जय विजय के तीन जन्म की कथा सुनाई। जय और विजय पहले जन्म में हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यपु बने, दूसरे में रावण और कुंभकरण और तीसरे जन्म में शिशुपाल और दंतवक्त्र बने। नारद जी ने हिरण कश्यप और प्रहलाद की कथा का आरंभ किया। वे कहने लगे की दिति के 2 पुत्र थे- हिरण्यकश्यपु और हिरण्याक्ष। वराह भगवान ने हिरण्याक्ष का वध किया था। धर्मराजा ने नारद जी से प्रार्थना की- मैं प्रह्ला की कथा विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूं। वे महान भगवद्भक्त थे फिर भी हिरण्यकशिपु ने उन्हें क्यों मारना चाहा। नारद जी ने कहा दिति वस्तुतः भेदबुद्धि है। भेद बुद्धि से हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु- ममता और अहंकार उत्पन्न होते हैं। ये ‘मैं’ और ‘मेरा’ भेद बुद्धि की संताने हैं। सभी दुखों का मूल भेद बुद्धि है और सभी सुखों का मूल अभेदभाव है। शरीर से नहीं अपितु बुद्धि से यदि अभेदभाव स्थापित हो सके तो सभी के प्रति समबुद्धि हो सकती है। अहंकार को मारना कठिन है। विवेक से ममता का तो नाश हो सकता है किंतु अहंभाव का नहीं पर यदि अर्पण करने वाला व्यक्ति अपना मेरापन भी प्रभु को अर्पित कर दे तो ठाकुर जी कृपा करते हैं। मुझ में अभिमान नहीं है ऐसा मानना भी अभिमान ही है। हिरण्यकशिपु अहंकार का रूप है उसका व्यवहार ही ऐसा है कि जिससे देवों को, ज्ञानी पुरुषों को और अन्य सभी को कष्ट होते हैं अभिमान सभी को सताता और रुलाता है। ममता तो शीघ्र मर जाती है किंतु अहंकार शीघ्र मरता नहीं है उसे मारना बड़ा कठिन है, वह ना तो रात को मरता है ना तो दिन में, वह ना तो घर के अंदर मरता है और ना तो घर के बाहर, वह घर के बाहर भी होता है और अंदर भी, वह ना तो शस्त्र से मरता है और ना तो अस्त्र से। उसे मध्य स्थान में ही मारना पड़ता है। मनुष्य यदि अहंकार को नष्ट कर दे तो वह ईश्वर से दूर नहीं रहेगा। अभिमान अंदर ही समाया हुआ रहता है। मनुष्य को दुख देने वाला यही है। इस अहंकार को मारना है। वह दरवाजे की देहली पर ही मरेगा। रास कथा में कहा गया है कि हर दो गोपियों के बीच में (साथ में) श्रीकृष्ण है। इस प्रकार यदि तुम दो वृत्तियों के बीच में श्रीकृष्ण को रखोगे तो तुम्हारे अहंकार का नाश होगा। एक संकल्प के समाप्त होने तथा दूसरी वृत्ति के उत्पन्न होने के पहले यदि कृष्ण को रखोगे तो तुम्हारे अहंकार का नाश होगा। प्रत्येक इंद्रिय का मिलन जब तक परमात्मा के साथ नहीं हो पाता तब तक अहंकार बना ही रहता है। पुरुष ईश्वर स्मरण में तन्मय हो जाए और अन्य किसी भेद का अस्तित्व ना रहे तो अहंकार की मृत्यु अवश्य होगी। ज्ञान सुलभ है किंतु जब तक अहं और ममता नष्ट ना हो पाए तब तक ज्ञान शोभा नहीं देता। हिरण्यकशिपु ज्ञानी तो था किंतु उसका ज्ञान अहं भाव और ममता से भरा हुआ था। अपने भाई की मृत्यु के अवसर पर ही उसने ब्रह्मोपदेश किया। जो औरों को उपदेश दे और स्वयं उसे अपने जीवन में न उतारे वह असुर है। हिरण्यकशिपु अन्य मानवों को तो ज्ञान उपदेश देता था किंतु स्वयं यह सोचता था कि मेरे भाई के हत्यारे विष्णु से मैं कैसे बदला लूं। एक गृहस्थ के पुत्र की मृत्यु हो गई तो किसी साधु ने उपदेश दिया कि यह संसार मिथ्या है कुछ दिनों के पश्चात उसी साधु की एक भैंस मर गई तो वह रोने लगा ना जाने इस समय उसका ज्ञान कहां हवा हो गया। उस गृहस्थ ने आकर साधु से पूछा कि अब आप क्यों रो रहे हैं तो साधु ने कहा कि वह पुत्र तो तेरा था मैंने तुझे उपदेश दिया किंतु यह भैंस तो मेरी थी अतः रो रहा हूं। जब तक अहम भाव और ममता विद्यमान है तब तक ज्ञान का पाचन नहीं हो पाता। भक्ति से रहित ज्ञान शाब्दिक ही रह जाता है अतः उस ज्ञान से जीव को कोई लाभ नहीं होता। वैराग्य और भक्ति के अभाव में ज्ञान का अनुभव नहीं हो पाता। कोई व्यक्ति बातें तो तो वेदांत और ब्रह्म ज्ञान की करें किंतु प्रेम सांसारिक विषयों के साथ करें तो समझो कि वह दैत्य ही है। वह दैत्य वंश का है। हिरण्याक्ष की मृत्यु का समाचार सुनकर हिरण्यकशिपु ने कहा कि मैं अपने भाई के हत्यारे विष्णु से युद्ध करूंगा। उसने माता दिति को कई प्रकार के उपदेश भजन सुनाकर संतुष्ट किया। उसने सोचा कि मैं विष्णु से अभी युद्ध नहीं करूंगा, पहले वरदान प्राप्त करके अमर हो लूं फिर युद्ध करूं। हिरण्यकशिपु तपस्या करने के लिए चला परंतु उसकी पत्नी कयाधु ने पूछा कि वापस कब आलोगे तो उसने उत्तर दिया कि कुछ निश्चित नहीं है। मैं दस हजार वर्षों तक तक तपस्या करूंगा तप से अनेक सिद्धियां प्राप्त करके ही घर वापस आऊंगा। यह कथा भागवत में नहीं है व्यास जी ने विष्णु पुराण में यह कथा लिखी है। हिरण्यकशिपु की तपस्या का वृतांत जानकार देवों ने बृहस्पति से प्रार्थना की आप हिरण्यकशिपु की तपस्या में बाधा उपस्थित कीजिए। यह सुनकर बृहस्पति तोते का रूप धारण करके मंदराचल पर्वत पर आए और जहां हिरण्यकशिपु तपस्या करने बैठा हुआ था वही किसी वृक्ष पर बैठकर नारायण नारायण की का जप करने लगे जैसे ही हिरण्यकशिपु मंत्र का आरंभ करता कि तुरंत ही वह तोता नारायण की रट लगाना शुरू कर देता। यह देखकर हिरण्यकश्यप ने सोचा कि विष्णु की हत्या करने के लिए तो वह तपस्या कर रहा है। यह तोता कहां से इधर आया हटता ही नहीं है। आज तपस्या करने के लिए शुभ दिवस नहीं है। वह सोचकर वह थक कर सायं काल को घर वापस लौट गया। कयाधु को आश्चर्य हुआ कि मेरा पति आज ही क्यों वापस आ गया पर वह पति से यह बात कैसे पूछे क्योंकि वह क्रोधी जो था। शायद वह कह दे कि तुझे क्या लेना देना है। कयाधु ने सोचा कि मैं किसी युक्ति से ही पूछ लूंगी। उसने रसोईघर के सेवकों से कहा कि आज मैं स्वयं ही रसोई बनाऊंगी। पति की गुप्त बातें जाननी हो तो कयाधु के रास्ते पर चलो, भोजन में बड़ा वशीकरण होता है। लोभी को द्रव्य से वश में करो और अभिमानी को प्रशंसा से। हिरण्यकशिपु अभिमानी था अतः उसकी पत्नी उसकी सेवा करते हुए उसकी प्रशंसा करने लगी। राजा भोज ने एक बार कालिदास से पूछा कि चीनी से भी अधिक मीठी वस्तु कौन सी है कालिदास का उत्तर था प्रशंसा। कयाधु कहने लगी- इंद्र, चंद्र आदि देव तो आपसे थरथर कांपते हैं, आप जितेंद्रीय हैं, ज्ञानी हैं, आपके जैसा वीर ना तो कभी कोई हुआ है और ना तो तभी होगा। मैं कितनी भाग्यशाली हूं कि आप जैसा पति मुझे मिला है। मैं जानती हूं कि निर्धारित काम को संपूर्ण किए बिना आप लौट ही नहीं सकते। क्या आज वन में कुछ ऐसा प्रसंग हो गया कि जिसके कारण आपको वापस लौटना पड़ा। कयाधु ने कुछ गर्म गर्म पकौड़े आदि खिला दिए होंगे। राक्षस को ऐसा भोजन ही पसंद आता है जिसे सात्विक भोजन पसंद नहीं आता वही राक्षस है। हिरण्यकशिपु अपनी प्रशंसा सुनकर उठा और कहने लगा वैसे तो मैं अपने निश्चित काम को पूरे किए बिना नहीं लौटता किंतु एक बाधा आ गई और अपशकुन भी हो गया सो वापस आ गया। कयाधु ने पूछा कौन सी बाधा आ पड़ी थी, क्या अपशगुन हो गया था। हिरण्यकशिपु ने कहा मैं जिस वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या कर रहा था उसी वृक्ष पर बैठकर एक तोता नारायण नारायण करने लगा। कयाधु को बड़ा आनंद हुआ कि चाहे जैसे भी सही आज इन्होंने नारायण का नाम तो लिया क्योंकि मेरे पति तो बड़े ही अभिमानी और नास्तिक हैं यदि मैं उन्हें नारायण की धुन (जप) करने को कहूंगी तो वे नहीं मानेंगे। अतः मुझे कोई युक्ति सोचनी पड़ेगी। अपने पति को पाप प्रवृत्ति में से युक्ति से बचा ले और उसे पाप करने से रोके वही सच्ची पत्नी है। पति को धर्म परमात्मा के मार्ग से ले जाए वह पत्नी ही धर्म पत्नी है। पति को पत्नी ही धर्म और मोक्ष के मार्ग पर ले जा सकती है। कयाधु ने सोचा कि यह बड़ा अच्छा अवसर है कि इस बहाने मैं अपने पति से बार-बार भगवान का नाम उच्चारण तो करा सकूंगी। वह चाहती थी कि उसका पति सुधर जाए। भोजन आदि से निवृत होकर शयन के समय उसने पति की चरण सेवा करते हुए कहा कि भोजन के समय आपकी बातों में मेरा पूरा पूरा ध्यान नहीं था। हां तो वन में क्या हुआ था। हिरण्यकश्यप- देवी वहां एक तोते ने आकर नारायण के नाम की रट लगा दी। कयाधु- तोता क्या बोलता था। हिरण्यकश्यप- नारायण नारायण। कयाधु- भला ऐसा कैसे हो सकता है, क्या सचमुच वह तोता बोलता था। हिरण्यकशिपु- हां वह नारायण नारायण बोलता था। बेचारा कामातुर पति। पत्नी ने युक्ति से बार-बार यही बात उससे कहलाई। कयाधु ने इस प्रसंग से लाभ उठाकर अपने पति के मुख से नारायण का 108 बार नाम उच्चारण करवाया। साधारणतया पुरुष कामांधता के कारण स्त्री के अधीन ही होता है। पत्नी चाहे तो अपने पति को सुधार सकती है। पत्नी यदि सुपात्र होगी तो अपने पति को भगवत भजन में लीन कर सकेगी। माता पिता (हिरण्यकशिपु-कयाधु) भगवान का नाम उच्चारण कर रहे थे कि उसी समय माता के गर्भ में प्रहलाद जी की स्थापना हुई। अतः पिता के राक्षस होने पर भी उसका पुत्र प्रह्लाद महान भगवद् भक्त हुआ। कयाधु सगर्भा हुई और हिरण्यकशिपु तपस्या करने वन में चला गया। उसने वहां छत्तीस हजार वर्ष तक तपस्या की। अन्न जल का भी त्याग कर दिया। इस कलयुग में प्राण, अन्न और जलमय है किंतु उस सतयुग में प्राण अस्थिमय था। अतः वैसी तपस्या शक्य थी। मात्र तप करने से ही मनुष्य का कल्याण नहीं हो सकता है, वह शुद्ध नहीं हो सकता। तप के साथ साथ भावना और हेतु भी शुद्ध होने चाहिए। हिरण्यकशिपु का हेतु अशुद्ध था। दुर्योधन ने भी विष्णु त्याग किया था किंतु वह धन तो पापमय ही था। यदि योग की साधना करते हुए योगी का हेतु अशुद्ध हो तो निश्चय से उसका पतन ही होगा। केवल योग साधना से ह्रदय विशाल नहीं हो सकता। योग सिद्धि से अन्य शक्तियां तो प्राप्त होगी किंतु हृदय की विशालता नहीं प्राप्त हो सकती। ब्रह्म अनुभूति के बिना हृदय विशाल नहीं हो सकता। हिरण्यकशिपु की तपस्या तो देवों को सताने और भोग विलास के हेतु ही थी, गीता जी की परिभाषा में कहें तो उसका तप तामसूतप था अतः जो फल मिलना चाहिए था वह नहीं मिला। हिरण्यकशिपु की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी वहां आए। वह तो मिट्टी के ढेर में ढका हुआ था। ब्रह्मा जी ने जल छिड़का तो वह बाहर आया। ब्रह्मा जी ने उससे पूछा कि उसकी क्या इच्छा है तो हिरण्यकशिपु ने कहा कि मुझे अजर अमर बनाइए। ब्रह्मा जी ने कहा कि मरना तो सभी को है जिसका भी जन्म हुआ है उसे मरना तो पड़ता ही है तू कुछ और मांग। हिरण कश्यप ने कहा मुझे तो अमरत्व का ही वरदान चाहिए। मुझे ऐसा वर दे मैं न तो दिन में मरूं और न रात में, न जड से मरू ना तो चेतन से, न तो मैं शस्त्र से मरूं और न तो अस्त्र से। ब्रह्मा जी ने सोचा कि इसने कठिन तपस्या की है सो वर तो देना ही पड़ेगा। उन्होंने उसे अमरत्व का वर दे दिया। अब हिरण्यकशिपु इतना शक्तिशाली हो गया कि उससे सभी देव पराभूत हो गए। देवों ने दुख के मारे प्रभु से प्रार्थना की। भगवान् ने कहा कि जब भी मेरे प्रिय वैष्णव व्यथित होते हैं, मैं अवतार लेता हूं। यदि पापी दुखी होता हूं तो भगवान उसकी उपेक्षा कर देंगे और अवतार नहीं भी लेंगे। पर वे अपने भक्तों की उपेक्षा कभी नहीं कर सकते, भक्तों पर विपत्ति आने पर उन्हें अवतार लेना ही पड़ता है। देवों को भगवान ने आश्वासन दिया कि जब कभी हिरण्यकशिपु अपने पुत्र से शत्रुता करेगा और उसकी हत्या के लिए तत्पर होगा तब मैं अवतार लूंगा और हिरण्यकश्यप का वध करूंगा। दूसरी तरफ कयाधु के गर्भ से प्रहलाद का जन्म हुआ और वह दिनों-दिन बड़ा होने लगा। सभी को इससे आनंद आह्लाद मिलता था अतः उसका नाम प्रहलाद रखा गया। दैत्यों के गुरु थे शुक्राचार्य। उसके शंड और अमर्क नामक दो पुत्र थे। प्रहलाद 5 वर्ष के हुए तो हिरण्यकशिपु ने शंडामर्क को बुलाकर उनसे कहा कि मेरे इस पुत्र को राजनीति की शिक्षा दो। शुकदेव जी वर्णन करते हैं। राजन वैसे तो शंडार्मक प्रहलाद जी को राजनीति पढ़ाते थे किंतु प्रहलाद तो गर्भावास के समय से ही भक्ति के रंग से रंगे हुए थे। प्रहलाद को भगवान वासुदेव से स्वाभाविक प्रीति थी। श्रीकृष्ण के अनुग्रह रूप ग्रह ने उनका ह्रदय इस प्रकार आकर्षित कर लिया था कि उन्हें जगत से कुछ भी लगाव नहीं रह गया था। वैसे तो भक्ति का रंग शीघ्र लगता नहीं है पर एक बार लग जाता है तो फिर सांसारिक प्रवृत्तियों के प्रति बैरागय हो जाता है। मीराबाई ने कहा है कि मेरे कृष्ण का रंग श्याम है और श्याम रंग पर किसी और रंग का प्रभाव नहीं पड़ता। प्रहलाद जी जन्म से ही भक्ति के रंग में रंगे हुए थे, वे महावैष्णव थे। वे गुरु जी की शिक्षा सुनते तो थे किंतु राजनीति का चिंतन वे जरा भी नहीं करते थे। सच्चे ज्ञानी भक्त का यही तो लक्षण है कि जब तक देहभान है उसके व्यवहार में क्षति नहीं आती। गुरु जी ने सोचा कि यह राजपुत्र तो बड़ा सयाना है अतः उसकी शिक्षा से प्रभावित होकर उसके पिता उसे कुछ ना कुछ पुरस्कार अवश्य देंगे। वह प्रह्लाद को लेकर राज्यसभा में आए। प्रह्लाद ने पिता जी को प्रणाम किया तो पिताजी ने बालक को उठाकर गोद में बिठाकर प्यार किया और पूछा बेटे तू गुरु जी के घर कल पढ़ने गया था तो कल की पढ़ाई तुझे याद है या नहीं, जो भी पाठ प्रकरण तुझे अच्छा लगा हो वह बोल जरा। प्रहलाद जी ने सोचा कि पिताजी उत्तम प्रकरण की बात पूछते हैं और इधर गुरु जी ने तो मार काट की बात ही सिखलाई है। वह मैं कैसे बता सकता हूं। अतः उन्होंने पिताजी को अच्छी सी बात बताई- अंधियारे कुएं के समान यह घर ही अपने अधःपतन का मूल कारण है, जीवो के लिए यही श्रेयस्कर है कि वे गृहत्याग करके वनवासी बनें और वहां भगवान हरी का आश्रय ग्रहण करें। प्रहलाद बोले- पिताजी अनेक जन्मों के अनुभव से मैं यह कह रहा हूं कि जीव कई बार स्त्री, पुरुष, पशु, पंछी बना है। हजारो जन्मों से विभु से विभक्त बना हुआ यह जीव लौकिक सुख के उपभोग में लीन है फिर भी वह अतृप्त ही है। तृप्ति भूख से नहीं त्याग से ही प्राप्त होती है। संसार तो दुख का सागर है। प्रत्येक जीव व्यथित है। पाप और पुण्य के समान होने पर यह मानव देह प्राप्त होती है जैसे पाप भोगना पड़ता है वैसे ही पुण्य भी भोगना ही पड़ता है। संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *