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Gita rahasya पंचम स्कंध

Gita rahasya पंचम स्कंध

श्री शुकदेव जी ने कहा श्रीमद् भागवत की कथा 7 दिनों में मुक्ति देती है। वक्ता अधिकारी हो और श्रोता सावधान होकर कथा सुने तो सांसारिक विषयों के प्रति धीरे-धीरे अरुचि और परमात्मा के प्रति रूचि जगती है। प्रभु के प्रति प्रेम भाव जाग जाए तो 7 दिनों में यह यह कथा मुक्ति दिलाती है। भागवत की कथा सुनने के बाद भी मुक्ति ना मिले तो मानो कि पूर्वचित्ति अप्सरा मन में अभी तक बैठी हुई है। अब पूर्वचित्ति अप्सरा की कथा सुनिये। पूर्व जन्मों में जिनका उपभोग किया था उन विषयों की वासना अब भी चित्त में निहित रहती है वही इस पूर्व चित्ति अप्सरा का स्वरुप है। जीव और ईश्वर मिलन में वासना बाधारूप है। मनुष्य को चाहिए कि वह सुख दुख भोग कर प्रारब्ध का नाश तो करें किंतु नया प्रारब्ध उत्पन्न ना करें, मनुष्य इसी जन्म में अगले जन्म की तैयारी करता है अतः ज्ञानी जन संसर्ग दोष से दूर रहते हैं। परमहंस ऋषभदेव जी ज्ञानी हैं। परमहंस भरत जी भगवद्जन हैं। ज्ञानी पुरुषों को लगता है कि सांसारिक प्रवृतियां ज्ञान और भक्ति में बाधक हैं। सांसारिक प्रवृतियों को सहसा मत छोड़ो किंतु विवेक से कम करते जाओ। परमहंस की यह निष्ठा है कि जगत में जो कुछ दिखाई देता है वह सब मिथ्या है। जगत को मिथ्या मानने से वैराग्य उत्पन्न होता है, संसार को सत्य मानने से मोह उत्पन्न होता है। जगत में जो दिखाई देता है वह सब मिथ्या है किंतु इन सब को देखने वाली आत्मा स्वरुप है। दृश्य विनाशी और फलरूप होने के कारण ज्ञानी अपनी दृष्टि दृश्य में नहीं रखते। ज्ञानी जन अपने मन को दृश्य वस्तु में नहीं रमने देते किंतु इन सभी के साक्षी परमात्मा में दृष्टि को स्थिर रखते हैं। मन को आत्म स्वरुप में से सत्ता मिलती है। मन की स्वतंत्रता सत्ता नहीं है। आत्मा की अनुज्ञा मिलने पर ही मन पाप करता है। आत्मा मन की दृष्टा है और साक्षी है। मन को पाप करने की अनुमति कभी मत दो। ऋषभदेव मन को दृश्य में कभी जाने नहीं देते थे और मन को ईश्वर में स्थिर रखते थे कि जिससे मन प्रभु में मिल जाए और सुख दुख का स्पर्श ना हो। निद्रा में मन निर्विषय बन जाता है। निद्रा अवस्था में मन जिस प्रकार होता है वैसा ही जागृत अवस्था में भी रहे तो समझ लो कि मुक्ति ही है। सभी विषयों में से मन को हटाना ही होगा। दृश्य में से हटकर मंत्र दृष्टा में मिल जाता है। मन का ईश्वर मे लय होने पर मुक्ति मिलती है। ज्ञानी पुरुषों के लिए संसार बाधक नहीं। ज्ञानी पुरुष स्वेच्छा से नहीं अपितु अनिच्छा से प्रारब्ध के कारण जीते रहते हैं। भगवान के भक्त परमहंस ज्ञानी प्रारब्ध के कारण ही जीते रहते हैं। ये दोनों निष्ठाएं वैसे तो एक ही है फिर भी भिन्न-भिन्न हैं, मार्ग भिन्न हैं। ज्ञानी जगत को असत्य मानते हैं तो भगवदजन जगत् को सत्य मानते हैं। ज्ञानी और भगवत भक्त परमहंस तो एक ही है किंतु साधन भिन्न भिन्न हैं। ज्ञानी परमहंस जगत को मिथ्यारूप अनुभव करते हैं। भागवत परमहंस जगत् को वासुदेव स्वरूप समझते हैं। भागवत परमहंस मानते हैं- वासुदेवः सर्वमिति। भागवत परमहंस कहते हैं कि जगत मिथ्या नहीं किंतु सत्य है और वासुदेवमय है। शंकर स्वामी ने जगत को मिथ्या माना है। इन दोनों निष्ठाओं में शाब्दिक भेद है तत्वतः नहीं। जगत असत्य और सभी का दृष्ट ईश्वर सत्य है ऐसा ज्ञानी मानते हैं। वैष्णव भागवत मानते हैं कि जगद ब्रह्मा का ही स्वरुप है। वेदांती का विवर्तवाद है और वैष्णवों का परिणामवाद। ज्ञानियों का विवंर्तवाद है। दूध से दही बनता है किंतु दही दूध नहीं है। भागवत कहते हैं ईश्वर में से जगत का जो परिणाम हुआ है वह दही की भांति नहीं किंतु सुवर्ण से बने हुए आभूषणों की भांति हुआ है। सुवर्ण का टुकड़ा सुवर्ण ही था और आभूषण बनने के पश्चात भी सुवर्ण ही रहा। सुवर्ण के टुकड़े के सुवर्ण में और आभूषण के स्वर्ण में कोई भेद नहीं होता। जगत ब्रह्मा का ही परिणाम है अतः सत्य है। सूत जी सावधान करते हैं। शंकराचार्य कहते हैं कि नामरूप मिथ्या है और अन्य सभी कुछ सत्य है। मिट्टी सत्य है घड़ा नहीं। इसी प्रकार जगत सत्य नहीं है। वैष्णव कहते हैं कि ब्रह्म रूप जगत सत्य है। ये लोग जगत को ब्रह्म रूप मानकर जगत के प्रत्येक पदार्थ को ब्रह्म रूप ही देखते हैं और जगत के सभी पदार्थों से प्रेम करते हैं। ज्ञानी पुरुष जगत को मिथ्या मानकर जगत के पदार्थ से प्रेम नहीं करते, वे केवल ईश्वर से प्रेम करते हैं और विकार वासना को नष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि शरीर विष्ठा मूत्र से भरा हुआ है और इस आधार से वे देह का मोह छोड़कर परमात्मा में लीन होते हैं। किंतु वैष्णवों के लिए तो सारा जगत ब्रह्म रूप है।

सियाराम मय सब जग जानी

करो प्रणाम जोरि जुग पानी।।

ज्ञानी की दृष्टि नारी की ओर जाएगी तो वह समझ लेगा कि यह तो हड्डी मांस की पुतली है जो मल मूत्र से भरी हुई है। इस से क्या लेना-देना है। और ऐसा सोचता हुआ वह ज्ञानी उस स्त्री की ओर से दृष्टि को फेर लेगा। यदि वैष्णव किसी नारी को देखेगा तो वह मानेगा कि यह तो साक्षात लक्ष्मी है। ज्ञानी परमहंसों का मार्ग साधारण गृहस्थ के लिए कुछ कठिन ही है। वैष्णवों का मार्ग हम जैसों के लिए सरल है। जगत को ब्रह्म रूप समझना सरल है। जो दृष्टिगोचर हो रहा है उसे मिथ्या मानना कठिन कार्य है। माना कि स्त्री सुंदर है किंतु ज्ञानी कहेगा कि वह तो विष्ठामूत्र से भरी हुई पुतली है अतः उसमें से मन हटा लो। सौंदर्य कल्पना में है। ज्ञानी स्त्री की उपेक्षा करेगा। कभी नारी देखने में आएगी तो ज्ञानी उपेक्षा की दृष्टि से देखेगा, तिरस्कार से देखेगा। किंतु यदि वैष्णो किसी नारी को देखेगा तो उसे वह लक्ष्मी देवी समझेगा और ऐसा मानकर निर्विकार होकर उसे वह वंदन करेगा। वैष्णो नारी के प्रति सम्मान और सद्भाव की दृष्टि से देखेगा। किसी वस्तु के प्रति तिरस्कार से देखने की उपेक्षा प्रत्येक को भागवत भाव से निर्विकार होकर वंदन करना अच्छा है। महाप्रभु जी कहते हैं प्रत्येक पदार्थ श्री कृष्ण का अंश है। अतः यह जगत सत्य है किंतु खंडन-मंडन के ऐसे संघर्ष से दूर रहना ही अच्छा है अन्यथा राग द्वेष बढ़ने की आशंका है। ज्ञानी परमहंस ज्ञान से उपदेश देता है तो भागवत परमहंस क्रिया से उपदेश देता है। जडभारत की भांति उसकी प्रतिक्रिया उपदेश रुप होती है। ऋषभदेव आदर्श ज्ञानी परमहंस है तो भरत जी आदर्श भागवत परमहंस। सभी कुछ का त्याग करके ऋषभदेव पागल जैसा होकर जगत में भ्रमण करते हैं। सभी में ईश्वर का भाव रखकर भरत जी सभी की सेवा करते हैं। भरत जी कहते हैं मैं सेवक सचराचर रूप स्वामी भगवंत। ऋषभदेव को देहाध्यास ही नहीं है। वे आदर्श ज्ञानी परमहंस है। पहले इन्हीं की कथा आएगी। ऋषभावतार ज्ञान का आदर्श स्थापित करने के लिए है। पंचम स्कंध भागवत का ब्राह्मण अर्थात भाष्य रूप या व्याख्या रूप है। द्वितीय स्कंध में गुरू ने साधन दिया और उसके बाद ज्ञान दिया। ज्ञान को जीवन में कैसे उतारा जाए तृतीय तथा चतुर्थ स्कंध के सर्ग विसर्ग लीला में बताया गया। अब प्रश्न यह है कि ज्ञान को किस रीति से स्थाई करें। ज्ञान को स्थिर करने की, स्थाई करने की रीति पंचम स्कंध के स्थिति लीला में बताई गई है। स्थिति अर्थात प्रभु की विजय। सर्व चराचर प्रभु की मर्यादा में है। परीक्षित राजा आरंभ में प्रश्न करते हैं। मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत की विवाह करने की इच्छा नहीं थी फिर भी उन्होंने विवाह क्यों किया। गृहस्थ आश्रम निभाते हुए भी उन्होंने सिद्धि की प्राप्ति कैसे की। किस प्रकार कृष्ण में उनकी भक्ति बढ़ गई। शुकदेव जी वर्णन करते हैं। घर भक्ति में बाधा रूप है। घर में ग्रहस्थ कों विषमता (पक्षपात) करनी पड़ती है। गृहस्थी सभी की ओर समभाव नहीं रख सकता। वह शत्रु, मित्र, चोर, सेठ आदि सभी के प्रति समभाव नहीं रख सकता। श्री कृष्ण का ग्रहस्थ आश्रम ऐसा था कि वे सभी के प्रति समभाव रखते थे। एक बार दुर्योधन उनसे सहायता मांगने आया वैसे उसने श्री कृष्ण का कुछ समय पहले अपमान किया था फिर भी निर्लज्ज होकर वह सहायता की याचना करने चला आया। गृहस्थ सामान्यतः अपना अपमान भूल नहीं पाता किंतु श्री कृष्ण दुर्योधन को सहायता देने के लिए तैयार हो गए। अर्जुन भी सहायता मांगने आया था। दुर्योधन ने कहा कि मैं अर्जुन से पहले आया हूं अतः मांगने का अधिकार पहला मेरा ही है। श्रीकृष्ण ने कहा मैं तो तुम दोनों की सहायता करूंगा एक के पक्ष में मेरी नारायणी सेना होगी और अन्य के पक्ष में निशस्त्र मैं। दुर्योधन ने सोचा कि कृष्ण तो बातें ही बनाते रहेंगे और मुझे युद्ध करने वाले की आवश्यकता है बातूनी कि नहीं। उसने नारायणी सेना मांग ली, अर्जुन ने श्रीकृष्ण को मांगा। इस प्रकार की श्री कृष्ण ने अर्जुन और दुर्योधन दोनों के प्रति समभाव रखा। श्री कृष्ण गृहस्थाश्रमी ही नहीं आदर्श सन्यासी हैं। गृहस्थाश्रमी होने पर भक्ति कार्य में कुछ ना कुछ बाधा उपस्थित होती ही रहती है अतः राजा प्रियव्रत ने सोचा कि इस व्यवहार को मुझे त्याग करना होगा। परमार्थ में अभेद बुद्धि और व्यवहार में भेद बुद्धि का निर्वाह करना पड़ता है। व्यवहार भेदभाव जगाता है। भेदभाव होने पर काम, क्रोध आदि विकार पैदा होते हैं। ज्ञानी पुरुष सभी को अभेदभाव से देखते हैं। व्यवहार और परमार्थ को एक करना टेढ़ी खीर है। भेदभाव के कारण व्यवहार में बैर और असमानता उत्पन्न होते ही हैं अतः ज्ञानी जन सभी प्रवृतियों का त्याग करके एकांत में भक्ति करते हैं। घर में भक्ति नहीं हो पाती क्योंकि कई विक्षेप आते रहते हैं। तुम गृह त्याग करके गंगा किनारे जा नहीं सकते अतः कहना पड़ता है कि घर में ही रहकर भजन करो। जीव जब प्रभु के साथ एक होता है तभी साक्षात्कार कर सकता है। एकांत में ईश्वर की आराधना करने से वह शक्य होता है। राजा प्रियव्रत की इच्छा हुई कि मैं एकांत में ईश्वर की आराधना करूं। वहां ब्रह्मा जी ने आकर राजा से कहा प्रारब्ध को भुगतना ही पड़ता है। मैं भी परमात्मा की आज्ञा से प्रारब्ध भुगत रहा हूं। मुझे भी प्रवृत्ति करने की इच्छा नहीं है। तुम्हारे लिए अभी वनगमन की आवश्यकता नहीं है। सावधानी से व्यवहार करो। जितेंद्रिय तो घर में रहकर भी ईश्वर की आराधना कर सकता है और जो जितेंद्रिय नहीं है वह तो वन में भी प्रमाद ही करेगा। स्त्री पुत्र का त्याग करके वन में जाकर भी भारत ने वहां संसार बसाया था। भरत जी वन में भटक गए। प्रहलाद ने दैत्यों के साथ रहकर कई प्रकार के कष्ट सहकर घर में ही भक्ति की थी। भागवत सभी के लिए है ग्रहस्थ के लिए भी और त्यागी के लिए भी। भागवत की कथा मार्गदर्शक है ऐसा नहीं है कि गृहत्यागी को ही भगवान मिलते हैं। पवित्र और सदाचार पूर्ण जीवन जीने वाले को तो घर में रहते हुए भी भगवान मिलते हैं। घर का वातावरण प्रतिकूल होते हुए भी प्रह्लाद जी ने घर में रहकर भक्ति की और भगवान का दर्शन किया। अपने जीवन का लक्ष्य निश्चित करना बड़ा आवश्यक है, लक्ष्य को ध्यान में रखकर ही जीवन व्यवहार किया जाए। मानव जीवन का लक्ष्य है प्रभु की प्राप्ति। प्रह्लाद ने प्रतिकूल परिस्थिति होने पर भी भक्ति की जबकि घर को भक्ति में बाधा रूप मानकर गृह त्याग करने पर भी भरत जी वनवास में भक्ति ना कर सके। मनुष्य कहीं भी जाए पंच विषय तो साथ साथ आएंगे ही। घर में रहकर ही भक्ति करनी है तो प्रह्लाद का आदर्श दृष्टि के समक्ष रखो और वनवासी होकर भक्ति करनी है तो भरत जी का जीवन लक्ष्य में रखो। जीव के पीछे 6 चोर लगे हुए हैं। वे चोर हैं- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर। इन विकारों के वश जो नहीं होता उसके लिए घर बाधा रूप नहीं है। गृहस्थ आश्रम एक किला है पहले उस में रहकर ही लड़ना उत्तम है। ये 6 शत्रु तो वन में भी साथ साथ आकर सताते हैं। अतः उन 6 शत्रुरूपी विकारों को हराना है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर को जीतना है। इन 6 शत्रुओं का विजेता ग्रहस्थ होते हुए भी वनवासी जैसा ही होता है। गृहस्थाश्रमी रहकर इन 6 विकारों को कुचलना सरल है। सुखी होना है तो अपने 40वें वर्ष से संसार के व्यवहारों को धीरे-धीरे त्याग करने लगो और 51 वर्ष में वन गमन करो। ब्रम्हाजी राजा प्रियव्रत से कहते हैं- तुम विवाह करो। विवाह किए बिना विकार वासना नष्ट नहीं हो सकती। कुछ समय के लिए संसार के सुखों का उपभोग करने के पश्चात परमात्मा की आराधना करो। व्यवहार करो किंतु ऐसा करो कि पुनर्जन्म बीजारोपण ना हो जाए। राग द्वेष रहित किया गया व्यवहार मनुष्य को मुक्ति दिलाता है। जीवनमुक्त पुरुष शारीरिक अभिमान से रहित होता है वह वासना नहीं रखता अतः उसे दूसरी देह नहीं मिलती है। आज्ञा मिलने पर प्रियव्रत ने विवाह किया। उसके घर कई बालक उत्पन्न हुए। प्रियव्रत के पश्चात आग्विघ्र ने शासन संभाला। वे तपस्या करने के लिए वन में जा बसे। उनके तप में पूर्व की वासना पूर्व चित्ति बाधाएं उपस्थित करने लगी। चित्त में रहने वाली पूर्व जन्म की वासना ही पूर्वचित्ति है, भोगे हुए विषय सुख का स्मरण और उनके कारण मन में बसी हुई वासना ही पूर्वचित्ति है। पूर्व की वासना शीघ्र छूट नहीं सकती। इंद्रियों को मिला हुआ सुख वे बार-बार मांगते रहेंगी। ऐसी वासना जागने पर मन को समझाना होगा कि तूने आज तक कितना सुख का उपभोग किया फिर भी तृप्ति नहीं हो पाई है क्या। जब तक विषयों का आकर्षण है तब तक विषय इच्छा नष्ट नहीं हो पाती। विषयों के प्रति आकर्षण न रहने पर विषय इच्छा नष्ट होती है। सांसारिक विषयों में जब तक रुचि रहती है तब तक यह जीव ज्ञान भक्ति के मार्ग में आगे नहीं बढ़ सकता। निवृत्ति होने पर भी पूर्व की वासना का स्मरण होते रहना ही पूर्वचित्ति है। आग्विघ्र राजा पूर्व चित्ति में फंसे हुए हैं। आग्विघ्र के घर नाभि हुए। नाभि के घर पुत्र रूप में ऋषभदेव हुए। ऋषभदेव जी ज्ञान के अवतार थे। ज्ञानी परमहंसों का व्यवहार वर्तन किस प्रकार होता है, बताने के लिए भगवान ने ऋषभदेव जी के रूप में जन्म धारण किया। वे जगत को ज्ञानी परमहंस का आदर्श बताना चाहते थे। ऋषभ का अर्थ है सर्वश्रेष्ठ। ऋषभदेव बार-बार उपदेश देते हैं कि मानव जीवन भोग के लिए नहीं तपस्या के लिए है तप करो और सभी में ईश्वर को देखो विषय सुख में ही मानव शरीर का दुरुपयोग मत करो। जगत में ज्ञानी परमहंसों को किस प्रकार रहना चाहिए यह बताने के लिए ऋषभदेव जी ने सभी संगों का और सर्वस्व का त्याग किया। अनेक सिद्धियां उनके पास आई फिर भी वे उनमें नहीं फंसे। गृहस्थ के लिए धनत्याग और काम सुख का त्याग करना जितना कठिन है उससे भी अधिक कठिन है महात्माओं के लिए सिद्धियों का त्याग। ऋषभदेव जी नग्नावस्था में ही घूमते फिरते हैं, खड़े-खड़े ही खा लेते हैं, बैल की भांति सब्जी का आहार करते हैं, किसी के द्वारा पीटे जाने पर भी मान लेते हैं शरीर पीटा गया है मैं शरीर से भिन्न हूं, ब्रह्मनिष्ठ हूं, सभी जानते हैं कि शरीर से आत्मा भिन्न है किंतु इसका अनुभव तो बहुत कम व्यक्ति कर सकते हैं। श्रीफल नारियल में अंदर का सफेद गोला और उसका कठोर आवरण एक ना होने पर भी जबतक अंदर पानी है तब तक वे एक दूसरे को छोड़ते नहीं है इसी प्रकार जब तक मनुष्य को विषय में रस है विषय की आसक्ति है तब तक शरीर और आत्मा की भिन्नता का अनुभव नहीं हो सकता। शरीर आवरण है, आत्मा गोला है, विषय रस पानी है। संसार की किसी भी वस्तु में जब तक रस है तब तक शरीर और आत्मा की भिन्नता का अनुभव नहीं हो पाता। शारीरिक उपभोग में आनंद नहीं है। आत्मा ही आनंद रूप है। नाम रूप का मोह जब तक नहीं छूटता तब तक आत्मा और देह की भिन्नता समझ में नहीं आती इसके विपरीत देहाध्यास बढ़ता ही है। संसार के जड़ पदार्थों से अति स्नेह करने से जडाध्यास भी बढ़ता ही है। वैराग्य के बिना ब्रह्म ज्ञान स्थाई नहीं हो पाता। ब्रहम ज्ञान की बातें करने वाला धन और प्रतिष्ठा से भी प्रेम करने वाला सच्चा ज्ञानी नहीं है। सच्चा ज्ञानी तो वही है जो ईश्वर से प्रेम करता है। ईश्वर के बिना संसार के जड़ पदार्थों से स्नेह हो जाता है और शरीर से भिन्न आत्मा को नहीं देख सकता। ब्रह्म ज्ञान प्राप्त होने पर भी यदि सांसारिक विषयों में मोह होगा तो उसे ब्रह्म आनंद प्राप्त नहीं होगा। ब्रह्म ज्ञान होने के बाद ईश्वर से से प्रीति होने पर ही ब्रह्मानंद प्राप्त होता है। ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह किसी भी वस्तु से स्नेह ना करें। किसी वस्तु का संग्रह ना करें। यह मनुष्य जन्म तप करने के लिए है। मनुष्य देह से तप करने से अंतकरण शुद्ध होता है। अंतःकरण की शुद्धि से अनंत ब्रह्म सुख की प्राप्ति होती है। महापुरुषों की सेवा मुक्ति का द्वार है, कामियों का संघ नरक का द्वार है। इस मृत्यु रूप संसार में फंसे हुए अन्य लोगों का जो उद्धार करने में असमर्थ है वह गुरु गुरु नहीं है बस स्वजन स्वजन नहीं हैं, वह माता पिता माता पिता नहीं है। अर्थात वह मनुष्य गुरू, स्वजन, माता पिता होने के लिए अपात्र हैं। योग वशिष्ठ रामायण में ज्ञान की सात भूमिकाएं इस प्रकार निर्दिष्ट हैं- 1.शुभेच्छा, 2.सुविचारणा, 3.तनुमानसा, 4. सत्वापत्ति, 5. असंसक्ति, 6 पदार्थभाविनी, 7. तुर्यगा।

1.शुभेच्छा- आत्मकल्याण के हेतु श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शरण में जाकर उनके उपदेश अनुसर शास्त्रों का अवलोकन अध्ययन करके आत्मविचार और आत्मा के साक्षात्कार की उत्कट इच्छा करना ही शुभेच्छा है।

2.सुविचारणा- सद्गुरु कथित उपदेश वचनों का तथा मुख्य शास्त्रों का बार-बार चिंतन और विचार करना ही सुविचारणा है।

3.तनुमानसा- श्रवण, मनन और निदिध्यासन शब्द आदि विषयों के प्रति जो अनासक्ति होती है और सविकल्प समाधि में अभ्यास से बुद्धि की तनुता सूक्ष्मता प्राप्त होती है वही तनुमानसा है।

  1. सत्वापत्ति- उपर्युक्त 3 से साक्षात्कार पर्यंत स्थिति अर्थात निर्विकल्प समाधि रूप स्थिति ही सत्वापत्ति है। ज्ञान की चौथी भूमिका वाला पुरुष ब्रम्हवित्त कहलाता है
  2. असंसक्ति- चित्त विषयक परमानंद और नित्य अपरोक्ष ऐसी ब्रह्मात्म भावना का साक्षात्कार रूप चमत्कार असंसक्ति है। इसमें अविद्या तथा उनके कार्यों का संबंध नहीं होता इसका नाम असंसक्ति है।
  3. पदार्थ भाविनी- पदार्थों की दृढ़ अप्रतीति होती है वही पदार्थ भावनी है।
  4. तुर्यगा- तीनो अवस्था से मुक्त होना तुर्यगा है। ब्रह्मा को जिस अवस्था में आत्म रूप और अखंड जाने वही अवस्था तुर्यगा है।

इन सातों भूमिकाओं से प्रथम तीन भूमिकाएं साधन कोटि की है और अन्य चार ज्ञान कोटि की हैं। तीन भूमिकाओं तक सगुण ब्रह्म का चिंतन करो। ज्ञान की पांचवी भूमिका तक पहुंचने पर जड़ और चेतन की ग्रंथि छूट जाती है और आत्मा का अनुभव होने लगता है। आत्मा शरीर से भिन्न है। इन भूमिकाओं में उत्तरोत्तर देहभान भूलता जाता है और अंत में जनमत्त दशा प्राप्त होती है। ऋषभदेव जी ने ऐसी दशा प्राप्त की थी।

ज्ञानीजन भी इंद्रियों से डरते हैं। वे इंद्रियों का विश्वास नहीं करते। मन का विश्वास कभी मत करो। बोलने की इच्छा ही ना होने पाए इसलिए ऋषभदेव जी अपने मुंह में पत्थर रखते थे। यौवन में ही वैराग्य न आए, सांसारिक विषयों के प्रति अरुचि ना हो पाए तो प्रभु भक्ति प्राप्त नहीं होती। विषयों के प्रति जब तक वैराग्य न जगे तब तक भक्ति का आरंभ नहीं होता। आंख को शक्ति देता है। मन को बुद्धि शक्ति देती है और बुद्धि को शक्ति देते हैं परमात्मा। आंख के साथ मन ना हो तो वस्तु दिखाई नहीं देती। ऋषभदेव जी कर्नाटक आए, दावाग्नि में बुद्धि पूर्वक किया। देह जलती है पर आत्मा को तो कुछ नहीं होता। ऐसी आत्मनिष्ठा परमहंस के लिए ही है। ऋषभ देव जी का चरित्र सामान्य मनुष्य के लिए अनुकरणीय नहीं है। ऋषभ देव जी का सबसे श्रेष्ठ पुत्र था भरत। इसी भरत के नाम से अपने देश का नाम भारत खंड पड़ा। ऋषभ देव जी के पश्चात भारत ने देश का शासन संभाला उनकी कथा वर्तमान काल के लिए विशेष उपयोगी है। भरत जी महा भागवत है। उनके संग से सभी में भगवत भाग जागता था। उनके संग में आने वाले भक्ति रंग में रंग जाते थे। भरत जी ने व्यवहार की मर्यादा का कभी उल्लंघन किया ना था। वे महा वैष्णव होने पर भी यज्ञ करते थे। अग्नि ठाकुर जी का मुख है। प्रत्येक देव को इष्ट देव का ही स्वरूप मानकर अन्य देशों में कृष्ण का अंश मानकर पूजा करते थे। अनेक यज्ञ करके उसका सारा पुण्य श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित करते थे। कर्मफल परमात्मा को अर्पित करोगे तो आनंद होगा। कर्मफल प्रभु को अर्पित करने से कर्म का अभिमान नष्ट होता है। ईश्वर से अत्यधिक प्रेम करो तभी किए हुए कर्मों का पुण्य परमात्मा को अर्पित कर सकोगे। पत्नी श्रम करती है और उसका फल दे देती है अपने पति को। कर्म करो किंतु कर्म के फल के उपभोग की इच्छा ना रखो कर्मफल के उपभोग की रखोगे तो कर्म का अल्प फल ही मिलेगा पर यदि वह कर्मफल भगवान को अर्पित करोगे तो अनंत फल मिलेगा। सकाम कर्म की भागवत में कई स्थानों पर निंदा की गई है। सकाम कर्म में क्षति होने पर क्षमा नहीं मिल पाती। भरत निष्काम भाव से कर्म करते थे और उसका पुण्य श्री कृष्ण को अर्पित करते थे। सत्कर्म की समाप्ति में कहना है- अनेन कर्मणा भगवान् परमेश्वरः प्रियताम् न मम न मम। ऐसा कहते तो कई लोग हैं किंतु अर्थ नहीं समझते। कर्म कृष्ण को अर्पण करने की भावना से ही भरत जी यज्ञ करते थे। भरत जी को युवावस्था में ही एक दिन वैराग्य हो आया जिसे युवावस्था में ही वैराग्य हो और जो संयम करके भजन प्रवृत्ति बढ़ाएं उसे वृद्धा अवस्था में भगवान की प्राप्ति होती है। बृद्धा अवस्था में शारीरिक अशक्ति हो जाने के कारण भक्ति नहीं कर सकोगे। तपस्या यौवन में ही की जाती हैय़ वृद्धावस्था में तपस्या करने से अगला जन्म सुधरेगा। शरीर दुर्बल होने के बाद ब्रम्हचर्य का पालन करने का कोई अर्थ नहीं है। रामचंद्र जी युवावस्था में ही वन में गए थे। वनवास के समय उनकी आयु 27 वर्ष की थी और सीताजी की 18 वर्ष। रामचंद्र ने रावण को मारा था तुम भी अपनी युवावस्था में कामरूपी रावण का नाश करो। वृद्धावस्था में आने वाला वैराग्य सच्चा वैराग्य नहीं होता। जवानी में ही वैराग्य की परीक्षा होती है। जिसके पास कुछ नहीं है वह त्याग करें उसका कोई अर्थ नहीं है। जमाने में सुख संपत्ति होने पर भी विषय सुख में मन ना लगे वही सच्चा वैराग्य कहला सकता है। भरत जी का दिल घर में नहीं लगा। राज वैभव, सुख संपत्ति, स्त्री, पुत्र आदि सभी कुछ है परंतु आंखें बंद होने पर इनमे से कुछ भी नहीं रह जाता। जन्म के पूर्व जीव का रिश्तेदार कोई भी नहीं था मृत्यु के पश्चात भी कोई रिश्तेदार नहीं रहेगा। प्रारंभ और अंत में कोई ना था माया ही बीच में भरमाती रहती है। भरत जी सोच रहे हैं कि सांसारिक सुख का उपयोग तो मैंने कई वर्षों तक किया अब विवेकपूर्वक उसका त्याग करूंगा। उन्होंने यौवन में बुद्धि पूर्वक त्याग किया। विषयों को अनिच्छा से बलात छोड़ना पड़े तो दुख होता है किंतु विषयों का समझ बूझकर स्वैच्छिक त्याग करने से शांति की प्राप्ति होती है। यदि विषय हमें छोड़ जाए तो अशांति होती है किंतु यदि स्वयं उन्हें छोड़ दें तो शांति प्राप्त होती है। परमात्मा ने 6 वस्तुओं में माया रखी है कि जिनमें मन फंसता रहता है- 1.भोजन, 2.द्रव्य, 3.वस्त्र, 4.स्त्री, 5.घर और 6.पुस्तक। इनमें प्रथम चार प्रधान हैं और अन्य दो गौण। इस में स्त्री की निंदा नहीं है कामसुख की निंदा है। ईश्वर की माया विचित्र है। भरतमुनि ने राज्य का त्याग किया, रानियों का त्याग किया। सर्वस्व का त्याग करके वन में आए। वन में मृग बाल से स्नेह हो गया और अपने मन में उसे स्थान दे बैठे। इस आसक्ति के कारण उनका भजन ध्यान आदि खंडित हो गए और उन्हें मृग योनि में जन्म लेना पड़ा। अतः अपने घर में चाहे किसी को भी रख लो किंतु मन में तो किसी को भी बसने मत दो। मन में किसी को बसाओगे तो प्रभु भजन में वह बाधा रूप होगा। जगत के किसी भी पदार्थ से इतना स्नेह मत करो कि जिससे वह स्नेह तुम्हारी प्रभु भक्ति में बाधा बन जाए। भरतमुनि के मन में मृगबाल के लिए जो आसक्ति ने जन्म लिया वह उनके लिए पुनर्जन्म का कारण बनी। संकल्प (वासना) पुनर्जन्म का कारण बनता है। मन में अन्य किसी भी वस्तु के प्रवेश होने पर मनमोहन वहां से भाग निकलते हैं। श्री रामकृष्ण परमहंस कहते हैं कि संसार में नौका की भांति रहना चाहिए, पानी पर रहने से नौका तैरती रहेगी किंतु यदि नौका में पानी आ जाए तो नौका डूब जाएगी। इसी प्रकार सासार में तुम रहो किंतु उसे अपने में मत रहने दो अर्थात निर्लेपभाव से संसार में रहो। शरीर नौका है संसार समुद्र है और विषय जल है। विषयों का चिंतन करते रहते आत्म शक्ति नष्ट होती है। ममता बंधनकर्ता है। मन के मरने पर ही मुक्ति प्राप्त होती है। बंधन मन का होता है आत्मा का नहीं। आत्मा तो मुक्त ही है। गृह त्याग की आवश्यकता नहीं है। गृह में सावधान होकर रहना है। प्रतिकूल परिस्थिति में भी प्रहलाद घर में रहे और उनकी भक्ति में कोई बाधा ना डाल सका जबकि वन में एकांत में भी भरत मृगबाल पर आसक्त हुए और भजन ना कर सके।

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