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Gita rahasya षष्ठम स्कंध

Gita rahasya षष्ठम स्कंध

नारायण जिन नाम लिया, तिन और का नाम लिया ना लिया,

अमृत पान किया घट भीतर गंगाजल भी पिया ना पिया।

नरकों का वर्णन सुनकर राजा परीक्षित ने कहा, महाराज मुझे ऐसा मार्ग बताइए कि जिस पर चलने से मुझे इन नर्कों में जाना ही ना पड़े। आपने प्रवृत्ति धर्म, निवृत्ति धर्म आदि की कथा सुनाई किंतु इन नरक लोकों का वर्णन सुनकर मुझे डर लगता है, नर्क में जाने का प्रसंग कभी उपस्थित ही ना हो ऐसा कोई उपाय बताइए। शुकदेव जी वर्णन करते हैं- राजन शास्त्र में प्रत्येक पाप का प्रायश्चित बताया गया है। पाप का विधि पूर्वक प्रायश्चित किया जाए तो पाप नष्ट हो जाते हैं। प्रायश्चित कर लेने के बाद फिर कभी पाप नहीं करना चाहिए अन्यथा प्रायश्चित करने का कोई अर्थ ही नहीं रहेगा। दुख सहकर ईश्वर का भजन करने से पाप जल जाते हैं। राजा ने पूछा विधि पूर्वक प्रायश्चित करने के बाद भी पाप करने की इच्छा बनी रहती है उसका क्या उपाय है। प्रायश्चित करने से पाप का नाश होता है किंतु पाप करने की वासना इच्छा का तो नाश नहीं हो पाता। प्रायश्चित करने से भी  वासना नष्ट ना हो पाए तो क्या करें। कुछ ऐसा मार्ग बताइए कि पाप करने की वासना ही ना रहे। प्रायश्चित से पाप तो जल जाता है किंतु पाप वासना नष्ट नहीं होती तो उसके लिए क्या किया जाए। शुकदेव जी सावधान करते हैं राजन मन का लेश मात्र भी विश्वास मत करो, मन बड़ा विश्वासघाती है उसे अंकुश में रखो। मन का कोई एकाध बार भी छुट्टी मिलेगी तो वह फिर से पाप करने को तैयार हो जाएगा। पाप वासना अज्ञान से जागती है और अज्ञानता का मूल अहंकार है। जो व्यक्ति श्री कृष्ण भगवान को प्राणार्पण करता है उसकी पाप करने की इच्छा ही नहीं होती उसका अहंकार नष्ट हो जाता है। तप (मन तथा इंद्रियों की एकाग्रता), ब्रह्मचर्य, शम (मन का नियम), दम (बाह्य इंद्रियों का नियमन), मन की स्थिरता, दान, सत्य, शौच, यम नियम आदि से पाप की वासना नष्ट होती है। किंतु हे परीक्षित भगवान को आत्मसमर्पण करने से और भगवत भक्तों की सेवा करने से पापी जनों की जैसी शुद्धि तपस्या आदि द्वारा नहीं हो पाती। पापी मनुष्य भक्ति से जैसा पवित्र हो सकता है वैसा दम, शम, तप आदि से नहीं हो सकता। राजन तुम अपना प्राण भगवान को अर्पित करो। पाप की वासना चली जाएगी। भगवान नारायण को जो अपना प्राण अर्पित करता है और जो प्रति विश्वास नारायण मंत्र का जाप करता है उसको पाप कभी छूता तक नहीं है। जो अपना प्राण श्रीकृष्ण को अर्पित करता है उसकी बात करने की इच्छा कभी नहीं होती। प्राण अर्पण करने का अर्थ है प्राण प्राण से, श्वास श्वास से ईश्वर के नाम का जप करना। प्रत्येक कार्य में ईश्वर से संबंध बनाए रखो। सतत, प्रति विश्वास भागवत स्मरण करते रहोगे तो पाप नहीं होगा, पाप में प्रवृत्ति नहीं होगी। गीता जी में कहा गया है- मामनुस्मर युध्य च। प्रथम भगवान का स्मरण करो और फिर सारे सांसारिक कार्य। जब तक परमात्मा का ज्ञान नहीं होता तब तक वासना नष्ट नहीं हो सकती। अज्ञान में से वासना का जन्म होता है ईश्वर और जगत के स्वरूप का ज्ञान होने पर ही वासना भी नष्ट होती है। ईश्वर आनंद रूप है और संसार दुख रूप ऐसा अनुभव होने के बाद वासना नष्ट होती है। वासना का मूल अज्ञान है अज्ञान के नाश होने पर ज्ञान होता है ज्ञान से अज्ञान का नाश होता है। ज्ञान को सतत बनाए रखने के लिए प्राण कृष्ण को अर्पित कर दो, जब तक अज्ञान का नाश नहीं होता तब तक वासना का विनाश नहीं होता और जब तक वासना नष्ट नहीं हो पाती तब तक पाप होना भी नहीं रुकता। ज्ञानी केवल इंद्रियों को ही विषयों की ओर जाने से रोकते हैं किंतु इससे वासना का नाश नहीं हो पाता। इंद्रियों को रोकने से नहीं किंतु उन्हें प्रभु की ओर मोड़ देने से वासना का नाश होता है। प्रत्येक इंद्रियों को परमात्मा की दिशा में मोड़ देने से वासना का नाश होता है। मन को पवित्र करना है तो आंखों को भगवत स्वरुप में स्थिर करो। प्रस्तुत स्कंध में तीन प्रकरण हैं 1. ध्यान प्रकरण -14 अध्यायों में इस प्रकरण का वर्णन किया गया है। 14 अध्यायों का अर्थ है- पांच कर्मेंद्रियां, पांच ज्ञानेंद्रिय, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार। इन सभी को परमात्मा के ध्यान में रत रखें तो ध्यान सिद्ध होता है। 2. अर्चन प्रकरण- 2 अध्यायों में सूक्ष्म अर्चन और स्थूल अर्चन का वर्णन किया गया है। 3. नाम प्रकरण- गुण संकीर्तन और नाम संकीर्तन का तीन अध्यायों में वर्णन है। परमात्मा के मंगलमय नाम का जप करो चाहे ज्ञानमार्गी हो या भक्ति मार्गी किंतु ईश्वर की साधना और ध्यान किए बिना काम नहीं बन पाता। किसी एक में मन स्थिर होने पर मन की शक्ति बढ़ती है। इस प्रकार तीन साधन बताए गए हैं- ध्यान, अर्चन और नाम। इन तीन साधनों के सहारे पाप का नाश होता है और नरक में जाने से भी बचा जा सकता है। प्रभु के मंगलमय स्वरूप का ध्यान- जप करने की आदत डालो और नियमित सेवा करो। नरक में जाना ना पड़े इसलिए इन साधनों का उपयोग करो। प्रतिदिन ठाकुर जी की सेवा करो, उनके नाम का जप करो, उनका ध्यान करो। यह तीनों साधन तुम्हारे लिए शक्य ना हो तो किसी भी एक साधन पर अटल श्रद्धा रखो। इंद्रियों को भक्ति रस में डूबे बिना वासना नष्ट नहीं होती। भक्ति के सहारे जीव भगवान के पास जाता है। महारानी यमुना भक्ति का स्वरूप है। यह जीव का ईश्वर से संबंध जोड़ देती है। भक्ति द्वारा जीव का ब्रह्म संबंध हो पाता है। ध्यान, अर्चन और नाम स्मरण इन तीन साधनों से भक्ति ग्रहण होती है। परमात्मा का ध्यान ना किया जाए तब तक मन शुद्ध नहीं होता। व्रत से द्रव्य शुद्धि होती है किंतु मन की शुद्धि नहीं होती। दान करने से भगवान की प्राप्ति नहीं होती दान का फल है लक्ष्मी। गीतांजलि में भी कहा गया है- वैद, तप, दान और यज्ञ से मेरी (प्रभुः की प्राप्ति नहीं हो सकती। परमात्मा का ध्यान करने से मन की शुद्धि होती है अतः प्रतिदिन ध्यान करने की आवश्यकता है। ध्यान में एकाग्रता ना हो सके तो नाम स्मरण की आवश्यकता है। यह तीनों एक साथ ना हो सके तो कोई बात नहीं किंतु किसी भी एक को तो पकड़ना ही होगा। साधन के बिना सिद्धि की प्राप्ति नहीं हो सकती। मनुष्य को चाहिए कि वह अपना जीवन लक्ष्य निर्धारित कर ले। एक ही ध्येय के बिना जीवन बिना नाविक की नौका के समान है। ध्येय निश्चित करके उसे सिद्ध करने के लिए साधना करो। इस कलिकाल में और तो कुछ हो नहीं सकता अतः नामस्मरण का ही आसरा लेना चाहिए। कलि काल में नाम सेवा प्रधान मानी गई है। कलयुग में स्वरुप सेवा शीघ्र फलदाई नहीं होती। स्वरुप सेवा है तो उत्तम किंतु उसमें पवित्रता की बड़ी आवश्यकता ,है कलयुग में मानव पवित्र नहीं रह सकता अतः कलयुग में नाम सेवा ही मुख्य कहीं गई है। अदृश्य वस्तु का नाम धरे रहने से उस नाम से स्वरूप प्रकट होगा। प्रत्यक्ष साक्षात्कार होने तक प्रभु का नाम लेने वाले को एक ना एक दिन प्रभु से साक्षात्कार अवश्य होगा। सीता जी ध्यान से इस प्रकार नाम स्मरण करती थीं कि वृक्षों के पत्ते पत्ते से रामध्वनी होती थी। परमात्मा के नाम में निष्ठा होना बड़ा कठिन है नाम स्मरण के समय जीभ रुक जाती है। पाप जीभ को पकड़े रहता है। घर में पग-पग पर भगवान का नाम लो तो पग पग पर यज्ञ का पुण्य प्राप्त होगा। यूं तो यह दिखता है अतिशय सुलभ है पर है बहुत ही कठिन। नाम में अटल निष्ठा रखो। परमात्मा के नाम का जप करने की आदत होगी तो मृत्यु भी उजागर होगी। अंतकाल तक ब्रह्मनिष्ठा बनाए रखना आसान नहीं है। नाम निष्ठा के सिवा कलि काल में अपने उद्धार का अन्य कोई उपाय नहीं है। राम नाम से तो पत्थर भी तैर गए थे किंतु राम द्वारा डाले गए पत्थर तैरे नहीं थे। रामचंद्र जी के मन में कुतूहल उत्पन्न हुआ। उन्होंने सोचा कि मेरे नाम से पत्थर तैरे थे और वानरों ने समुद्र पर सेतु बनाया था मैं भी तो देखूं कि मेरे स्पर्श होने पर पत्थर तैरते हैं या नहीं। यह सोचकर कोई भी जान ना पाए इस तरह वे समुद्र किनारे पर आए और उन्होंने समुद्र में पत्थर फेंके किंतु वे तो सब के सब पानी में डूब गए। रामचंद्र जी को आश्चर्य हुआ कि ऐसा क्यों हुआ। मेरा नाम लिखने से तो पत्थर तैरे थे। हनुमान जी यह कौतुक वही कहीं छुप कर देख रहे थे। उन्होंने श्री रामचंद्र को जब निराश होकर लौटे देखा तो हनुमान जी ने रास्ते में रोककर उनका दर्शन किया। रामचंद्र जी ने उनसे पूछा मेरे नाम मात्र से पत्थर कभी तैर गए थे किंतु जब आज स्वयं मैंने पानी में पत्थर फेंके तो वे डूब गए आखिर ऐसा क्यों हुआ। हनुमान जी ने उत्तर दिया यह तो स्वाभाविक है जिसे रामचंद्र जी स्वयं फेंक दें, तिरस्कृत करें उसे भला कौन तैरा सकता है। जिसे रामचंद्र जी फेंक दें जिस का परित्याग कर दें उसे तो डूबना ही है। उन पत्थरों का आपने त्याग किया था अतः वे डूब गए जिसे आप अपनाते हैं वह कभी नहीं डूब सकता। जिन पत्थरों से समुद्र पर सेतु का निर्माण किया गया था उन पर श्री राम (आपका) नाम लिखा गया था अतः वे तैर गए थे। जो शक्ति आपके नाम में है वह आपके हाथों में नहीं है। राम नाम में जो शक्ति है वह स्वयं राम में भी नहीं है। अपने जीवन में श्रीराम ने कुछ ही लोगों का उद्धार किया था किंतु उनके नाम ने तो आज तक अनेकों का उद्धार कर दिया। नाम जप की महिमा अनोखी है। जप करने से जन्म कुंडली के ग्रह भी बदल जाते हैं। हम और क्या कहें तुलसीदास जी ने स्वयं कहा है

मंत्र महामनि विषय व्याल के।

मेटत कठिन कुअंक भाल के।।

भाव कुभाव अनख लसहु।

नाम जपत मंगल दिशि दशहु।।

जप तो जनाबाई ने किया था। जनाबाई गोबर के उपले बनाती थी पर उन्हें कोई चुरा के ले जाता था। जनाबाई ने नामदेव से इस विषय में फरियाद की। नामदेव ने कहा उपले तो सभी एक तरह के होते हैं सो तेरे हैं उन्हें कैसे जाना जा सकता है। जनाबाई ने कहा यह तो बड़ी आसान बात है उपलों को कान के पास लाने पर यदि उनमें से विट्ठल विट्ठल ऐसी ध्वनि सुनाई दे तो समझ लेना कि वे मेरे ही हैं। जनाबाई उपले बनाने के समय बड़ी लगन से विट्ठल के नाम का जप करती थी। नामदेव ने भी उन उपलों में से विट्ठल के नाम की ध्वनि सुनी तो उन्होंने जनाबाई से कहा नामदेव मैं नहीं तुम ही हो। उपले बनाते समय जनाबाई विट्ठल के नाम जप में ऐसी तल्लीन हो जाती थी कि जड उपलों में से विट्ठल नाम की ध्वनि सुनाई देती थी। जप की संख्या और फल की चर्चा इसके आगे की गई है। दो नियम का पालन हमेशा करो- ब्रह्मचर्य और अस्तेय। पांच कोटी जप करने वाले को ज्ञान प्राप्त होता है। केवल पढ़ते रहने से ज्ञान का अनुभव नहीं हो पाता। प्राचीन संतों के चरित्र में ऐसा कहीं भी नहीं है कि वे अमुक स्थान पर पढ़ाई के लिए गए थे। भगवत भक्ति से चित्त शुद्ध होने पर उन्हें आंतरिक स्वयं स्फुरण से ज्ञान प्राप्त होता था। पंडित शास्त्रों के पीछे दौड़ता है जबकि मीराबाई की वीणा के पीछे शास्त्र दौड़ता था। 13 कोटी जप करने से जीव और ईश्वर का मिलन होता है। कलिकाल में इसके सिवा अन्य कोई उपाय ही नहीं है। अधिकारी गुरुद्वारा मंत्र ग्रहण करने से मंत्र में दिव्य शक्ति आरोपित होती है अजामिल भी नाम स्मरण से ही तर गया था। वेदांत के सिद्धांतों को समझना आसान नहीं है और समझने के बाद उनका अनुभव करना तो और भी कठिन है। आत्मा केवल दृष्टा है और दुख तो मात्र शरीर को ही होता है ऐसी बातें करना और समझना तो कदाचित आसान है किंतु इन सिद्धांतों का अनुभव करना टेढ़ी खीर है। नाम स्मरण करना बड़ा आसान है, भक्ति आसान और सरल है वह मृत्यु को उजागर करती है। जप के बिना जीवन सुधरता नहीं है। जीवन में कथा मार्गदर्शिका है। वह मनुष्य को अपने सूक्ष्म दोषों को भान कराती है किंतु उसका उद्धार तो नाम जप और नाम स्मरण से ही होता है। भगवान का नाम ही परमात्मा का स्वरूप है नाम के आश्रय से पापों का भी विनाश होता है। सिद्धांत दृष्टांत के बिना बुद्धि ग्राह्य नहीं हो पाता अतः इस सिद्धांत को समझाने के लिए अजामिल दृष्टांत कहा गया है। अजामिल जन्म से तो अधर्मी था किंतु प्रभु के नाम का आश्रय ग्रहण करने के बाद कृतार्थ हो गया। हम सब अजामिल ही हैं यह जीव माया में फंसा हुआ है जो माया से एक रूप हो गया है वही अजामिल है। जहां भी जाओगे माया साथ साथ आएगी। कोयले की खान में उतरे और हाथ स्वच्छ रहे यह संभव नहीं है। संसार में माया के संपर्क में तो आना ही पड़ता है, माया का स्पर्श तो करना ही पड़ता है किंतु उसका स्पर्श अग्नि की भांति ही करना चाहिए उसे विवेक रूपी चिमटे से पकड़ना चाहिए वैसे तो अग्नि के बिना जीवन व्यवहार चल नहीं पाता फिर भी उसे कोई हाथ में भी तो नहीं लेता। माया हमारा पीछा करती है पर उससे हमें बच निकलना है और ईश्वर के पीछे लगना है। हम इश्वर का पीछा करेंगे तो माया हमारा पीछा छोड़ देगी। माया का स्पर्श करते समय बड़ा सावधान रहना चाहिए। संसार में रहते हुए माया का त्याग करना तो अशक्य है। कनक और कांता यह दोनों माया के ही दो रूप हैं। ऐसा करो इनकी दोनों में मन ना फंसे चाहे शरीर से पाप करो या मन से दंड तो भोगना ही पड़ेगा। कनक और कांता इन दो वस्तुओं में माया निहित है इन दोनों की ओर से जिसका मन हट जाता है उसका मन माया की ओर से भी हट जाता है। अजामिल शब्द का अर्थ देखिए अजा का अर्थ है माया और माया में फंसा हुआ जीव ही अजामिल है। अजामिल अनेक प्रकार के पाप करके जीवन यापन करता था यह अजामिल पहले तो मंत्रवेत्,ता सदाचारी और पवित्र व्यक्ति था। एक दिन वह वन में गया था। रास्ते में सने देखा कि एक शूद्र वैश्या के साथ काम क्रीडा कर रहा है। वेश्या की साड़ी सरक गयी थी अतः उसका स्वरूप उभरा हुआ दिखता था। इस दृश्य को देखने से अजामिल कामवश हो गया और कामांध हो गया। वेश्या के ऐसे लुभावने रूप को देखकर अजामिल का मन भ्रष्ट हो गया। अजामिल ने एक ही बार वेश्या को देखा फिर भी उसका मन भ्रष्ट हो गया। तो प्रति रविवार को फिल्म देखने वाले के मन का तो क्या होता होगा। कई लोगों ने तो नियम सा बन लिया है कि प्रति रविवार को फिल्म देखी ही जाए। कई लोग अपने छोटे छोटे बच्चों को भी साथ ले जाते हैं। अपना तो बिगड़ा ही है अब तुम्हारा भी क्यों न बिगड़े। पाप प्रथम आंख द्वारा ही प्रविष्ट होता है। आंख बिगड़ी कि मन भी बिगड़ा और मन बिगड़ा तो जीवन भी बिगड़ेगा और नाम भी। रावण की आंखें दुष्ट थीं अतः उसका नाम भी हमेशा के लिए बिगड़ गया। जो भी पाप मन में आते हैं आंखों के द्वारा ही रह जाते हैं। आंखें बिगड़ने पर मन बिगड़ता ही है। काम को आंखों में नहीं आने दोगे तो वह मन में भी नहीं आ सकेगा। मनुष्य शरीर से नहीं किंतु आंख और मन से ही अधिक पाप करता है। वेश्या को देखने मात्र से अजामिल कूडा बन गया। प्रयोजन के बिना किसी को भी आंखें मत दो अर्थात उसे मत देखो। आंखों में राम को रखोगे तो वहां काम नहीं आ पाएगा। आंखों के द्वारा ही सभी पाप प्रविष्ट हो जाते हैं। कामांध अजामिल वेश्या के घर गया और उसे समझा बुझाकर अपने घर ले आया। वह पापाचार करने लगा। एक बार कुछ साधु जन घूमते-फिरते अजामिल के घर आए वेश्या ने देखा कि संत आए हैं तो उसने अन्न दान किया। वैसे तो वेश्या का अन्न ग्रहण करने का शास्त्रों ने निषेध किया है किंतु साधु जानते ही नहीं थे कि अन्नदाता नारी वेश्या है। उन्होंने अन्य पकाया और भोजन भी कर लिया। साधुजन तो जिससे अन्न ग्रहण करते हैं उसका कल्याण भी करते हैं। वेश्या के कहने पर अजामिल ने साधुओं को वंदन किया। साधु ने कहा कि तेरे घर से भोजन तो मिल गया किंतु दक्षिणा अभी तक बाकी है। तो अजामिल ने कहा मेरी यही दक्षिणा है कि मैंने आपको लूटा नहीं है। मैं किसी भी साधु को धन नहीं देता और कुछ मांगोगे तो दूंगा। वेश्या सगर्भा थी। साधुओं की इच्छा थी कि अजामिल का कल्याण हो जाए। तो उन्होंने कहा तेरे पुत्र का जन्म होने पर उसका नाम नारायण रखना। अजामिल ने साधुओं से पूछा महाराज मैं अपने पुत्र का नाम नारायण रख लूं तो आपको क्या लाभ होगा। साधुओं ने कहा हमारे भगवान का नाम नारायण है अतः यह नाम सुनकर हमें आनंद होगा और तुझे भगवान का स्मरण होता रहेगा। अजामिल ने कहा ठीक है मैं पुत्र का नाम नारायण रख दूंगा। अजामिल के घर पुत्र का जन्म हुआ और उसका नाम रखा गया नारायण। संतति के प्रति माता पिता का प्रेम कुछ विशेष होता ही है। अजामिल बार-बार नारायण को पुकारता रहता था। नारायण का नाम लेने की उसे आदत सी हो गई। अतिशय पापी, अतिशय कामी व्यक्ति अपनी पूरी आयु जी नहीं सकता। अजामिल के अभी 12 वर्ष शेष थे और उसे लेने के लिए यमदूत आ पहुंचे। मृत्यु काल समीप आ गया अपने छोटे से पुत्र नारायण के प्रति उसकी अतिशय आसक्ति थी अतः वह उसे नाम लेकर पुकारने लगा नारायण, नारायण। भोजन, द्रव्य, कामसुख, स्थान, संतति और पुस्तकों में यह जीव फंसा रहता है। माता-पिता का मन अपनी अंतिम संतति में विशेष फंसा रहता है। प्रतिदिन की आदत के अनुसार अजामिल ने नाम लेकर नारायण को कई बार पुकारा उसका नारायण तो नहीं आया किंतु वहां विष्णु दूत आ पहुंचे उन्होंने यमदूतों से कहा कि अजामिल को छोड़ दें। यमदूतों ने कहा अजामील का चरित्र भ्रष्ट है, वह जीने के लिए अपात्र है। विष्णु दूतों ने कहा यह सच है कि अजामिल ने पाप किया है किंतु भगवान का नाम लेकर इसने अपने पापों का प्रायश्चित भी तो किया है इस कारण उसके कुछ पाप जल गए हैं अतः इसे अब जीने दो, उसकी आयु के 4 वर्ष अभी शेष हैं। यमदूतों ने कहा अजामिल ने नारायण नारायण तो कहा है किंतु वैकुंठवासी नारायण को नहीं अपने पुत्र नारायण को पुकारा है। विष्णुदूतों ने कहा उसके मुख से भगवान का नाम अनजाने ही निकल पड़ा है। अग्नि पर अनजाने भी पैर पड़ जाए तो भी जलन तो होती ही है इसी प्रकार अनजाने भी यदि प्रभु का नाम लिया जाए तो कल्याण ही होता है। भगवान का नाम अनजाने लेने पर भी उसका फल मिलता ही है। अजामिल ने नारायण शब्द से चाहे अपने पुत्र को ही पुकारा हो किंतु इस बहाने भी भगवान के नाम का उच्चारण तो हो ही गया। बड़े बड़े महापुरुष भी जानते हैं कि संकेत से, परिहास से, तान के आलाप के समय, किसी की अवहेलना करने में भी यदि भगवान के नाम का उच्चारण हो जाए तो उसके पास नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य गिरते सम,य पैर के फिसलने पर अंग भंग होने पर, तापादि के दाह पर, चोट लगने पर आदि कैसी भी विवशतावश भगवान के नाम का हरि हरि शब्द का उच्चारण करता है वह नरक की यातना का पात्र नहीं रह जाता। गिर जाने पर चाहे कितनी ही हानि हो पर हाय हाय मत करो हरि हरि ही कहो। चूल्हें पर उबलता हुआ दूध जब छलकने लगता है तो हमारी माताएं हाय तौबा करने लगती हैं पर हाय हाय करने से अब होगा ही क्या, हरि हरि बोलो अनजाने में भी हरि हरि कहने पर यज्ञ का फल तो मिलता ही है। अन्यथा वैसे तो अग्नि को आहुति कौन देता है। हाय नहीं हरि कहो। ऐसा करने से अनजाने ही भगवान का स्मरण होगा और जप होगा। वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि मृत आत्मा के पीछे हाय हाय अधिक करने से मृत आत्मा को कष्ट होता है, उसे दुख होता है जबकि हरि हरि बोलने से उसका फल मृत आत्मा को मिलता है। विष्णु दूतों ने अजामिल को यमदूतों के बंधन से मुक्त किया और उसका उद्धार हो गया। अपमृत्यु टल सकती है पर महामृत्यु नहीं। अल्पायु के शेष होने पर पाप के कारण आने वाली मृत्यु को टाला जा सकता है। अजामिल की अपमृत्यु टल गई, अजामिल बिछौने में सोया हुआ यह सब कुछ सुन रहा था। सब सुनकर उसे अतिशय पश्चाताप हुआ। हृदय से प्रायश्चित करने के कारण उसके सारे पाप धुल गए। उसके बाद से वह सब कुछ छोड़कर भगवद् स्मरण करने लगा। पश्चाताप करने से तो अतिश्य पापी का जीवन भी बदल जाता है। वह सुधरता है और इसी जीवन में मुक्ति पा लेता है। अतः किसी भी पापी का तिरस्कार मत करो पाप का ही तिरस्कार करो। हृदय से पश्चाताप करने पर पाप जल जाते हैं। प्रायश्चित चित्त की शुद्धि करता है। उसके बाद से अजामिल नीरस भोजन करने लगा जिसका भोजन सरस होगा उसका भजन नीरस होगा और जिसका भोजन नीरस होगा उसका भजन सरस होगा। जीवन धन कुटुंब के लिए नहीं श्री कृष्ण के लिए है। अजामिल की बुद्धि और त्रिगुणात्मक प्रकृति से परे होकर भगवान के स्वरुप में स्थिर हो गई। उसे लेने के लिए विमान लेकर पार्षद आए। विशिष्ट मान ही विमान है। अजामिल सोचता है कि उसने वैसे तो अनेक पाप किए थे फिर भी सद्गति मिली। नाम में निष्ठा रखने का यही फल था। अजामिल ने नारायण नारायण का जप करके जीभ और जीवन को पवित्र बना लिया। जीभ को समझाने से वह सुधरेगी। श्रीखंड मांगे तो उसे कड़वे नीम का रस दो। वह व्यर्थ का भाषण अधिक करती है, निर्रथक बक बक करती रहती है भगवान का नाम तो कभी लेती ही नहीं है। जीभ को यदि नीम का कड़वा रस पिलाओगे तो उस पर राम का नाम बस जाएगा। भगवान की भक्ति करने वाले को इह लोक और परलोक दोनों में मान प्राप्त होता है। भगवान का कीर्तन करने से अजामिल भगवत धाम में पहुंच गया। भगवान के नाम का आसरा लेकर वह तर गया। अजा का अर्थ पहले माया कहा था पर अब भगवन्नाम का ब्रह्म रूप हो गया। आज जीव और शिव एक हो गए। अजा शब्द के दो अर्थ हैं माया में फंसा हुआ जीव तथा ब्रह्म रूप हुआ जीव। माया का वर्णन तो कई तरह से किया गया है। श्रीमद् शंकराचार्य ने माया की व्याख्या करते हुए कहा है कि कंचन और कामिनी में फंसे हुए व्यक्ति को माया में फंसा हुआ जानो। किमत्र हेयं कनकं च कांता। इस जगत में कौन सी वस्तुएं त्याज्य हैं तो उत्तर देते हैं कि जीव को अधोगति की ओर ले जाने वाला कांचन और कामिनी। इन दोनों में जो फंसा है जान लो कि वह माया में फंस गया। मणि रत्नमाला के प्रश्नोत्तर अति उत्तम है उसके एक एक शब्द में उपदेश भरा पड़ा है। बंधन युक्त कौन है जो पांच विषयों में आसक्त है। स्वतंत्र कौन है जो विषय की ओर वैराग्य की दृष्टि रखने वाला है। घोर नरक कौन सा है स्वदेह ही घोर नरक है। इस देह में सुंदरता कहां है यह तो मांस रक्त आदि दुर्गंध युक्त पदार्थों से भरा हुआ है। स्वर्ग के सोपान कौन से हैं सभी तृष्णाओं का क्षय ही स्वर्ग का सोपान है। चरित्र कौन है जिसकी तृष्णा विशाल है। श्रीमंत कौन है जो सदा के लिए संपूर्ण संतोषी हैं। कौन सा रोग अधिक कष्टदाई है जन्मधारण का रोग ही अत्यधिक कष्टदाई है। रोग की औषधि क्या है परमात्मा के स्वरुप का बार-बार चिंतन और स्मरण करना ही इस रोग की औषधि है। अब अजामिल शब्द का दूसरा अर्थ भी देख लें। अज का अर्थ है ईश्वर। ईश्वर में, ब्रम्ह में लीन हुआ जीव ही अजामिल है। साधु होना कठिन तो है किंतु सादगीपूर्ण जीवन से साधु बना जा सकेगा। साधु होने की नहीं अपितु सरल होने की आवश्यकता है जिसने रसों को जीता है समझो कि उसने जग भी जीत लिया है। जितं सर्वं जिते रसे। लौकिक सुख के प्रयत्न सफल हो जाये तो मानो कि ईश्वर की कृपा हुई है। इसका कारण यह है कि लौकिक सुखों में फंसा व्यक्ति ईश्वर भजन नहीं कर पाता। अजामिल का जीवन सुधर गया। अन्त में वह विमान में बैठ कर बैकुंठधाम गया। अजामिल तो गया और साथ साथ संसार को उपदेश भी देता गया कि अतिशय पापी को भी निराश नहीं होना हिए। पापी को ऐसा कभी न सोचना चाहिए की नाम जप के लिए आवश्यक शुद्धि या निर्मलता उसमें नहीं है। अतः रामनाम जपने से क्या लाभ होगा। यदि वह ऐसा सोचता है तो वह यह भूल जाता है कि हर प्रकार की शुद्धि की प्राप्ति के लिए रामनाम का जाप ही तो एकमात्र उपाय है। अतिपापी होने पर भी प्रभु का आश्रय लेने पर उसका उद्धार हो जाएगा। पाप का सच्चा प्रायश्चित होने पर पाप जल जाते हैं। भगवान का नाम जप पाप को भस्मीभूत कर देता है। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव। यह महामंत्र है। अर्थ के ज्ञान सहित इस मंत्र का जाप करो। कृष्ण- हे प्रभु। आप सभी के मन को आकर्षित करने वाले हैं अतः आप मेरा मन भी आकर्षित कीजिए। गोविंद- इन्द्रियों के रक्षणहार भगवन आप मेरी इन्द्रियों को स्वयं में लीन करें। हरे- हे दुःखहर्ता मेरे दुःखों का भी हरण करें। (जिसका मन भगवान में लीन हो जाता है उसके सारे दुःखों का हरण हो जाता है। मुरारे- हे मुर राक्षस के विजेता मेरे मन में बसे हुए काम, क्रोधादि राक्षसों का नाश कीजिए। हे नाथ- आप नाथ हैं और मैं आपका सेवक। नारायण- मैं नर हूं और आप नारायण हैं। वासुदेव- वसु का अर्थ है प्राण। मेरे प्राणों की रक्षा करें। मैंने अपना मन आपके चरणों में अर्पित कर दिया है। प्राचीनबर्हि राजा के यहां प्रचेता नामक दस पुत्र हुए थे। उनके दक्ष नामक एक पुत्र हुआ। प्रझापति दक्ष ने हंसगुह्य स्तोत्र से आदिनारायण भगवान की आराधना की तो उसके यहां हर्यश्व नामक दस हजार पुत्र हुए। दक्ष ने उन्हें प्रजा उत्पन्न करने की आज्ञा दी। किंतु नारायण सरोवर के जल का स्पर्श करने के कारण उनकी परमहंस धर्म का आचरण करने की इच्छा हुई। वहां उन्हें नारद जी मिल गए। दक्ष के इन दस हजार पुत्रों से नारद जी ने कूट प्रश्न पूछे। उन प्रश्नों का इन पुत्रों ने उत्तर सोच निकाला। उनमें से कुछ प्रश्नोत्तर हम भी देंखे।

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