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Gita rahasya प्रथम स्कंध

Gita rahasya प्रथम स्कंध

भगवान कहते हैं कि मैं तो सब कुछ देखता जानता और समझता हूं। मैं तो तुम्हारे दादा का भी दादा हूं। लक्ष्मी जी जब भगवान से पूछती है कि आप अपने भक्तों को दर्शन क्यों नहीं देते हैं, तब भगवान कहते हैं कि वह दाता बदलने में क्या लेना चाहता है वह भी तो देखो। भगवान को तुम अपना मन अपनी बुद्धि अपना हृदय अर्पित करो। भीष्म पितामह स्तुति करते हैं कि हे भगवान केवल एक बार मुझसे कहो कि मैं तुम्हारा हूं। भक्ति ही मृत्यु को सुधारती है सार्थक करती है। ज्ञान पर भरोसा मत रखो। आत्मा शरीर से अलग है यह तो सब जानते हैं परंतु इसका अनुभव सबको नहीं होता। दुख होता है तब मन में देहाध्यास होता है। देहावसान के समय 20 करोड़ बिच्छू के डंक की वेदना होती है। भक्ति मृत्यु को सुधारती है। कई बार ज्ञान मृत्यु को बिगाड़ता है। भीष्म पितामह ज्ञान पर भरोसा नहीं रखते थे। वे भगवान के शरण में गए और मेरे लिए भगवान से कहते हैं कि मैं आपकी शरण में आया हूं। पर ऐसा नहीं कहते कि वह ब्रह्म रूप है। वे कहते हैं कि मैं आपका हूं। आप की शरण में आया हूं। भगवान उन्हें कुछ उलाहना देते हैं। वे कहते हैं कि मैं आपको अपना कैसे मानूं। आपने तो अर्जुन पर भी बाण चलाएं हैं। अपने भक्तों पर चलाए गए बाणों को मैं कैसे भूलूं? भीष्म जी कहते हैं कि यह सारा जग जानता है कि पांडवों पर मेरा कितना प्रेम है। और आप भी तो यह जानते ही हैं। युद्ध में मेरा शरीर कौरवों के पक्ष में था किंतु मेरा मन तो पांडवों के पक्ष में ही था। पांडवों पर मैं बाC तो चलाता था पर मन से मैं यही चाह रहा था कि विजय पांडवों को ही मिले। जयोस्तु पांडु पुत्राणाम ऐसा बोल कर ही मैं बाण छोड़ता था। कृष्ण कहते हैं कि फिर भी आप शरीर से तो पांडवों के पक्ष में नहीं थे। आप ने कौरवों के पक्ष में रहकर मेरे पांडवों के साथ युद्ध किया है। आप जब मन से पांडवों के साथ थे तो फिर तन से भी पांडवों के साथ क्यों ना रहे। भीष्म पितामह कहते हैं कि हे प्रभु मैं उस समय आपके दर्शन करना चाहता था। आप अर्जुन के रथ पर थे। मैंने सोचा कि यदि में पांडवों के पक्ष में रहूंगा तो सामने से आपके दर्शन कैसे कर सकूंगा? आपका सतत दर्शन करते रहने के लिए ही में पांडवों के विरुद्ध कौरवों के पक्ष में जा मिला। पांडवों के पक्ष से न तो आप के दर्शन में अच्छी तरह नहीं कर पाता। भीष्म जी स्तुति करते हैं

त्रिभुवनकमन तमालवर्ण रविकरगौरववराम्बरं दधान।

वपुरलककुलावृताननाब्ज विजयसखे रतरस्तु मेनवद्या।।

जिसका शरीर त्रिभुवन सुंदर और जैसा है नीलवर्ण है जिसके तन पर सूर्य किरण से श्रेष्ठ पीतांबर शोभित है और मुख पर कमल के समान उल्टी हुई बिखरी हुई है ऐसे अर्जुन शाखा श्री कृष्ण में मेरी निष्कपट प्रीति हो।

अपनी निष्काम बुद्धि और मन आपको अर्पित करता हूं। मन तो केवल भगवान को ही देने की वस्तु है। फिर भी जगत में कोई स्त्री को मन देता है तो कोई पुरुष को। भगवान तो कहते हैं तुम अपना धन आदि नहीं किंतु मन ही मुझे दो। भगवान कृष्ण सोचने लगे कि वयोवृद्ध भीष्म पितामह बहुत समझदार है। कितना मीठा बोलते हैं। यह जीव जब ठाकुर जी को कुछ अर्पण करता है तो उन्हें बड़ा संकोच होता है। भगवान आगे सोचते हैं कि युद्ध के समय की भीष्म पितामह की विशाल मूर्ति मुझे याद आती है। उनके मुख पर बिखरी लटें घोड़ों के पांव से उड़ती हुई धूल से गंदी हो रही थी। और मुख पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें छलक रही थी। सुंदर कवच धारी कृष्ण के प्रति मेरा शरीर अंतःकरण और आत्म समर्पित हो जाए। प्रभु से प्रार्थना करो कि मेरे शरीर पर आप विराजे। मेरे शरीर पर द्वारिकाधीश बिराजे हैं ऐसा भाव मन में करो। मेरे इंद्रिय रूपी घोड़े अंकुश में ना रहे तो प्रभु उनको तुम अंकुरित कर देना। मैंने अधूरा आपके हाथ में रख दी है। मेरे इंद्रियों को वश में रखना। मेरा रथ सकुशल पार कर दो। प्रभु की शरण ग्रहण करने वाले का ही मरण सुधरता है। हे नाथ जगत में आपने मेरी प्रतिष्ठा कितनी बढ़ा दी है मुझे कितना सम्मान दिया है मेरी प्रतिज्ञा रखने के लिए आपने अपनी प्रतिज्ञा छोड़ दी। श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में कोई भी अस्त्र शस्त्र धारण ना करने की प्रतिज्ञा की थी। भीष्म ने कहा कि मैं तो गंगा पुत्र हूं। में तो ऐसा युद्ध करूंगा कि कृष्ण को शस्त्र धारण करने ही पड़ेंगे। मैं उनसे हथियार चलवा कर ही रहूंगा। भीष्म के बाणों से अर्जुन मूर्छित हो गया फिर भी वे बाण वर्षा करते रहे। कृष्ण ने सोचा कि यदि भीष्म बाढ़ चलाते रहेंगे तो मेरे अर्जुन की मृत्यु हो जाएगी महा अनर्थ होगा। मेरी प्रतिज्ञा चाहे टूट जाए। भगवान रथ पर से कूद पड़े। सिंह की भांति दहाड़ते हुए हुए रथचक्र लेकर भीष्म की ओर दौड़ पड़े। भीष्म उसी समय कृष्ण को नमस्कार किया और भगवान का जय जयकार किया। भक्तों की प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए भगवान अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ देते हैं। ठाकुर जी की यही लीला है। भगवान भक्तों का पूरा सम्मान करते हैं। वे मानते हैं कि चाहे मेरी पराजय हो पर भक्तों की वजह होनी चाहिए। भीष्म कहते हैं कि मेरी और कृष्ण दोनों की प्रतिज्ञा पूरी हुई। उस समय भगवान के दो रूप में एक साथ देख रहा था। एक स्वरूप रथ पर विराजित था और दूसरा रथ से कूद कर चक्र ले कर दौड़ रहा था। अर्जुन मूर्छित होने से घोड़े रथ को कहीं गड्ढे में न गिरा दे ऐसा सोचकर भगवान का एक स्वरूप रथ संभालता था और उस रूप ने तो कोई भी शस्त्र धारण नहीं किया था।

भीष्म अर्थात भयंकर। भयंकर कौन है मन ही भयंकर है। अतः भीष्म का अर्थ है मन। अर्जुन जीवात्मा है। मन आवेश युक्त होने पर संकल्प विकल्प बहुत करता है पर वही मन का संकल्प विकल्प के बाणों की बौछार करता है। अतः जीव रूपी अर्जुन घायल होता है और मूर्छित होता है। ईश्वर जब मन को मारने लगते हैं तभी वह अंकुशित होता है। भगवान मन को सुदर्शन चक्र से मारने जाते हैं तब कहीं मन शांत होता है। जीवात्मा जब परमात्मा की शरण में जाता है तो वे मन को भी शांत करते हैं। मन संकल्प-विकल्प करना छोड़ दे तो यह मन आत्म रूप में तदाकार हो जाता है। तभी जीवन को भी शांति मिलती है। जो स्तुति भीष्म जी ने की थी वह अनुपम है। स्तुति कंठस्थ करने योग्य है। इसे भीष्म स्तवराज स्त्रोत भी कहते हैं। इसके बाद भीष्म ने उत्तरायण में देह को छोड़ दिया। भीष्म आचार्य भगवत स्वरुप में तदाकार हो गए। वे कृतार्थ हो गए। उत्तरायण में मृत्यु का अर्थ है ज्ञान की अथवा भक्ति की उत्तरावस्था में परिपक्वता में मृत्यु। कई पापी लोग भी वैसे तो उत्तरायण काल में मरते हैं फिर भी उनको सद्गति नहीं मिलती और कई योगी जल दक्षिणायन में मरते हैं फिर भी उनकी दुर्गति नहीं होती। दक्षिण दिशा में यमपुरी है लोग है नरक लोक है। नरक लोक का अर्थ है अंधकार। जिन्हें परमात्मा के स्वरुप का ज्ञान नहीं है जिन्हे परमात्मा का अनुभव नहीं है और वैसे ही मर जाते हैं उनकी मृत्यु दक्षिणायन कहलाती है। संतों का जन्म तो हमारी ही भांति साधारण होता है किंतु उनकी मृत्यु मंगलमय होती है। भीष्म महाज्ञानी थे फिर भी प्रभु प्रेम में तन्मय होकर मरे थे यह बात हमें बतलाती है कि भक्ति श्रेष्ठ है। साधन भक्ति करते करते ही साध्य भक्ति सिद्ध होती है। जिसकी मृत्यु के समय देवगढ़ बाजे बजाते हैं उसकी मृत्यु ही कृतार्थ जानो। 2018 के समय ऐसा ही किया था ऐसे काम जग में करो कि

जब तुम आए जग में तो वह हंसा तुम रोए

ऐसी करनी कर चलो तुम हंसो जग रोए।।

मानव जीवन की अंतिम परीक्षा उसकी मृत्यु हुई है। जिसका जीवन सुंदर होगा उसकी मृत्यु भी मंगलमय होगी। जिसका मन बिगड़ा उसका जीवन व्यर्थ रहा। जब मानव प्रत्येक क्षण को सुधारता है जिसको समय के मूल्य का भान होता है। संपत्ति फिर प्राप्त हो सकती है किंतु विगत समय कभी प्राप्त नहीं होता। प्रत्येक क्षण का जो सदुपयोग करेगा उसी की मृत्यु मांगलिक होगी।

कण-कण का सदुपयोग करो और क्षण क्षण का भी। एक भी कल का और एक भी क्षण का दुरुपयोग ना करो। कण का जो दुरुपयोग करता है वह दरिद्र बनता है और क्षण को व्यर्थ खर्च करने वाला जीवन बिगाड़ता है। प्रतिदिन संयम को बढ़ाओ। प्रतिपल जो ईश्वर का स्मरण करता है उसकी मृत्यु भी सुधरती है। भीष्म अजीवन संयमी रहे थे। संयम बढ़ाकर प्रभु के सतत स्मरण की आदत होने से मरण सुधरेगा। जीवन का अंत काल बड़ा कठिन है। उस समय प्रभु का स्मरण करना आसान नहीं है।

जन्म जन्म मुनि जतन कराही

अंत राम कहि आवत नाही

समस्त जीवन जिसकी लगन में बीता होगा वही अंतकाल में उसे याद आएगा।

ईश्वर तब तक कृपा नहीं करते जब तक मनुष्य स्वयं को ही प्रयत्न ना करें। सारा जीवन भगवत स्मरण में बीते और कदाचित व्यक्ति अंत काल में भगवान को भूल जाए तो भी भगवान उसे याद करेंगे। सत्कर्म कभी व्यर्थ नहीं होता। भक्त मुझे भूले तो भी मैं उसको नहीं बुलाता ऐसा भगवान ने कहा है। भीष्म पितामह की मृत्यु को उजागर करने के लिए वे द्वारकाधीश पधारे थे। भीष्म पितामह ने महाज्ञान का विश्वास ना किया और उन्होंने प्रभु की शरण ली। भीष्म पितामह की मृत्यु से युधिष्ठिर को दुख हुआ किंतु उनकी संगति से आनंद भी हुआ। धर्मराज राज सिंहासन पर बैठे हस्तिनापुर का शासन करने लगे उनके राज्य में अकाल नहीं है ना तो अतिवृष्टि होती है और ना ही अनावृष्टि धर्मराज के राज्य में ना तो कोई भूखा है और ना कोई भी बीमार। धर्म की मर्यादा का पालन करने वाला कभी भी दुखी या बीमार नहीं होता। अनेक जन्मों की भोग वासना अभी मन में है। उसका बिल्कुल नाश तो नहीं हो सकता किंतु विवेक से उपभोग करोगे तो अंत काल तक इंद्रियां स्वस्थ रहेंगी। धर्म की मर्यादा में रहकर मनुष्य अर्थ और काम का उपभोग करेगा तो वह दुखी नहीं होगा। संयम और सदाचार नहीं बढ़े तो धन संपत्ति भी आनंद नहीं दे सकेगी। सूत जी सावधान करते हैं धर्म राजा के राज्य में धर्म की शिक्षा दी जाती थी। आरोग्यम् भास्कर इच्छेत मोक्षं इच्छेत् जनार्दनात्। सूर्य नारायण प्रत्यक्ष भगवान है और बाकी सभी देव भावना से सिद्ध होते हैं सूर्य नारायण का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। उनके दर्शन के लिए भावना की कोई आवश्यकता नहीं है इसी प्रत्यक्ष देव की आराधना करो। धर्मराज भी सूर्य नारायण की उपासना करते थे। सूर्य नारायण की आराधना किए बिना बुद्धि सूत्र नहीं होती। ज्यादा नहीं तो कम से कम रोज 12 सूर्य नमस्कार करो। मेरे सूर्यनारायण और श्री कृष्ण एक ही है। कृष्ण ही सूर्यनारायण है। श्री कृष्ण भगवान ने भी गीता में कहा है कि ज्योतिषां आदित्य योग। इस सूर्यनारायण की उपासना का क्रम कहा गया है। उनकी उपासना करने वाला कभी दरिद्र नहीं बनता। महाभारत के वनपर्व में एक कथा है। युधिष्ठिर सूर्यनारायण की उपासना करते थे। वन में सूर्य देव ने उनको एक अक्षय पात्र दिया। राम को भी सूर्य ही ने शक्ति दी थी और उसी शक्ति से उन्होंने रावण को मारा। राम ने भी यही आदर्श सामने रखा है कि मैं स्वयं ईश्वर हूं फिर भी सूर्यनारायण की उपासना करता हूं। धर्म के साथ नीति का विवाह अर्थात संबंध ना हो तब तक नीति विधवा जैसी है और बिना नीति का धर्म विदुर है। अर्थोपार्जन वैसे तो धर्म है परंतु वह धर्मानुकूल होना चाहिए। धर्म राजा के पवित्र राज्य में किसी के भी घर में कोई कलेश ना था। पुत्र मात पिता की आज्ञा का पालन करता था। उस समय राजा धर्मनिष्ठ होने के कारण प्रजा भी धर्मनिष्ठ थी। युधिष्ठिर का राजतिलक करके श्री कृष्ण द्वारिका गये। वहां की जनता ने रथ यात्रा का दर्शन किया। रथ में विराजित द्वारकाधीश के दर्शन करो। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म है। रथ सोने का है। एक झांकी सी करें तो हमारा हृदय पिघलेगा। इस शरीर में श्रीकृष्ण की झांकी करो। हृदय सिंहासन पर बिठाकर भक्तजन प्रभु का दर्शन करते हैं। ज्ञानी जन समाधि की अवस्था में ललाट में ब्रह्म दर्शन करते हैं। द्वारकाधीश द्वारका में प्रवेश किया। नगरवासी कहते हैं कि आपकी कृपा से वैसे तो सब ठीक था एकमात्र दुख यही था कि आपका दर्शन नहीं कर सकते थे। सभी को कृष्ण दर्शन की आतुरता है। भगवान ने अनेक रूप धारण किए और 16000 रानियों के साथ राजप्रसाद में प्रवेश किया। भगवान वाणी चतुर है। सभी रानियों से कहती है कि मैं तेरे ही घर में पहले आया हूं। दूसरे दिन रानियों के बीच प्रेमकलह हुआ। यह भगवान की लीला है। उस समय काम तो लड़ने आया। रासलीला में काम जो पराजित हुआ था फिर भी उसे मन में असंतोष रह गया था कि उस समय तो कृष्ण बालक ही थे। उस समय मैं हारा था कोई अचरज की बात नहीं थी। कामदेव ने श्रीकृष्ण ने कहा कि जब सुंदर युवतियाँ आपकी सेवा कर रही हों उसी समय मुझे झगड़ना है। सुंदर प्रेमल हाव भाव से रानियों ने श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया किंतु श्री कृष्ण तो अजेय ही रहे। वन में वृक्षों के तले बैठ कर काम का दमन करना तो ठीक है किंतु अनेक रानियों के साथ रहकर काम को जीते वह तो परमात्मा है। श्री कृष्ण का चिंतन मनन करने वाले को काम सता नहीं सकता तो श्रीकृष्ण को तो वह कैसे सताएगा। ईश्वर वह है कि जिसे काम कभी अधीन न कर सके। काम के आधीन हो जाय वह जीव है। श्री कृष्ण को कामदेव पराजित न कर सका। उसने अपने धनुष बाण का त्याग करना पड़ा। श्रीकृष्ण को योगेश्वर हैं। शंकभ भी योगीश्वर हैं। प्रवृत्ति में पूर्णतः रह कर भी उसमें आसक्त न बने वही है योगीश्वर। संपूर्ण निवृत्त रहकर स्वरूप में स्थिर रहे वह है योगीश्वर। बारहवें अध्याय में परीक्षित के जन्म की कथा है। उत्तरा ने बालक को जन्म दिया। वह चारों ओर देखने लगा। माता के उदर में मुझे चतुर्भुज स्वरूप जो पुरुष दिखता था वह कहां है। परीक्षित भाग्यशाली था कि उसको माता के गर्भ में ही भगवान के दर्शन हुए। यही कारण है कि वह प्रथम श्रोता है। युधिष्ठिर ने ब्राह्मणों से पूछा कि बालक कैसा होगा। ब्राह्मणों ने कहा वैसे तो सभी ग्रह दिव्य हैं किंतु मृत्यु स्थान की कुछ गड़बड़ी है। उसकी मृत्यु सर्पदंश से होगी। यह सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर को बहुत दुख हुआ। मेरे वंस का पुत्र सर्पदंश से मरे यह ठीक नहीं है। ब्राह्मणों ने उनको आश्वस्त किया। चाहे सर्पदंश से उसकी मृत्यु हो किंतु उसे संद्गति मिलेगी। उसके अन्य ग्रह शुभ हैं इस ग्रहों को देख कर लगता है कि इस जीवात्मा का यह अंतिम जन्म है। नवी स्थान में मैं बैठा हुआ उच्च क्षेत्र का बृहस्पति जिसके हो वह धर्मात्मा बनता है। परीक्षित दिनोंदिन बड़े हो रहे हैं। परीक्षित दिनोंदिन बड़े हो रहे हैं। 14वें और 15वें अध्याय में धृतराष्ट्र पांडव मोक्ष की कथा है। 16वें अध्याय से परीक्षित चरित्र का आरंभ होता है। विदुर जी तीर्थ यात्रा करते हुए प्रभास क्षेत्र में आए। उन्हें खबर हुई कि सभी कौरवों का विनाश हुआ है और धर्म राज राज सिंहासन पर बैठे हैं। केवल मेरा भाई धृतराष्ट्र ही धर्म राज के यहां मुट्ठी भर खाने के लिए रह गया। विदुर आए धर्मराज ने उनका स्वागत किया। विदुर जी सामान मांगने नहीं आए थे अपने बंधुओं को मुक्त कराने के लिए आए थे। उन्होंने 36 वर्षों तक तीर्थ यात्रा की। इसका कारण यह है कि यात्रा में अन्य चिंताओं के कारण परमात्मा का नियमित ध्यान नहीं हो पाता था। सत्कर्म नियमपूर्वक नहीं होता है इससे तीर्थयात्रा की अपेक्षा भगवान का ध्यान श्रेष्ठ है। देवी भागवत में लिखा है कि घर की अपेक्षा तीर्थ यात्रा में  अधिक सत्कर्म न हो सके तो वह तीर्थयात्रा व्यर्थ ही है। विदुर जी ने 36 वर्ष तक की यात्रा की फिर भी इस बात को संक्षेप में ही कहा। आत्म प्रशंसा मृत्यु है अपने सत्कर्मों का स्वयं अपने मुख से वर्णन ना करें।  बिदुर जी ने 36 वर्ष की यात्रा का 36 शब्दों में ही वर्णन किया है। आजकल तो लोग हमने इतनी यात्रा की ऐसी बात बार-बार करते हैं।अपने हाथ से जो भी पुण्य कार्य हो उसे भूल जाओ और जो पाप हो उसे याद रखो यही सुखी होने का मार्ग है किंतु मनुष्य पुण्य को तो याद रखता है किंतु पाप को भूल जाता है। युवावस्था में जिसने बहुत पाप किए हैं उसे वृद्धावस्था में नींद नहीं आती। मध्य रात्रि के समय विदुर जी धृतराष्ट्र के पास आए। बे जाग ही रहे थे। विदुर जी ने पूछा कि नींद नहीं आ रही है क्या। जिस भीम को तुमने विष भरे लड्डू खिलाए उसी के घर में तुम अब लड्डू खाने आए हो, धिक्कार है तुम्हें। पांडवों को तुमने दुख दिया। तुम ऐसे दुष्ट हो कि राज्य सभा में द्रोपदी को बुलाने की तुमने सहमति दे दी। पांडवों को छोड़कर अब यात्रा करो। धृतराष्ट्र कहता है कि मेरे भतीजे बड़े अच्छे हैं। मेरी खूब सेवा करते हैं उन्हें छोड़कर जाने को दिल नहीं होता। विदुर जी कहते हैं अब तुम्हें भतीजा प्यारा लग रहा है याद करो कि तुम ने पांडवों को मारने के लिए कितने प्रयत्न किए थे। भीमसेन को लड्डू में विष दिया। लाक्षाग्रह में आग लगाई। यह धर्म राजा तो धर्म की मूर्ति है जो तुम्हारे  अपकार का बदला उपकार से दे रहे हैं। मुझे लगता है कि कुछ ही दिनों में पांडव प्रयाण करेंगे और तुम्हें सिंहासन पर बैठा देंगे। तुम अब मोह छोड़ो तुम्हारे सिर पर काल मंडरा रहा है। तुम्हारे मुख पर मुझे मृत्यु का दर्शन हो रहा है। समझ बूझ कर घर का त्याग करोगे तो कल्याण होगा नहीं तो काल के धक्के के कारण घर छोड़ना पड़ेगा। छोड़े बिना कोई चारा नहीं है। खुद समझ सोचकर घर छोड़े वह बुद्धिमान है कुछ ही समय में तुम्हारी मृत्यु होगी। यह जीव ऐसा अनाड़ी है कि सोच समझकर सब कुछ छोड़ना नहीं चाहता। किंतु जब डॉक्टर कहता है कि ब्लड प्रेशर है कामकाज बंद करो आराम नहीं करोगे तो जोखिम है तब वह डर के मारे घर में बैठ जाता है इस तरह लोग डॉक्टर के कहने पर धंधा और काम-काज छोड़ देते हैं। धृतराष्ट्र कहता है कि भाई तेरा कहना ठीक है किंतु मैं तो अंधा हूं। अकेला कहां जाऊं। विदुर जी कहते हैं कि दिनको तो धर्म राज तुम्हें जीने नहीं देंगे तो मैं मध्यरात्रि को ही तुम्हें ले चलूं। सुबह हुई तो युधिष्ठिर धृतराष्ट्र् के महल में आए। चाचा जी दिखाई नहीं देते। युधिष्ठिर ने सोचा कि हमने उनके सौ पुत्रों को मौत के घाट उतार दिया  अतः उन्होंनेआत्महत्या की होगी। जब तक चाचा चाची का समाचार ना मिलेगा तब तक मैं पानी भी नहीं पियूंगा। धर्मात्मा व्यथित होता है तो उससे मिलने संत आते हैं। धर्म राजा के पास उस समय नारद जी आए। धर्म राजा ने उनसे कहा कि मेरे पापों के कारण ही चाचा जी चले गए। वैष्णव वह है जो अपने ही दोषों को सोचें दूसरों के दोषों को नहीं। नारदजी समझाते हैं कि धृतराष्ट्र को तो सद्गति मिलने वाली है चिंता मत कर। हर एक जीव मृत्यु के अधीन है जहां चाचा जाएंगे वहां तुम्हें भी जाना है। आज से 5वें दिन चाचा की सद्गति होगी और फिर तुम्हारी बारी आएगी। चाचा के लिए अब रोना नहीं अब तुम अपना ही सोचो। मृत्यु से ग्रसित व्यक्ति कभी वापस नहीं आता। जीवित अपने लिए ही रोए वह ठीक है। एक की मृत्यु के पीछे दूसरा रोता है किंतु रोने वाला यह नहीं समझता कि जो वहां गया है उसके पीछे उसे भी जाना है। रोज सोचो कि मुझे अपनी मृत्यु उजागर करनी है तुम्हारे लिए अब 6 महीने बाकी है। तुम अपनी मृत्यु को सोचो। सूत जी सावधान करते हैं। सैया में सोने के बाद अर्थात अंतकाल में आया हुआ सयानापन किस काम का वह निरर्थक है।नारद जी कहते हैं तुम्हें मैं भगवत प्रेरणा से सावधान करने के लिए आया हूं। विदुर जी धृतराष्ट्र को सावधान करने आए थे। मैं तुम्हें सावधान करने आया हूं 6 महीने के बाद कलयुग का प्रारंभ होगा अब तुम किसी की भी चिंता ना करो तुम अपनी चिंता करो। युधिष्ठिर ने कई यज्ञ किए। भगवान दवारिका गए तो साथ में अर्जुन को भी ले गए। प्रभु की इच्छा थी कि यदुकुल का नाश हो तो वह अच्छा हो और यदुकुल का सर्वनाश हो गया। युधिष्ठिर ने भीम से कहा कि नारद जी ने कहा था वह समय अब आ रहा है ऐसा लगता है। मुझे कलयुग की परछाई दिखाई दे रही है मेरे राज्य में अथर्म बढ़ रहा है। मंदिर में ठाकुर जी का स्वरुप आनंदमय नहीं दिखता है। सियार और कुत्ते मेरे समक्ष रोते हैं। तुझे मैं और क्या कहूं।  मैं कल घूमने गया था एक लोहार के पास एक वस्तु देखी। मैंने पूछा कि यह क्या है तो उसने कहा कि यह तो ताला है। लोगों के घरों से चोरी होने लगी है सो ताले लगाने पड़ते हैं। आज से 6 महीने पहले की बात है। एक वैश्य ने एक ब्राम्हण को घर बेंचा था। उस घर की बुनियाद में से कुछ सोना मिला। ब्राह्मण वह सोना लेकर सेठ के पास गया। सेठ धर्मनिष्ठ था उसने कहा कि मैंने तो मकान तुम्हें बेंच दिया था इसलिए उसमें जो कुछ भी मिला वह सब तुम्हारा ही है। ब्राह्मण ने कहा कि उस संपत्ति पर उसका कोई अधिकार नहीं है। मेरे राज्य की जनता कितनी धर्मनिष्ठ थी। उसी समय मैंने कहा था कि 6 महीने में इन दोनों का मन कलुषित हो जाएगा। वैसा ही हुआ। कल वे दोनों मेरे पास आए थे और धन पर अपना अधिकार जता रहे थे और अपने साथ एक वकील भी लेते आए थे। लगता है मेरे राज्य में कलिका प्रवेश अब तो हो ही गया है। कलि अर्थात कलह का प्रवेश। जिस घर में कृष्ण कीर्तन और कृष्ण की कथा होती है वहां कलि नहीं जा सकता। अर्जुन अब तक आया नहीं था और भीमसेन तथा धर्म राजा वैसी बातें कर रहे थे। इतने में अर्जुन भी आ गया उसके मुख पर तेज का आभास मात्र भी नहीं दिखता था। युधिष्ठिर ने उससे पूछा कि तेरा तेज कहां गया। अर्जुन तूने द्वार आए हुए अतिथि का सत्कार किए बिना ही तो कहीं भोजन नहीं कर लिया है ना। अतिथि भगवान का स्वरूप है। द्वार पर आए हुए अतिथि भूखे रहे तो यजमान के पुण्य का क्षय होता है। नचिकेता यमराज के घर 3 दिन तक भूखा प्यासा बैठा रहा था। यमराज ने आकर पूछा कि तुमने क्या खाया इन 3 दिनों। तो उसने कहा आप का पुण्य। मनुष्य शरीर की अपेक्षा आंख और मन से अधिक पाप करता है। गीता जी में भगवान ने अर्जुन को प्रमाण पत्र दिया है कि वह अपापी है, पवित्र है। इसलिए तो भगवान ने उसको गुह्यतम ज्ञान दिया। एक बार रात के समय उर्वशी अर्जुन से मिलने आई। अर्जुन ने उसका मुंह तक नहीं देखा। उसने उर्वशी से कहा कि माता जी मैं तो भारत खंड का वासी हूं मेरे लिए पराई स्त्री माता समान है। एकांत में जो काम को पराजित करे वही धीर है। मुझे पूरा भरोसा है कि परस्त्री गमन का पाप अर्जुन नहीं कर सकता। फिर भी वह आज निस्तेज क्यों है मुझे तो यह लक्षण कलयुग के लगते हैं। धर्मराजअर्जुन से पूछते हैं तेरे आत्म स्वरुप परमात्मा श्री कृष्णा कुशल तो है ना वे द्वारिका में ही है क्या। अर्जुन ने कहा क्या बताऊं भाई। मेरे प्रभु ने मेरा त्याग किया है। जिसने लाक्षाग्रह से हमें बचाया था बे अब तो स्वधाम पधारे हैं। प्रभु मुझे अंत काल में साथ नहीं ले गए। उन्होंने मुझसे कहा कि तू जब मेरे साथ आया ही नहीं था तो मैं तुझे अपने साथ कैसे ले जा सकता हूं। मैंने तुझे गीता शास्त्र का जो ज्ञान दिया है वह तेरी रक्षा करेगा। बड़े भैया आज तक मैं कभी हारा नहीं था किंतु कृष्ण विरह से व्याकुल हुआ मैं आज द्वारिका से लौट रहा था तो रास्ते में काबा लोगों ने मुझे लूट लिया। मुझे लगता है कि मुझ में जो शक्ति थी वह मेरी नहीं थी किंतु द्वारिकाधीश की थी और उनके चले जाने से वह शक्ति भी चली गई है। मुझे प्रभु के उन अनंत उपकारों की याद आ रही है। लाक्षाग्रह दहन आदि कई संकट अवस्था में उन्होंने हमारी रक्षा की थी। कृष्ण कृपा को याद करते करते अर्जुन कृष्ण विरह में रो रहा है। धर्म राजा से अर्जुन कह रहा है कि द्रुपदराज की राज्यसभा में मैंने जो मत्स्यवेध किया मैं भगवान की शक्ति के बल पर ही किया था।

कई महराज मत्स्यवेध न कर सके थे। कर्ण ने सोचा कि मैं मत्स्यवेध करूं। कृष्ण ने सोचा कि कर्ण ने मत्स्यवेध कर दिया तो मेरा अजुन रह जायेगा और द्रोपदी कर्ण की हो जायेगी। ऐसा सोच कर ही कृष्ण ने सभा में कर्ण का अपमान करवाया। श्रीकृष्ण ने एक दासी को द्रोपदी के पास भेजा। द्रौपदी ने हीन जातक कर्ण से विवाह करने से इन्कार कर दिया। मुझमें तो हिंमत ही न थी। किंतु मुझ पर भगवान की कृपादृष्टि थी जिससे मुझमें शक्तिसंचार हुआ और में उस दिन मत्स्यवेध कर सका। लाक्षागृहकी आग में पांडव जल कर मर गये हैं ऐसा मानकर दुर्योयधन ने तो उनका श्राद्ध भी कर दिया था। संसार में मनरूपी मत्स्य घूमता-फिरता है, उसको विवकरूपी बाण से मारो। जिसे दोपदी मिलती है उसका सारथी भगवान् को होना पड़ता है। द्रौपदी कृपाभक्ति का ही नाम है। मन को जब तक न मारोगे, कृष्णभक्ति प्राप्त नहीं होगी। मन को जो प्रिय है वह मत करो। मन की इच्छा के वश में नहीं होंगे तो धीरे धीरे वह अंकुश में आता जाएगा। आजतक मौजशौक में (आनंद-प्रमोद में), भोग में, पाप में कितना खर्च कर दिया उसका जीव कोई हिसाब ही नहीं रखता। ब्राह्मणको कुछ दिया हो तो उसे वह याद रखता है। हम और क्या कर सकते हैं। दस हजार रुपये का दान दिया है। अतकाल में जीव चिंता करता है कि मेरी बेटी का क्या होगा। मेरे भांजे का क्या होगा। किंतु तू यह तो सोच कि तेरा क्या होगा। जिस पर भगवान की कृपावृष्टि होती है वहीं इस मनमत्स्य को मार सकता है। भगवान की कृपादृष्टि जब तक न हो तब तक मन नहीं मरता। प्रभु की कृपा होगी तो मनमत्स्य मरेगा। मन मरेगा तो भक्तिरूपी द्रोपदी प्राप्त होगी। परमात्मा को कृपादृष्टि होने पर ही जीव मन को वश में कर सकता है। प्रभु की प्रार्थना न करने से मन मनुष्य को अधोगति की गर्त में फेंक देता है। अर्जुनको कृष्ण के कई उपकार याद आ रहे हैं। उन्होनें मुझे गीताका उपदेश दिया था, एक बार भगवान ने मुझसे कहा था कि कुछ मांगो। बड़े बड़ो पर महात्मा जन्ममरणके फेरो से मुक्ति पाने की इच्छा से जिनका ध्यान करते हैं उनसे मैंने मांगा कि इस युद्ध में मुझे जीत मिले। अफसोस, मुझे मांगना ही नहीं आया। किरातवध के समय में शंकर के साथ युद्ध कर सका वह भी श्रीकृष्ण के प्रताप से। बड़े भैया, द्रोपदीसे भी कृष्ण को कितना स्नेह था। द्रोपदी के केश पकडकर दुष्टजन उसे सभा से खींच लाए। आंसूभरी आंखों से द्रोपदी कृष्ण के चरणों मे जा गिरी। उन्होंने सभा में ही प्रतिज्ञा की कि इस अपमानका मैं बदला लूंगा, और कृष्ण ने उन दुष्टों की ऐसी दशा की कि उनकी पत्नियां विधवा बनी और उन्हें अपने केश स्वयं ही छोड़ने पड़े। बड़े भैया, याद करो वह प्रसंग कि जब हमार नाश करने के लिए कपट करके दुर्योधन ने दुर्वासा को भेजा था। भाजी के एक ही पत्ते से अक्षयपात्र भरके कृष्ण ने हमें उस संकट से बचाया था। दुर्योधन ने चार महिनो तक दुर्वासा को अपने यहां भोजन कराया। वे प्रसन्न हुए। उन्हाने दुयोधनसे वर मांगने को कहा। दुर्योधन ने सोचा कि दुर्वासा के शाप से पांडवों का नाश करने का यह अच्छा अवसर है। कल इस ऋषि का एकादशी का अनशन था। वैसे तो सूर्यदेवका अक्षयपात्र पांडवो के पास है, किंतु द्रौपदी के भोजन कर लेने के बाद उसमें से कुछ भी नहीं मिलता। दुर्वासा द्रौपदी के भोजन करने के बाद वहां पहुंचेंगे और द्रौपदी से भोजन न मिलने पर क्रोधित होगे और पांडवों को शाप देंगे, जिससे पांडवों की दुर्गति होगी। दुर्योधनने ऐसा कुविचार करके दुर्वासा से विनति की कि आप अपने दस हजार शिष्यो को साथ ले जाकर युधिष्ठिर का आतिथिय स्वीकार करे क्योंकि अपने कुटुंब के वे ही गुरुजन है। हां, द्रौपदी बेचारी भूखी न रह जाय इसलिए पांडवों के भजन कर लेने के बाद ही वहां आप जाइएगा। संत की सेवा सदभाव से करेंगे तो फलीभूत होगी किंतु दुर्भाव से करेंगे तो सफल ना होगी। चार मास तक दुर्वासा को अपने यहाँ भोजन कराकर दुर्योधन ने पांडवो के सर्वनाश की इच्छा की। इसी दुर्भावना के कारण उसकी अपनी ही हानि हुई। अन्यथा संत को भोजनदान करने से पुण्य मिलता है। दुर्योधन ने संतकी सेवा तो की किंतु किसी के सर्वनाश के हेतु की थी। सो उसे पुण्य नहीं मिला। दुर्योधन की विनातिके अनुसार दुर्वासा दस हजार शिष्यों के साथ पांडवो के आंगन में पधारे। दुर्वासा ने युधिष्ठिर से कहा- राजन कल एकादशी का अनशन था सो आज हमें बडी भूख लगी है। आपके घर हम भोजन करने की इच्छा से आये हैं। सूर्यनारायण द्वारा दिये गये अक्षयपात्र से पांडव मध्याह्नकाल में आये हुये ब्राह्मणको भोजन कराते हैं। अक्षयपात्र संकल्पानुसार भोजन देता था। पांडव तो ऐसे भक्त है कि विपदावस्थामें भी ईश्वरकी कृपा का ही दर्शन और अनुभव करते हैं। आज द्रौपदी भोजन कर चुकी है सो अक्षयपात्र से कुछ भी मिलने की संभावना थी नहीं। फिर भी युधिष्ठिरजी ने दुर्वासासे कहा कि बडी कृपा हुई हम पर कि आपने हमारा आँगन पावन किया। आप सब गंगास्नान कर ले इतने में भोजन तैयार कर देंगे। धर्मराजा का धैर्य तो देखो कि घर में अन्न का एक कण भी नहीं है फिर भी उन्होंने दस हजार ब्राह्मण को भोजनके लिये आमंत्रण दिया। युधिष्ठिरको विश्वास है कि मैंने आज तक कभी अपने धर्म की उपेक्षा नहीं की है। इससे धर्मस्वरूप प्रभु मेरी रक्षा अवश्य करेंगे। भीम, अर्जुन, द्रौपदी आदि चिंता कर रहे हैं कि इन सबको भोजन कैसे करायेगे। द्रौपदी भी सोचती है कि अब अक्षयपात्र भी काम नही आ सकता क्योंकि मैंने भोजन कर लिया है। द्रौपदी दुःख से कातर हो रही थी कि भोजन न मिलने से क्रोधित होकर दुर्वासा शाप देंगे और मेरे पांडवों का सत्यानाश हो जायेगा। द्रौपदी द्वारिकाधीश की प्रार्थना करने लगी। नाथ, मेरी लाज रखना, नहीं तो जगत् तुम्हारी भी खिल्ली उडायेगा। द्रौपदी ने आर्तनाद किया कि जिस प्रकार आज तक तुमने हमारी सहायता करके लाज रखी है उसी तरह आज भी हमारी लाज रखना। आज जो हम इन दस हजार संतो को भोजन न दे सकेगे तो दुर्वासा शाप देंगे और हमारा सर्वनाश होगा। जीव जब तक प्रभुको प्रेमसे घबडाकर पुकारता नहीं है तब तक कुछ नहीं होता। जीव संकटावस्था मे प्रभुको पुकारता है। द्रौपदी ने दुःख से कातर होकर घबडाकर प्रभुको पुकारा। परमात्माने द्रोपदीकी आर्तवाणी सुनी तो उसकी सहायता करनेके लिये आनेको तैयार हो गये। भक्त जब ह्रदयपूर्वक कीर्तन करता है तो भगवान का सिंहासन भी डोलने लगता है। भगवान् जाने की तैयारी कर रहे थे तब उत्थान का समय हो रहा था। रुक्मिणि जी थाल में मेवा लेकर आई थीं। एक ओर रूकमणि कृष्ण से भोग लगाने का आग्रह कर रही थी। और भोगके बाद जानेको कहती थी तो दूसरी ओर द्रौपदी आर्तनाद कर रही थी। कृष्ण ने वहाँ जानेका सोचा तो रुक्मिणी पहले भोग का आग्रह करने लगी तो भगवान ने कहा कि दस हजार ब्राह्मणो को द्रौपदी वनमें भोजन कैसे करायेगी? मै तो चला, भोजन में भी वहीं कर लूंगा। द्वारिकानाथ दौडते हुए द्रौपदी की वह कुटिया मे आये जहां वह बडी तन्मयता से प्रार्थना कर रही थी। भगवान् वही प्रगट हुए। इस प्रकार तन्मयता से कीर्तन करो कि भगवान बांहों में लेकर तुमसे कहें कि आज खोलो, मैं आ गया हूं। भगवान ने द्रौपदी से कहा कि देख मैं आ गया है। मुझे बडी भूख लगी है। कुछ खानको तो दे। द्रौपदी ने हाथ जोड़कर कहा कि हम तो लुट गये हैं। हमारे घर में कुछ भी नहीं है। आप मजाक न करे। दस हजार संतो को भोजन करना है इसीलिये मैंने आपको पुकारा है। आप उसकी व्यवस्था करके हमारी लाज रख लो बडी कृपा होगी। तो भगवान् कहते हैं कि उन संतों के भोजन का प्रबंध तो बाद में होता रहेगा किंतु पहले मेरे लिए खाने की तो कुछ बात कर। तू अपने भोजन से पहले मेरे लिए हमेशा कुछ न कुछ रख लेती है तो आज जो भी तूने रख छोडा हो वह मुझे दे। द्रोपदी कहती हैं कि नाथ, आज तो मैं भूल ही गई थी सो आपके लिए भी कुछ भी नहीं रहा है। भगवान ने कहा कि वह तुम्हारा अक्षयपात्र मुझे दिखाओ। शायद मेरे लिए उसमें कुछ हो। द्रौपदी ने प्रभुके हाथ मे अक्षयपात्र रख दिया। उन्होने उसमें देखा तो सब्जी का एक पत्ता उसमें रह गया था। वैसे तो अक्षयपात्र में वह पत्ता कहां से आ सकता था किंतु भगवान ने प्रेम प्रयोग से पत्ता उत्पन्न कर लिया। उन्होने उस पत्ते का प्राशन किया। परमात्मा को जीव जब प्रेमसे कुछ भी देता है तो उन्हें तृप्ति हो जाती है। अंतर्यामी रूप से वे सभी जीवोमें व्याप्त हैं अतः उनकी जब तृप्ति होती हैं तो सभी जीव भी तृप्त होते हैं। परमात्माको हजारों बार मनाओ तब कहीं किसी दिन वे भोग लगाते हैं। कन्हैयाको रोज भोग लगाओ। किसी दिन कुछ भी वे ग्रहण करेगे तो भी तुम्हारा बेडा पार हो जाएगा। परमात्माको अल्पमात्रा में भी भोजन कराओगे तो सारे जगत को भोजन कराने का पुण्य मिलेगा। भगवान् द्रौपदी से कहते है कि आज जगत के सभी जीव तृप्त हो गए। भगवान्, दुर्वासा और अन्य दस हजार संत सभी तृप्त हो गए। युधिष्ठिरने जाते हुए ब्राह्मणों को रोकने की आज्ञा दी । भीम संतों को बुलाने गया तो वहां वे तृप्ति की डकार ले रहे थे। वे भोजन करने के लिए आने का नाम ही नहीं लेते थे। दुर्वासाने सोचा कि यह काम कृष्ण का ही हो सकता है। उन्होने भीमसे पूछा कि कहीं द्वारिका से कृष्ण तो नहीं आए है न। भीमने कहा कि वे तो कभी के आए हुए हैं और द्रौपदी से बातचीत कर रहे हैं। वे तो कहते है कि दुर्वासा तो मेरे गुरु हैं सो मैं उनको आज प्रेम से भोजन कराना चाहता हूँ। दुर्वासा ने कहा कि कृष्ण मेरे गुरु के भी गुरु है। में उनका गुरु नहीं हूं। अब मुझे भोजन करने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम्हारा संयम, सदाचार, धर्मपालन, कृष्णभक्ति, कृष्ण प्रेम देखकर मुझे बिना भोजन किए ही तृप्ति हो गई है। मैं संतुष्ट हुआ हूं। दुर्वासा ने आशीर्वाद दिया कि तुम्हारी (पांडवोकी ) विजय होगी और कौरवों का विनाश होगा। बड़े भैया, सेवा दुर्योधन ने की और आशीवाद आपको मिला। शंकर स्वामी कहते हैं कि यदि जीव और ब्रह्म एक न हो तो श्रीकृष्ण पत्तों का प्राशन करे और दुर्वासा तृप्त हों ऐसा कैसे हो सकता है? जीव और ईश्वरका भेद आभासमात्र है और तत्व तो एक ही है। भगवान के स्वधामगमन और यदुवंशके विनाशका समाचार सुनकर युधिष्ठिर ने स्वर्गारोहण का निश्चय किया। परीक्षितको राजसिंहासन दे दिया। पांडवों ने द्रौपदी का साथ लेकर स्वर्गारोहणके लिए हिमालयकी दिशा में प्रयाण किया। केदारनाथमें उन्होंने भगवान् शिवजी की पूजा की। जीव और शिवका मिलन हुआ। उसके आगे निर्वाण पंथ है। पांडवों ने वही रास्ता लिया। चलते चलते सबसे पहले द्रौपदीका पतन हुआ क्योंकि वैसे तो वह भी पतिव्रता थी किंतु अर्जुनके प्रति उसे अधिक प्रेम था सो वह उसकी ओर पक्षपातका भाव रखती थी। दूसरा पतन हुआ सहदेव का। क्योकि उसे अपने ज्ञान का अभिमान था। तीसरा पतन हुआ नकुल का क्योंकि उसे अपने रूप का अभिमान था। फिर पतन हुआ अर्जुन का। उसे अपने बलका अभिमान था। फिर पतन हुआ भीम का । उसने धर्मराज से पूछा कि मेरा पतन क्यों हुआ। मैंने तो कभी कोई पाप किया ही नहीं था। युधिष्ठिर ने कहा कि खाता बहुत था सो तेरा पतन हुआ। खाने के समय आँखे खुली रखो, किंतु संतो को और देवको भोजन कराते समय आँखे बंद रखो।

धर्मराज अकेले आगे बढ़ने लगे। धर्मराजा की परीक्षा करने के लिए यमराज कुत्ते का रूप लेकर उनके पास आये। उन्होन दूसरा भी रूप लिया और युधिष्ठिर से कहा कि मैं तुम्हें स्वर्ग में ले जाऊंगा किंतु तुम्हारे पीछे पीछे जो कुता चला आ रहा है उसे स्वर्ग में प्रवेश न मिलेगा। तो युधिष्ठिर ने कहा कि जो मेरे साथ साथ चला आया है उसे मैं अकेला कैसे छोड़ दूं। उसे छोड़कर मैं स्वर्ग में नहीं आ सकता। सात कदम साथ चलनेवाला मित्र बन जाता है। धर्मराजा सदेह स्वर्ग गये। तुकाराम भी सभीको राम राम कहते हुये स्वर्ग गये थे। आम्ही जातो आमुच्या गावा, आमचा राम राम घ्यावा। ऐसा कहते हुये वे स्वर्ग गये। मीराबाई भी सदेह स्वर्गमें गयी थी। वे द्वारिकाधीश मे सदेह समा गयी थी, लीन हो गई थीं। मेवाड़ में उनका बहुत कष्ट मिला था सो उन्होनें मेवाड़ छोड दिया। उनके जाने के बाद मेवाड़ बहुत दु:खी हुआ। वहां यवनों का आक्रमण हुआ। राणा जी ने सोचा मीरा फिर मेवाड़ आए तो देश सुखी हो। राणाजीने ब्राह्मणाको और भक्तों को मीरा को लाने के लिये भेजा। मीरा ने उनसे कहा कि कल यदि मेरे द्वारिकानाथको अनुज्ञा मिलेगी तो मैं आपके साथ आउँगी। अगले दिन मीराने दिवय श्रृंगार किया। वे आतुर थीं कि आज उन्हें अपने गिरिधर गोपालसे, अपने प्राणप्रियतम श्रीकृष्णसे मिलना है। मैं इस संसार में अब रहना नहीं चाहती। कृपा करो मेरे नाथ! कीर्तनके साथ साथ वे नर्तन भी करने लगी। आज उनका अंतिम कीर्तन था। द्वारिकानाथ ने उनको अपने हृदय से लगा लिया। मीरा सदेह द्वारिकाधीश में विलीन हो गयीं। कुष्ण भक्ति से उनका शरीर इतना दिव्य हुआ था कि वह सशरीर कूष्ण में विलीन हो गयी। आत्मा और परमात्माका मिलन कोई आश्चर्यकी बात तो नहीं है। किंतु कृष्णप्रेमसे जड शरीर भी चेतन बनता है और चेतनमें विलीन हो जाता है। दिव्य पुरुष सशरीर परमात्मामें जा मिलते हैं। प्रयाण और मरणमें भेद है। अंतिम श्वास तक नित्यकर्म करते रहे उसका प्रयाण कहा जायेगा और मलिन अवस्थामे हाय हाय करता हुआ देह छोड़े उसका मरण कहा जायेगा। पांडव प्रभुके धाम मे गये। उनकी मृत्यु उजागर हो गयी। क्योंकि उनका जीवन श्रेष्ठ था और शुद्ध था। उन्होने अपने जीवनकालमें कभी धर्मको छोड़ा नहीं था। धनकी अपेक्षा धर्म श्रेष्ठ है। धन इस लोकमे कुछ सुख देता है और कभी कभी दुख भी देता है। किंतु धर्म तो जीवन और परलोक दोनोको उजागर करता है। धर्म मृत्युके बाद भी साथ साथ आता है। अब परीक्षित राज करने लगे। उन्होंने धर्मसे प्रजापालन किया। तीन अश्वमेघ भी किये। अश्वमेव यज्ञ के समय घोड़े को मुक्तता से विचरण कराया जाता है। वासना ही घोडा है। वासना कभी कहीं बंधती ही नहीं है। आत्मस्वरूप विलीन होनपर ही वह अंकुशित होती है। किसी विषय में वासना फंस न जाय उसका ध्यान रखना जरूरी है। इन्द्रिय, शरीर और मनोगत वासनाका नाश ही तीन यज्ञ हैं। परीक्षित ने यही तीन यज्ञ किये। चौथा यज्ञ बाकी था। बुद्धिरगत वासनाका नाश तो शुकदेवजी जैसे ब्रह्मनिष्ठ गुरू की कृपा से ही होता है। अतः चौथा यज्ञ अभी तक हुआ नहीं था। शुद्ध आचार हो तो विचार शुद्ध होते हैं। जलशुद्धि और अन्नशुद्धिकी मर्यादाओं के पालन से सिद्धि मिलती है। आचार शुद्ध रखो। स्वेच्छाचारी का पतन होता है। परीक्षित के आचार अति शुद्ध थे अर्थात् धर्मशास्त्रकथित मर्यादा के अनुसार थे। सो उनमें कलिपुरूष का प्रवेश न हो सका। कलिने सोचा कि परीक्षित कुछ पाप करे तो में उसमें प्रवेश पा जाऊंगा। राजा के मन में पहले प्रवेश करूं तो प्रजा में भी मेरा प्रविष्ट हो सकेगा। समाजको सुधारना अब अशक्य सा हो गया है। किंतु व्यक्तिगत जीवन तो सुधर सकता है। अचार और विचार से जो शुद्ध होता है उसके घर में कलि नहीं जा सकता। जिसके घर में कृष्णकीर्तन, कृष्ण सेवा नित्य होती हो उसके घर में कलि प्रवेश नहीं कर सकता। आज भी कुछ वैष्णव घर ऐसे हैं जिसमें कलि प्रवेश नहीं पा सका है। शास्त्र की रचना मनुष्यके कल्याण के लिए ही की गई है। जो आचारधर्म छोड देता है। उसके विचार भी अशुद्ध हो जाते हैं। धर्म माता-पिता हैं। पत्नी की पसंदगी हो सकते है माता-पिता की नहीं। धर्म का परिवर्तन नहीं किया जा सकता। वर्णाश्रमधर्म के पालन से आचार शुद्ध हो सकते हैं। गायकी सेवा करो गाय खाती तो है , किंतु दूध भी देती है। जो भगवान ने संपत्ति दी हो तो गौपालन करो। आजकल लोग धनसंपति मिलने पर कुत्ते पालते हैं। कुत्ते का अनादर करने की बात नहीं है किंतु मर्यादा को छोडकर अधिक प्रेम न करो। आँगनमें आप हुए कुतेको रोटी खिलाना धर्म है किंतु कुछ लोग उसे अपनी मोटर में बिठाकर घूमते-फिरते है। और तो हम क्या कह सकते हैं ऐसे लोगों के लिए। किंतु अगले जन्म में स्वयं ही कुत्ता होनेकी यह तैयारी है। जीवमात्र में परमात्मा है। किंतु प्रत्येकका शरीर भिन्न है और कर्म भी भिन्न भिन्न है। इसलिए हरेकके साथ पीना और खाना इष्ट नहीं है। एकादशी के दिन अन्न नहीं खाना चाहिए। एकादशीके दिन अनशन करना धर्म है। किंतु हम अपने ही शास्त्र की बात नहीं मानते। और जब डॉक्टर कहता है कि विषमज्वर( टाइफाइड) है और इक्कीस दिन भोजन मत करना तो उसकी बात मान लेते हैं और इक्कीस दिनका अनशन कर लेते हैं। जिस तरह पापीके मन में कलि प्रवेश कर लेता है उसी तरह शास्त्रकी मर्यादा का उल्लंघन करनेवाले के घरमें भी घुस जाता है। यदि आचार-विचार शुद्ध हो तो कलि तुममे प्रवेश नहीं कर सकेगा। व्यवहार भी शुद्ध ही होना चाहिए। सत्यपूर्ण, शुद्ध व्यवहार न कर और केवल हर पूर्णिमाके दिन सत्यनारायण की पूजा करे तो उससे क्या लाभ होगा। असत्यभाषी की पूजा सत्यनारायणको अस्वीकार्य है।

एक दिन एक आश्चर्यजनक घटना हुई। परीक्षित दिग्विजय करने निकले है। घूमते फिरते वे सरस्वती नदी के किनारे पर आये। वहां गाय-बैलों को एक काला पुरुष लकडी से पीट रहा था। बैल धर्मका स्वरूप है और गाय पृथ्वीका स्वरूप है। गायकी आखो से आँसू बह रहे हैं। धर्मरूप बैल उससे दुःखका कारण पूछता है। पृथ्वी कहती है श्रीकृष्णने इस पृथ्वीलोकसे अपनी लीला समेट ली है सो यह संसार पापमय कलियुगकी कुदृष्टिका शिकार हुआ है। धर्मकी मर्यादाका पालन ठीक तरहसे करोगे तो ज्ञान अपने आप ही प्रकट होगा। धमारूढ रहोगे तो ज्ञानगंगाका अवतरण होगा। शिवजी नदी पर अर्थात् धर्म पर आरूढ हे सो उनके सिर पर ज्ञानगंगा है। धर्मके चार अंग मुख्य है- (१) सत्य (२) तप (३) पवित्रता और (४) दया। इन चारोका योगफल ही धर्म है। इन चारों अंगों पर जब धर्म आधारित था तब सत्ययुग था। तीन अंगों पर आधारित था तब त्रेतायुग आया, दो अंगो पर ही आधारित रहा तब द्वापरयुग आया और एक ही अंग पर धर्म आधारित रह गया तो कलियुग आया। सत्य: सत्य ही परमात्मा है। सत्य और परमात्मा भिन्न नहीं है। जहां सत्य है वही परमात्मा है। जो असत्य बोलता है उसके पुण्यका क्षय होता है। सत्यके सहारे नर नारायणके पास जा सकता है। जो हितभाषी और मितभाषी है वह सत्यवादी हो सकता है। तप: तप करो। हर प्रकारके सुखका उपभोग न करो। थोडी सी तपस्या रोज करो। जो हरेक का उपभोग करता है उस पर परमात्मा कृपा दृष्टि नहीं करते। जो हरेक प्रकार के लोकिक सुखोंका उपभेाग करता है उस पर परमात्मा कृपादृष्टि नहीं करते। दुःख सहकर परमात्माकी आराधना करना ही तप है। दुःख सहता हुआ प्रभुभजन करे वही श्रेष्ठ है। जीभ जो मागे वह सब कुछ उसे देते मत रहो। कुछ सहन करना भी सीखो। इन्द्रियों का स्वामी आत्मा है। इन्द्रिय जो कुछ मांगे वह उसे देने से तो आत्मा उसका गुलाम बन जायेगा। विधिपूर्वक अनशन करने से पाप भस्मीभूत होते हैं। भगवान के लिए कष्ट सहना, दुःख सहना ही तप है। वाणी आर वर्तनमें संयम और तप होना ही चाहिए। पवित्रता : कलियुग में पवित्रता रही ही कहाँ है ? बाहरसे सब पवित्र लगते है और अंदरसे सब मलिन हो गए हैं। वस्त्रका दाग तो मिट सकता है किंतु कलेजे पर पड़ा दाग कभी नहीं मिटता। जीवात्मा वैसे तो सबकुछ छोड़कर जाता है किंतु मनको तो वह अपने साथ ही लेकर जाता है। पूर्वजन्मका शरीर नहीं रहता किंतु मन तो रहता ही है। लोग वस्त्र, अन्न, आचार आदिकी देखभाल बहुत करते हैं किंतु मृत्युके बाद भी जो साथ आनेवाला है उस मनकी कोई देखभाल नहीं करता। मृत्युके बाद जो साथ आनेवाला है उसीकी चिंता करो, उसीकी देखभाल करो। जिस तरह कपडोको स्वच्छ रखते हो उसी तरह मनको भी स्वच्छ रखो। जिस तरह संसार-व्यवहार निभाती हुई माता अपने बच्चे की देखभाल करती है उसी तरह व्यावहारिक कर्म करते हुए भी ईश्वरके साथ संबंध बनाये रखो। हमेशा सोचते-संभालते रहो कि अपना मन कभी न बिगडे। दयाः धर्मका चौथा अंग हे दया। श्रुति कहती है जो केवल अपने लिये अन्न पकाता है वह अन्न नही, पाप खाता है। धर्मके इन चार चरणो में सत्य सर्वश्रेष्ठ है, सर्वोपरि है। महाभारतमै सत्यदेवकी कथा है। लक्ष्मी चंचल है। वह किसी न किसी पीढीके हाथोसे चली ही जायेगी। एक दिन प्रातःकाल सत्यदेव जब जगा तो उसने अपने घरसे एक सुंदरी को बाहर जाते हुये देखा। राजाको आश्चर्य हुआ। उसने स्त्री से पूछा कि वह कौन है! उसने उत्तर दिया। कि उसका नाम लक्ष्मी है, मैं अब तेरे घरसे जा रही हूं। राजाने अनुज्ञा दी। कुछ देर बाद एक सुंदर पुरुष घरसे बाहर निकला । राजाने जब उससे पूछा कि वह कौन है, तो उसने कहा कि वह दान है। जब लक्ष्मीजी यहांसे चली गयी तो तुम दान कैसे कर सकोगे सो मैं भी लक्ष्मीके साथ ही जा रहा हूं। राजाने उसे भी जाने दिया। फिर एक तीसरा पुरुष बाहर जाने लगा। उसने बताया कि वह है सदाचार जब लक्ष्मी और दानही न रहे तो में रहकर क्या करूंगा? राजाने उसे भी जानेकी अनुमति दे दी। फिर एक और सुंदर पुरूष बाहर जाते हुए दिखा। पूछने पर उसने अपना नाम बताया कि वह यश है। वह बोला*जहा लक्ष्मी, दान और सदाचार न हो वहां मैं नहीं रह सकता। राजाने उसे भी जाने दिया। कुछ देर बाद एक और सुंदर युवक घरसे निकलकर जाने लगा। पूछने पर उसने अपना परिचय दिया कि वह सत्य है। जब आपके यहां लक्ष्मी, दान, सदाचार और यश नहीं तो में अकेला कैसे यहां रहू? मैं भी उनके साथ जाऊंगा। तो सत्यदेव राजा ने कहा कि मैंने तो आपको कभी छोडा ही नहीं फिर आप मुझे क्यो छोड़कर जा रहे हैं। आपको अपने पास रखनेके लिये ही मैनें लक्ष्मी-यश आदिका त्याग किया है। मैं आपको जाने नहीं दूंगा। आप मुझे छोड़कर चले जायगे तो मेरा तो सर्वस्व लुट जायेगा। राजाकी इस प्रकारकी प्रार्थनाके कारण सत्य ही नहीं गया और जब सत्य ही नहीं गया तो लक्ष्मी, दान, सदाचार और यश भी राजाके घर वापस लौट आये।। जहाँ सत्य होता है वहाँ लक्ष्मी, दान, सदाचार और यशको आना ही पड़ता है। विना सत्य के ये सब व्यर्थ हैं इसलिये यह स्पष्ट है कि सत्य ही सर्वस्व है। बाकीकी चार संपत्तियां चली जाये तो कोई चिन्ता नहीं, किंतु सत्य नहीं जाना चाहिये। सत्य रहेगा तो सब कुछ रहेगा। सुतजी वर्णन करते हैं। इस अध्यायमे धर्मकी व्याख्या की गयी है। सत्य, तप, पवित्रता और दान ये चार ही धर्मके प्रधान अंग है। इन चारोका समन्वय ही धर्म है। इन चार तत्त्वो से जो परिपूर्ण है वही धार्मिक है। सत्ययुगमे ये चारों तत्व थे। फिर त्रेतामे सत्य चला गया। द्वापर में सत्य और तप न और कलियुगमे सत्य और तपके साथ साथ पवित्रता भी चली गयी। कलियुगमें केवल दान ही रह गया। कलियुगमे दान ही प्रधान है। दानं एके कलियुगे। कलियुगमे केवल दान और दयाके सहारे ही धर्म रह गया है। परीक्षित राजाने देखा कि एक बैल केवल एक ही पांव पर खड़ा है और एक व्यक्ति उसे लकड़ी से मार रहा है। राजाने बैलसे पूछा कि तेरे तीन चरण किसने काट दिए। धर्मरूपी बैलने कहा कि राजन्, में अभी तक यह निर्णय नहीं कर सका हूं कि मेरे पांव किसने काटे और कौन मुझे दुःखी कर रहा है। कोई कहता है कि काल दुःख दे रहा है तो कोई कहता है कि कर्म ही मनुष्यको दुःख देता है। कोई दुःखका कारण स्वभाव बतलाता है। अपना स्वभाव शांत रखो। काल, कर्म और स्वभाव ही जीवको दुःख देते है। राजन्, मेरे दुखका कारण आप ही सोचे। राजा समझ जाए कि वह कठोर पुरुष जो कि गाय बैलोको सता रहा है कलि ही है। यह कलि ही धर्मनिष्ठों को सताता है। वे कालिको दंड देनेको तैयार हुए तो कलि राजाकी शरण में आया। कलिने परीक्षितके चरणों का स्पर्श किया और यही कारण है कि परीक्षित राजाकी मति भ्रष्ट हुई। जिस मनुष्यके स्वभाव और चरित्रसे हम अनजान हो उसका हम कभी स्पर्श नहीं करना चाहिए। जिस व्यक्तिका तुम स्पर्श करोगे उस व्यक्तिके कुछ न कुछ परमाणु तुम्हारे शरीर में प्रविष्ट हो जाएंगे। पुण्यशाली व्यक्तिके परमाणु पवित्र होते है और पापी व्यक्तिके परमाणु अपवित्र होते हैं। जैसे व्यक्तिको स्पर्श करोगे वैसे व्यक्तिके परमाणु तुम्हारे शरीर में घुस जाएंगे। परीक्षित राजाने कलिको स्पर्श करने दिया तो उनकी बुद्धिमें विकार आ गया। राजा जानते थे कि यह कलि हैं, अपवित्र है सो उसे दंड देना चाहिए। दुष्टों को दंड देना राजाका धर्म है। फिर भी उन्होंने कलिके प्रति दया जताई। उन्होने कलि से कहा मारूंगा नहीं कितु तू मेरे राज्यकी सीमासे बाहर चला जा। मेरे राज्य में तेरे लिए कोई स्थान नहीं है। कलिने राजासे प्रार्थना की और कहा कि मैं अब कहां जा सकता है तो परीक्षित ने उसे चार स्थानों में रहने की अनुमति दी। वे स्थान है, छूत, मदिरा, नारीसंग और हिंसा। इन चार स्थानों में क्रमशः असत्य, मद, आसक्ति और निर्दयता ये चार अधर्म रहते हैं। जुएं और सट्टे का धन जिसके घरमें आता है वहां साथ साथ कलि भी आ जाता है। जहां सट्टा वहां बट्टा ( दाग ) और यह बट्टा (दाग ) जीवनमें पकी तरह लग जाता है। कई लोग ऐसे भी हैं जो जुएं और सट्टे में कमाते हैं और फिर उस धन का दान करते हैं। वे मानते हैं कि चलो, दान किया और मेरी शुद्ध हो गई। परंतु यह सब व्यर्थ ही है। यह सब अनीतिका धन है, ऐसे धनके दानसे कभी जीवन शुद्ध नहीं होता। अधर्मका धन प्रभुको स्वीकार्य है ही नहीं। शास्त्रनिषिद्ध भोज्य वस्तुएं जहां खाई जाती है, जहां जानबूझकर हिंसा की जाती है। वहां कलि अवश्य रहता है। इन चार स्थानोकी प्राप्ति होने पर भी कलिको संतोष न हुआ। उसने राजा से कहा कि ये चार स्थान तो गंदे हैं। कोई अच्छा-सा स्थान मुझे रहनेको मिले तो ठीक है तो परीक्षित ने उसे सुवर्ण में रहने को अनुमति दे दी। अशुद्ध साधनसे जब सुवर्ण घरमें आता है तो कलि भी उसके साथ आ धमकता है। अनीति और अन्याय से प्राप्त धन में कलि है। अनीति द्वारा धन कमाने वाले धन को तो कलि दुखी करता ही है पर जो वह धन अपने वारिस के लिए रखता है वह वारिस भी दुखी होता है। असत्य, मद, काल, वैर और रजोगुण यह पांच जहां न हो, वही आज भी सत्ययुग ही है। जिसके घर में नित्य प्रभुकी सेवा और स्मरण होता है, जिसके घर में आचार-विचारका पालन होता है उसके घरमे कालिका प्रवेश कभी नहीं होता। बैलके तीनो पग परीक्षितने फिर लगा दिए अथात् धर्मकी फिर स्थापना की। कलिने सोचा कि राजाने पांच स्थान रहनेके लिए दिए हैं। अब कोई तकलीफ नहीं है। अब परीक्षित राजा के घरमें भी कभी घुस जाऊँगा। एक दिन परीक्षितको जिज्ञासा हुई कि देखें तो सही कि मेरे दादाने मेर लिए घरमें क्या क्या रख छोडा है। एक पेटी में से सुवर्णमुकुट मिला। विना कुछ सोचे ही राजाने मुकुट पहन लिया। यह मुकुट तो जरासंध का था। जरासंध के पुत्रने सहदेवसे वह मुकुट मांगा था कि मेरे पिताका मुकुट मुझे दे दो। मुकुट लौटानको सहदेवकी इच्छा न थी। फिर भीम जबर्दस्ती यह मुकुट लाया था। सो यह धन अनीतिका। अनीतिका धन उसके कमाने वालेको और वारिसको भी दुखी करता है। इसीलिए उस मुकुटको पेटीमें बंद करके रखा गया था। आज परीक्षितने देखा तो उसे पहन लिया। वह मुकुट अधर्मसे लाया गया। इसलिए इसके द्वारा कलिने परीक्षितकी बुद्धि में प्रवेश किया। इस मुकुट को पहनकर परिक्षित राजा वन में शिकार करने गए। यहां एकदा शब्द का प्रयोग किया गया है। राजा वैसे तो कभी शिकार करने के लिए जाते नहीं थे किंतु आज गए हैं। अनेक जीवाकी हत्या की। मध्याह्नकाल होने पर राजाको भूख और प्यास सताने लगी। उन्होने एक ऋषिके आश्रममें प्रवेश किया। शमीकऋषि समाधिमें लीन थे। कोई संत जप-ध्यानमें बैठे हो वहां मत जाना। यदि जाना पड़े तो प्रणाम करके लौट आओ। उस समय लौकिक बात न छेड़ो। प्रभुके साथ एक होनेकी इच्छा संतकी होती है। लौकिक वातें उनके तप-ध्यान-भजनमें वाधारूप वनेंगी। परिक्षित ने सोचा कि इस देशका मैं राजा हूं फिर भी ऋषि मेरा स्वागत क्या करते नहीं है। शायद स्वागत न करनेका नाटक ही वे कर रहे हो। राजाकी बुद्धिमें कलिने प्रवेश किया था। अतः शमीक ऋषिकी ही सवा करनेकी अपेक्षा राजा ऋषिसे सेवाकी अपेक्षा कर रहे हैं। उन्हें दुर्बुद्धि ने आ घेरा। उन्होंने एक मरा हुआ सांप शमीकऋषिके गलेमें पहना दिया। उन्होने तपस्वीका अपमान किया। अन्य को अपमानित करनेवाला स्वयं अपना ही अपमान करता है। अन्यको छलनेवाला खुद अपनको ही छलता है। क्योकि सभीमें आत्मा तो एक ही है। राजालन शमीकऋषि के गलेमें तो मरा हुआ साप पहनाया किंतु ऐसा करके उन्होंने अपने गले में तो मानो जीवित सांप ही पहन लिया। सर्प कालका स्वरूप है। सर्प साक्षात काल का स्वरूप है। सभी इन्द्रियवृत्तियों को अंतर्मुख करके प्रभु में स्थिर हुआ ज्ञानी जीव ही शमीकऋषि है। ऐसे ज्ञानी जीव के गलें में सर्प पहनाने का अर्थ है काल को मारना। जितेन्द्रिय योगी का काल स्वयं मरता है अर्थात काल उसे प्रभावित नहीं कर सकता। राजाका अर्थ है रजोगुणमे फंसा, भोगप्रधान विलासी जीव। ऐसोंके गलेमें सर्प लटकता है। अर्थात् जीवित सर्प उसके गलेमें है। शमीककृषिके पुत्र श्रृंगी ने जब यह बात जानी तो वह क्रोधसे भड़क उठा कि ऋषिका अपमान करनेवाला यह राजा क्या समझता है अपने मनमें उसने सोचा कि ब्रह्मतेज अब भी जगत में विद्यमान है। मै राजाको शाप दूंगा। श्रृंगीने शाप दिया राजाको कि तूने तो मेरे पिताके गलेमें मरा हुआ सांप पहना दिया, किंतु आजसे सातवें दिन तुझे तक्षकनाग डंसेगा। परीक्षितने अपने सिरसे मुकुट उतारा तो तुरंत उसे अपनी भयंकर भूलका भान हुआ। मैने आज पाप किया। मैने मतिभ्रष्ट होकर ऋषिका अपमान किया। जब मति भ्रष्ट हो जाय तो मान लो कि कुछ न कुछ अशुभ अवश्य होगा। पाप हो जाय तो उसका विचार करके अपने शरीरको सजा दो। भोजन करनेसे पहले सोच लो कि कि मेरे हाथोसे कुछ पाप तो नहीं हो गया है न। जिस दिन पाप हुआ हो उस दिन अनशन करो। तो फिर कभी पाप नहीं होगा। धन्य है परीक्षित राजा, उसने जीवनमे केवल एकबार ही पाप किया था किंतु पाप हो जानेके बाद उसने पानी तक नहीं पिया। ऋषिकुमार द्वारा दिए गए शापकी बात सुनकर उसने सोचा कि अच्छा ही हुआ कि मुझे मेरे पापकी सजा मिल गई। परीक्षित सोचते है कि मैं संसारके विषय सुखोमे फंस गया था अतः असे सावधान करने के लिए ही प्रभु ने मुझ पर यह कृपा की है। मुझे अगर शाप न मिला होता तो मैं भला कब वैराग्य धारण करता ? मेरे लिए प्रभुने शापावतार धारण किया है। मृत्यु सिर पर मंडरा रही है ऐसा सोचते रहोगे तो पाप नहीं होगा। परीक्षितने गृहत्याग किया और वे गंगातट पर आए। उन्होंने गंगास्नान किया और यह निश्चय किया कि अन्नजलका त्याग करके अब प्रायश्चित्तव्रत करूंगा। बडे बडे ऋषियों ने यह बात सुनी तो बिना बुलाए ही वे राजासे मिलने आ गए। उन्होने सोचा कि परीक्षित अब राजा नहीं, राजर्षि बन गए हैं। राजाके विलासी जीवनका अब अंत हुआ है। राजाका जीवन् अब बदल गया है और इसीलिए वे सब परीक्षितसे मिलने गए। परीक्षितने खड़े होकर सबको प्रणाम करके उनकी पूजा की। राजाने अपने पापकी बात उन ऋषियोसे बता दी। वैसे तो सभी लोग पापको छुपाते हैं और अपने पुण्यकी बात सबके सामने प्रकट करते रहते हैं। पापको छुपाओ मत और पुण्यको तुम प्रकट मत करो। समाजके सामने पाप स्वीकारनेसे पाप करनेकी आदत छूट जाती है। परीक्षितने कहा कि मैने पवित्र संतके गलेमें मरा हुआ सांप पहना दिया। में अधर्मी हूं। मेरा उद्धार कीजिए। मैने सुना है कि पापीको यमदूत मारते-पीटते ले जाते हैं। मेरा मरण सुधरे ऐसा कोई उपाय बताएं। मुझे डर लगता है। मैनें मरनेकी अभी तक कोई तैयारी भी नहीं की है। परीक्षितने मृत्यु की वेदनाका विचार किया। जन्म-मरण दुःखके विचारसे पाप छूटेगा।

उन्होने ऋषियोसे कहा कि आप कुछ ऐसा कर दे कि सात दिन मुझे मुक्ति मिल जाए। समय अधिक नहीं है ज्ञानकी लंबी-चौड़ी बाते करेंगे तो समय पूरा हो जाएगा। मुझे ऐसी बाते बताइए और मुझे ऐसा मार्ग बताइए जिससे परमात्माके चरणोमें मैं लीन हो जाऊँ। मुझे ऐसी कथा सुनाइए कि जिससे मेरी मुक्ति हो। ऋषिगण सोचने लगे। हम कई वर्षो से तपश्चर्या कर रहे है फिर भी मुक्ति मिलेगी या नही उसकी चिंता रहती है। हम भी मृत्युसे डरते हैं। अंत समयमे प्रभुका नाम होठो पर आना मुश्किल बात है। मात्र सातही दिनमैं राजाको कैसे मुक्ति मिलेगी। यह तो अशक्य ही है। इससे सब ऋषि चुप हो गए हैं। सात ही दिनमें मुक्तिका पाना असंभव-सा ही है। मुत्युके पासका समय अति नाजुक होता है। महाज्ञानियोको भी मुत्युका डर लगता है। रामका नाम जल्दी होठों पर नहीं आता। रामचरितमानसमे वालिने कहा है- जन्म जन्म मुनि जतन कराहीं।। अंत राम कहीं आवत नाहीं ।।। कोई भी ऋषि राजाको उपदेश देनेको तैयार न हुआ। किसी में भी बोलने की हिम्मत नहीं थी। परीक्षित सोचते है कि समर्थ होने पर भी ये ऋषि मुझे उपदेश क्यो नही दे रहे है। वे सोचते हैं कि जगतके जीव चाहे मेरा त्याग करै, मैं भगवान का आसरा लूंगा। भगवान नारायण कृपा करेंगे। अब समय अधिक नहीं है। में किसकी शरण लू। मैं अपने परमात्माकी ही शरण लूं। वे तो मेरी उपेक्षा नहीं करेंगे। मैं पापी तो हूं किंतु पांडववंश हूं। अब विना ईश्वरके मेरा कोई नहीं है। परीक्षितने ईश्वर का आसरा लिया। भगवानकी स्तुति की। द्वारिकानाथको याद किया। मैंने कोई सत्कर्म नहीं किया। ये ब्राह्मण मुझे उपदेश नहीं दे रहे हैं क्योंकि में अधर्मी हूं । जिस परमात्माने, जब माताके गर्भ में था तब ब्रह्मास्त्रसे मेरी रक्षा की थी वे आज भी मेरी रक्षा अवश्य करगे। मै पापी तो हूं किंतु भगवान का ही हूँ । नाथ, मैं आपका हूँ।

दुष्टतमोऽपि दयारहितोऽपि कृष्ण तवाऽस्मि न चास्मि परस्य ।।

हे द्वारकानाथ, मैं आपकी शरणमे आया हूं। आपने जब मेरा जन्म उजागर किया है तो मेरी मृत्यु भी सुधारिए। परमात्माने शुकदेवजीको प्रेरणा दी कि वहां जाओ। शिष्य योग्य है। परीक्षितके जन्मको सुधारनेके लिए द्वारिकानाथ स्वयं आए थे। किंतु मुक्ति देनेका अधिकार केवल शिवजीका है। इसलिए भगवान् शिवजीसे कहा। सो भगवान् शिवजीके अवतार शुकदेवजी वहां पधारे संहारका काम शिवजीका है अतः परीक्षितकी मृत्युको सुधारनेके लिए शुकदेवजी पधारे। शुकदेवजी दिगंबर है। वासनाका वस्त्र छूट गया था। सोलह वर्षकी अवस्ता है। कमर पर न तो मेखला है और न लंगोटी। आजानबाहु है। वक्षःस्थल विशाल है। दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर स्थिर है। मुख पर बालों की लट बिखरी हुई है। वर्ण कृष्ण की भांति श्याम है और तेजस्वी भी है। शुकदेव जी पर बालक धूल उड़ा रहे थेष नागाबाबा चला, नागाबाबा चला। किंतु शुकदेव जी मानो यह सब कुछ जानते ही नहीं हैं। वृत्तिब्रह्माकार है। वे ब्रह्मचिंतर करते हुए देह से अभान हो गए है। चारों ओर प्रकाश फैल गया। सूर्यनारायण तो कहीं धरती पर उतरे नहीं है न। मुनि जान गए कि ये तो शंकरके अवतार श्री शुकदेव जी पधारे हैं। व्यासजी भी उस सभामे थे। उन्होंने खड़े होकर शुकदेवजीको वंदन किया। शकदेवजीका नाम सुनते ही व्यासजी भी भावविभोर हो गये। शुकदेवजीके लिये प्रयुक्त विशेषण तो देखो अनपक्षः निजलाभतो. अवतवेराः ।।

व्यासजी सोचते हैः  भागवतका रहस्य शुकदेवजी जानता है यह मैं नहीं जानता। कैसा निर्विकार है। मेरा बेटा भागवत कहेगा और में सुनूंगा। राजाके कल्याणके हेतु पधारे हुये शुकदेव जी सुवर्ण सिंहासन पर विराजे। परीक्षित ने आंखे खोली। मेरा उद्धार करने के लिये इन्हें प्रभु ने भेजा है। अन्यथा मुझ जैसे पापी और विलासीके यहाँ वे नहीं आते। परिक्षितिने शुकदेवजीके चरणोंमें साष्टांग प्रणाम किया। परीक्षित ने उन्हें अपना पाप सुनाया। मेरा उद्धार मेरो। आसन्नमरण को क्या करना चाहिए। मनुष्य मात्र का कर्तव्य क्या है। उसे किसका श्रवण, जप, स्मरण और भजन करना चाहिए।

गुरूदेव शुकजीका हृदय पिघल गया। शिष्य सुयोग्य है। अधिकारी शिष्य मिलने पर गुरुका दिल कहता है कि उसे अपना सर्वस्व दे दूं। गुरु ब्रह्मनिष्ठ हो और निष्काम भी हो तथा शिष्य प्रभुदर्शनके लिये आतुर हो तो सात दिवस तो क्या सात मिनट में प्रभु दर्शन हो सकते हैं। अन्यथा गुरु लोभी हो और शिष्य लौकिक सुखकी इच्छा करता हो तो दोनों नरकवासी होते हैं।

लोभी गुरु और लालची चेला, दोनोका नरकम ठेलमठेला ।

शुकदेवजी कहते हैं। राजन , तू घबडाता क्यों है? अभी सात दिन बाकी है में तेरे पास कुछ लेन नहीं देने आया है। मैं निरपेक्ष हैं। मुझे जो आनंद मिला है और परमात्मा के जो दर्शन हुये है वही दर्शन तुझे कराने आया हूं। मुझे जो मिला है वह तुझे देने आया हूं। मेरे पिताजी भूख लगने पर दिनमें एक बार बेर जाते थे। किंतु इस कृष्ण कथामें भजनानंद इतना मिलता है कि मुझे तो बेर भी याद नहीं आते। मेरे पिताजी वस्त्र पहनते थे। प्रभु में मेरा वस्त्र कब और कहां छूट गया वह भी मुझे खबर नहीं है। सात दिन में तुझे कृष्णदर्शन कराऊँगा। मैं बादरायणि हूं। कृष्ण आनंदमें मस्त होने के बाद बेर खाना भी कहां रहा। शुकदेवजीका संपूर्ण वर्णन वैराग्य शब्दसे व्यक्त हो सकता है। बादरायाणि के स्थान पर शुक शब्दको प्रयोग चल सकता था क्या। भागवत में एक भी शब्दको प्रयोग निरर्थक नहीं है। शुकदेव जी वैराग्य को दिखलाने के लिए ही इसका प्रयोग किया गया। शुकदेव जी बादरायण व्यासजीके पुत्र हैं। व्यासजीका तप और वैराग्य कैसा था। व्यासजो सारा दिन जपतप किया करते थे और भूख लगने पर सारे दिनमें केवल एक बार बेर खाते थे। केवल बेर का ही आहार करते थे अतः वे वादरायण कहलाये। वैसे बादरायण के शुकदेवजी पुत्र हैं। जिसमें खूब ज्ञान-वैराग्य हो, वह दूसरेको सुधार सकता है। शुकदेवजीमें वे दोनो पूर्णतः थे। आजके सुधारक में त्याग और संयम दिखायी ही नहीं देता। वह दूसरोको क्या सुधारेगा। मनुष्य पहले अपने आपको ही सुधारनेका प्रयत्न करे। राजन्, जो समय बीत गया उसका स्मरण मत करो। भविष्यका विचार भी मत करो। सिर्फ वर्तमानको सुधारो। सात दिन बाकी रहे हैं। मेरे नारायणका स्मरण करो, तुम्हारा जीवन अवश्य उजागर होगा। लौकिक रसके भागीको प्रेमरस नहीं मिलता, भक्तिरस भी नहीं मिलता। जिसने काम का त्याग किया है वही रसिक है जगत् का रस कटु हे, प्रेमरस ही मधुर है। जो इन्द्रियों के आधीन होता है उसे काल पकड़ता है। भागवत का वक्ता शुकदेवजी जैसा ही होना चाहिये।

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