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Gita rahasya नवम स्कंध

Gita rahasya नवम स्कंध

प्रथम स्कंध अधिकार लीला से संबंधित था। शिष्य का अधिकार बताया गया। जिसका अधिकार सिद्ध होता है उसे संत मिलते हैं। मृत्यु शिर पर सवार होने वाला है ऐसा सुनने पर राजा परीक्षित के विलासी जीवन का अंत आया और वह सुधर गया। विलासी जीवन का अंत और भक्ति सिद्ध हो पाएं तभी जीव अधिकारी बनता है। वैराग्य धारण करके जो बाहर निकल पड़ता है वह संत बनता है और उसे अपने आप सदगुरु आ मिलते हैं। संत के घर ही संत पधारे हैं। तुम संत बनोगे तो तुम्हें भी संत आ मिलेंगे। दित्वीय स्कंध में ज्ञान लीला आई। मनुष्य मात्र का कर्तव्य क्या है। आसन्न मृत्यु व्यक्ति का कर्तव्य क्या है। इन जैसे प्रश्नों की चर्चा करके ज्ञान दिया गया। तृतीय और चतुर्थ स्कंध में सर्ग विसर्ग लीला वर्णित है। इनमें ज्ञान को क्रियात्मक रूप देने का उपदेश दिया गया है। ज्ञान को किस भांति जीवन में उतारा जाए उसे कैसे क्रियात्मक किया जा सके यह ध्रुव आदि के दृष्टांत के द्वारा बताया गया। ज्ञान जब तक शब्दात्मक है तब तक शांति नहीं मिलेगी। जब वह क्रियात्मक, सक्रिय होगा तभी शांति मिलेगी। पांचवा स्कंध स्थिति लीला का है। गुरु द्वारा प्राप्त ज्ञान को जीवन में उतारोगे, सक्रिय होगा तभी शांति मिलेगी। यह पांचवे स्कंध में बताया गया है। छठे स्कंध में पुष्टि लीला, अनुग्रह लीला का वर्णन है। जो साधना करता है उसी पर प्रभु कृपा करते हैं। मनुष्य जब किसी स्वरूप में स्थिर (निमग्न) होता है तभी ठाकुर जी कृपा करते हैं। कुछ लोग समझते हैं कि खा पीकर हष्ट पुष्ट होना ही पुष्टीमार्ग है। नहीं, ऐसा नहीं है। पुष्टिमार्ग तो यह बताता है कि ठाकुर जी के विषय में मनुष्य का जीवन कैसा होना चाहिए। ईश्वर को अपना सर्वस्व अर्पण कर दो। इंद्रियों को भक्ति रस में सराबोर कर दो ऐसा करने पर ही इंद्रियों को पुष्टि मिलती है। मनुष्य यदि पुष्टि का ठीक से उपयोग ना करें और वासना के वेग में बह जाए तो वह पुष्ट होने की अपेक्षा दुष्ट ही बनता है। अनुग्रह के बाद भी अगर मनुष्य वासना के अधीन हो जाए तो वह पुष्ट नहीं बन पाता। सातवें स्कंध में असद वासना को दूर करने के संतों के धर्म बताए गए हैं। सातवां स्कंध वासना लीला का है। प्रभु की कृपा का यदि मनुष्य अच्छा उपयोग नहीं करे तो वासना ही जागती है। जो कुछ है उसका मैं अपने सुख के लिए ही उपयोग करूंगा ऐसा सोचना असद वासना है। प्रह्लाद को जो कुछ मिला था उसका उसने सभी के लिए उपयोग किया था। मुझे जो सुख मिला है वह प्रभु का ही है। सुख भोग कर जो दूसरों को सुख देता है वह सज्जन तो है किंतु संत नहीं है। जो स्वयं दुख उठा कर अन्यों को सुख देता है वही संत है। रासलीला भागवत का फल है। रासलीला में वासना को संग लेकर जाओगे तो वहां प्रवेश नहीं मिलेगा। पुष्टि के बाद जगने वाली वासना अनर्थ उत्पन्न करती है। पुष्टि का सदुपयोग करने वाला देव है और दुरुपयोग करने वाला दैत्य। प्रह्लाद देव माना गया क्योंकि उसने पुष्टि का सदुपयोग किया। हिरण्यकशिपु ने पुष्टि का दुरुपयोग किया इसलिए वह दैत्य कहलाया। प्रहलाद की वासना सद्वासना है, हिरण्यकश्यप की असद् वासना है और सामान्य मनुष्य की मिश्र वासना है किंतु सभी लोग बुद्धि का सदुपयोग नहीं करते हैं। ईश्वर द्वारा प्राप्त समय, संपत्ति और शक्ति का जो सदुपयोग करें वह देव है और दुरुपयोग करे वह दैत्य। ईश्वर तो जीव पर कृपा करते ही हैं किंतु अज्ञानी जीव उसका दुरुपयोग करता है इसीलिए वह दुष्ट बन जाता है। सातवें स्कंध में बताई गई वासना चार उपायों से तो नाश हो सकता है। आठवें स्कंध में संतों के चार धर्म वर्णित हैं।

1.आपत्ति में, दुख में हरी का, भगवान का स्मरण। 2.संपत्ति की अवस्था में सर्वस्व का दान। बलीराजा की भांति इस अवस्था में सर्वस्व का दान करने से वासना का क्षय होता है। 3.विपत्ति की अवस्था में स्ववचन का पालन। 4.सभी अवस्था में भगवत शरणागति। सत्यव्रत भगवान मत्स्य नारायण की शरण में गया था। वासना को नष्ट करने के लिए चार उपाय हमने देखे।

वासना को यदि प्रभु के मार्ग की ओर मोड़ दिया जाए तो वह वासना ही भक्ति बन जाती है। रासलीला में हमें प्रभु से मिलना तो है किंतु वासना का आवरण जब तक बीच में है तब तक मिलन में आनंद नहीं आ सकता। वासना का विनाश कर के निर्वासन होकर रासलीला में जाना है। वासना का क्षय होने के बाद रासलीला में ईश्वर और जीव का मिलन होता है। संयम और सदाचार का आसरा लोगे तभी रासलीला में स्थान मिलेगा। अष्टम स्कंध में संतो के चार धर्म बताएं फिर भी शुकदेव जी को लगा की अब भी परीक्षित राजा के मन में कुछ थोड़ी सी सूक्ष्म वासना रह गई है। यदि राजा उस सूक्ष्म वासना को मन में ही लेकर रासलीला में जाएगा तो वहां भी उसे काम ही दिखाई देगा। मैं राजा को रासलीला में तो ले जाऊंगा किंतु यदि उसके मन में काम बाकी रहा होगा तो उसे वहां भी अलौकिक का कामाचार ही दिखेगा। जिसके अपने मन में काम है उसे हर कहीं काम ही दिखाई देता है। एक गृहस्थ की युवा पुत्री ससुराल जाने निकली तो उसे रोना आ गया। पिता का हृदय भी भर आया। रोते-रोते पुत्री पिता को वंदन करने लगी तो पिता ने उसे हृदय से लगा लिया और सांत्वना देने लगे। यह तो वात्सल्य भरा निर्दोष आलिंगन था किंतु रास्ते पर से चलते हुए किसी व्यक्ति ने इसमें विकार देखा। वह नहीं जानता था कि ये कौन है। पिता पुत्री का मिलन शुद्ध है किंतु उससे भी लाख गुना शुद्ध है गोपी और कृष्ण जीव और ईश्वर का मिलन। यह मिलन रासलीला में होता है। रासलीला में काम बिल्कुल नहीं है। शुकदेव जी के दर्शन मात्र से अप्सराओं के काम का नाश हुआ था। जो अतिशय निष्कामी है वह काम की कथा कैसे कर पाएगा। शुकदेव जी निष्कामी है जिनके दर्शन मात्र से अन्य लोगों के मन में बसे हुए काम का नाश हो जाता है वैसे महात्मा यह कथा कह रहे हैं। जिस प्रकार सूर्य के निकट अंधकार नहीं जा सकता है वैसे ही काम कृष्ण के निकट नहीं जा पाता है। बुद्धि में काम होगा तो कृष्ण के दर्शन नहीं होंगे। बुद्धि में जब तक वासना रूपी विष कायम है तब तक ईश्वर रूपी रस जम नहीं पाएगा। राजा की बुद्धि को स्थिर करने के लिए, शुद्ध करने के लिए नवें स्कंध में सूर्यवंशी और चंद्रवंशी राजाओं की कथा कही गई। सूर्य है बुध के स्वामी और चंद्र हैं मन के स्वामी। बुद्धि की शुद्धि के लिए सूर्यवंशी रामचंद्र का चरित्र कहा गया और मन की शुद्धि के लिए चंद्रवंशी श्री कृष्ण का। रामचंद्र की मर्यादा का पालन करोगे तो तुम्हारे मन का रावण मरेगा। तुम्हारे मन का काम मरेगा तो परमात्मा कृष्ण पधारेंगे। राम के बाद कृष्ण आते हैं। जो रावण को काम को मार सकता है वहीं कृष्ण लीला का दर्शन कर सकता है। रामचंद्र जी के चरित्र का वर्णन रामायण में विस्तार से किया गया है। उसी का संक्षिप्त वर्णन यहां भी कुछ हेतु पूर्वक ही किया गया है। जो रामचंद्र जी की मर्यादा का पालन करता है उसे ही कन्हैया मिलता है। मन को शुद्ध करने के लिए ही ये लीलाएं हैं। इस नववें स्कंध के दो प्रकरण हैं जो सूर्यवंशी और चंद्रवंशी राजाओं के विषय में है। सूर्यवंश में श्री रघुनाथ जी और चंद्रवंश में श्रीकृष्ण अवतरित हुए। सप्तम स्कंध में वासना की कथा थी। उस वासना का नाश करने के लिए अष्टम स्कंध में चार उपाय बताए गए। संतो के इन चार धर्मों को जीवन में उतारने से वासना का नाश हो सकता है। वासना को यदि विवेक पूर्वक प्रभु के मार्ग में मोड़ दिया जाए तो वह उपासना बन जाती है और मनुष्य को मुक्ति भी दिलाती है। वासना के विनाश के बाद नवम स्कंध में प्रवेश करना है। मन और बुद्धि के शुद्धि के लिए यह नवम स्कंध है। इंद्रियों में बसी हुई वासना स्थूल वासना है और मनोगत वासना सूक्ष्म। संतो के धर्मों को जीवन में उतारने से स्थूल वासना का नाश होता है किंतु मन और बुद्धि में बसी हुई सूक्ष्म वासना का नाश वैसी आसानी से नहीं हो पाता। मन के स्वामी हैं चंद्र और बुद्धि के स्वामी हैं सूर्य। सूर्य और चंद्र बुद्धि और मन के देव हैं। इन दोनों की आराधना करने पर बुद्धिगत वासना का क्षय होता है। वासना का पूर्णतः क्षय हुए बिना मोह का क्षय नहीं हो पाता और मोह के क्षय बिना मुक्ति नहीं मिलती। मन के सूक्ष्म मल का नाश होने पर ही मुक्ति मिलती है। ज्ञानी पुरुष बार बार सोचते हैं कि संसार में सच्चा सुख नहीं है। जब तक शरीर है तब सुख सुविधा की अपेक्षा तो रहती है किंतु अंत में परिणाम तो दुखमय ही है ऐसा मानकर ही वे भोगोपभोग करते हैं। सूर्य चंद्रमा की उपासना के बिना बुद्धगत वासना का नाश नहीं हो पाता। मन में सूक्ष्म मल भी नहीं रह पाएगा तो मन मरेगा अर्थात श्री कृष्ण में मिल जाएगा। मन मरेगा तो मुक्ति मिलेगी। आत्मा तो नित्य मुक्त है, मुक्त तो मन को करना है। संत धर्म के आचरण से इंद्रियगत विकार का नाश होता है। जो विकार वासना मन और बुद्धि में सूक्ष्म रुप से व्याप्त है उसका शीघ्र विनाश नहीं हो पाता। जिसका जन्म अंतिम है उसी का मन अति शुद्ध हो सकता है। मेरा मन तो शुद्ध ही है ऐसा विचार कभी ना करो क्योंकि ऐसा करने से साधन साधना उपेक्षित हो जाने की संभावना है। भोजन से चाहे संतुष्ट बनो, भजन से नहीं। सत्कर्म का तो असंतोष ही बना रहना चाहिए। इंद्रियगत वासना नष्ट होने पर भी मनोगत वासना बाकी रह जाती है। ईश्वर के साथ एक होना है। मन और बुद्धि में बसी हुई वासना कृष्ण मिलन में बाधा उपस्थित करती रहती है। हमारा लक्ष्य बिंदु तो है कृष्णमिलन। हमें ईश्वर के साथ एकत्व साधना है। भगवान के साथ एक होने के लिए ही यह भागवत कथा है। भागवत कथा जीव को भगवान के साथ तन्मय करती है। कथा श्रवण पुण्य का काम है। कर्मों का फल तो कालांतर में मिलता है जबकि भागवत कथा श्रवण का फल तो शीघ्र ही मिलता है। इस कथा श्रवण का फल है सांसारिक विषयों का विस्मरण और ईश्वर के साथ तन्मयता। सभी साधनों का यही फल है। कथा कीर्तन में अनायास ही तन्मयता हो जाती है। जगत को अनायास भूलकर ईश्वर के साथ तन्मय होना ही सभी साधनाओं का फल है। हमें जगत में रहना है किंतु जगत को अपने मन में बसाना नहीं है। जिसके मन में संसार की विषय आते ही नहीं है उसके लिए मुक्ति सुलभ है। प्रभु द्वारा उत्पन्न जगत भजन में विच्छेप नहीं है किंतु जीव अपने मन में जिस जगत को बचाता है वही भजन में विच्छेप कर्ता बन जाता है। मन में से संसार के सूक्ष्म स्वरूप को निकाल बाहर करोगे तभी वहां श्री कृष्ण आ बसेंगे। बुद्धि गत काम के बिना विनाश के हेतु ही यह नवम स्कंध की कथा है जिसमें बरसों से तेल ही रखा जाता है ऐसे बर्तन को 5 से 10 बार धोने पर वह स्वच्छ तो होगा किंतु तेल की वास नहीं जाएगी। अब उस बर्तन में चटनी अचार रखोगे तो वह बिगड़ जाएगा। मनुष्य का मस्तिष्क भी ठीक ऐसा ही है। इसमें कई वर्षों से कामवासना रूपी तेल रखा गया है। इस बुद्धि रूपी पात्र में श्री कृष्ण मूर्ति रखने का है। अब इस मस्तिष्करूपी बर्तन में काम का अंश मात्र भी होगा तो उसमें प्रेमरस, भक्ति रस जमेगा ही नहीं। जब बुद्धि में परमात्मा का निवास होता है तभी पूर्ण शांति मिल पाती है। जब तक बुद्धि में ईश्वर का अनुभव नहीं हो पाता है तब तक आनंद का अनुभव नहीं हो पाता। संसार के विषयों का ज्ञान बुद्धि में आने पर विषय सुख रूप बनते हैं। परमात्मा को बुद्धि में रखना है। मस्तिष्क में जब ईश्वर आ बसते हैं तभी ईश्वर स्वरूप का ज्ञान पूर्ण आनंद देता है। तेल के अंश से चटनी अचार बिगड़ते हैं वैसे ही बुद्धि में वासना का अंत रह जाने पर वह अस्थिर ही रहेगी। बुद्धि को स्थिर और शुद्ध करने के हेतु मन के स्वामी चंद्र और बुध के स्वामी सूर्य की आराधना करनी है। त्रिकाल संध्या करने से बुद्धि विशुद्ध होगी। वासना विनाश के हेतु संत धर्म बताने पर भी शुकदेव जी को लगा कि परीक्षित के मन में भी सूक्ष्म वासना बाकी रह गई है। राजा को रासलीला में ले जाना है। मृत्यु के पूर्व ही उसे परम आनंद देना है। जब तक बुद्धि में काम वासना है श्री कृष्ण दर्शन उसे नहीं देंगे अतः राजा के मन में शेष रही हुई वासना का पूर्णतः नाश करने के लिए शुकदेव जी ने सूर्य और चंद्र वंश की कथा सुनाई। जब तक राम नहीं आते हैं तब तक श्री कृष्ण भी नहीं आते हैं। भागवत में मुख्य कथा श्री कृष्ण की है फिर भी राम के आगमन के बाद ही श्रीकृष्ण आते हैं जिसके घर में राम नहीं आते उसका रावण काम मरता नहीं और जब तक काम रूपी रावण मरता नहीं है तब तक श्रीकृष्ण नहीं आते हैं। इस रावण को मारना है। रावण तभी मरेगा जब राम की मर्यादा का पालन किया जाए। चाहे जिस संप्रदाय में विश्वास हो किंतु जब तक रामचंद्र की मर्यादा का पालन नहीं करोगे तब तक आनंद नहीं मिलेगा। आरंभ में रामचंद्र के चरित्र का वर्णन है। फिर दशम स्कंध की कथा आएगी। भागवत की कथा के वक्ता और श्रोता को राम की मर्यादा का पालन करना चाहिए। मनुष्य को थोड़ी सी संपत्ति या थोड़ा सा अधिक मिलते ही वह राम की मर्यादा भूल जाता है। राम के आए बिना कृष्ण भी नहीं आते। रामचंद्र की उत्तम सेवा यही है कि उनकी मर्यादा का पालन किया जाए। उनका सा ही वर्तन रखो। राम जी का भजन करना अर्थात उनकी मर्यादा का पालन किया जाए। उनका सा ही वर्तन रखो। राम जी का भजन करना अर्थात् उनकी मर्यादा का पालन करना। उनका वर्तन हमें अपने जीवन में उतारना चाहिए। यदि राम जी को मन में बसाओगे, मर्यादा पुरुषोत्तम राम चंद्र का अनुकरण करोगे तो भगवान मिलेंगे। उनकी लीला का अनुकरण करो। उनका चरित्र सर्वथा अनुकरणीय है।

श्री कृष्ण की सभी लीलाओं का अनुकरण नहीं करना है, श्रवण करना है। उनका चरित्र चिंतनीय है। श्री कृष्ण की लीला चिंतन करने के लिए और चिंतन करके तन्मय होने के लिए है। रामचंद्र ने जो किया था वह करना है किंतु श्री कृष्ण ने जो कहा था वह करना है। राम पूर्ण पुरुषोत्तम होने पर भी मनुष्य को आदर्श दिखाते हैं। रामचंद्र का मात्र प्रेम, पितृ प्रेम, बंधु प्रेम, एक पत्नी व्रत आदि सब कुछ जीवन में उतारने योग्य है। रामायण के सभी पात्र आदर्श । दशरथ जी का पुत्र प्रेम, सीता जी की पति भक्ति, लक्ष्मण और भरत का बंधु प्रेम आदि सब आदर्शमय है। श्री कृष्ण जो करते थे वही सब कुछ करना हमारे लिए अशक्य है। उन्होंने तो कालिनाग को वश में करके उसके शिर पर नृत्य किया था। गोवर्धन पर्वत को भी उंगली से उठा लिया था। श्री कृष्ण के चरित्र का अनुकरण करना ही है तो पूतना चरित्र से प्रारंभ करना। पूतना का सारा विष उन्होंने पी लिया था। विष का पाचन होने के पश्चात अन्य सभी लीला का अनुकरण करना। रामचंद्र ने अपना ऐश्वर्य छुपाया था और मनुष्य के जीवन का नाटक किया। साधक का वर्तन कैसा होना चाहिए वह रामचंद्र जी ने बताया है। साधक का वर्तन रामचंद्र जैसा होना चाहिए। सिद्ध पुरुष का वर्तन श्री कृष्ण सा हो सकता है। रघुनाथ का अवतार राक्षसों की हत्या के हेतु नहीं मनुष्यों को मानव धर्म सिखाने के हेतु हुआ था। वे जीव मात्र को उपदेश देते थे। उन्होंने किसी भी मर्यादा का भंग नहीं किया है। रामचंद्र की लीला सरल है। उनकी बाल लीला भी सरल है जबकि श्री कृष्ण की सारी लीला गहन है। रामचंद्र की सरलता तो अंतिम कक्षा की है। उन जैसा आज तक कोई नहीं हुआ। अग्नि नारायण ने सीता जी को निर्दोष घोषित किया फिर भी उस मूर्ख धोबी के कटु वचन सुनकर रामचंद्र ने सीता जी का त्याग किया। जगत के समक्ष आदर्श रखने हेतु वे निष्ठुर हो गए। वे जगत को यह बताना चाहते थे कि आदर्श राजन का वर्तन कैसा हो सकता है और कैसा होना चाहिए। सीता ने नारी धर्म का आदर्श प्रस्तुत किया। मेरे पति मेरे परमेश्वर हैं। राम मर्यादा पुरुषोत्तम है और श्री कृष्ण पुष्टि परषोत्तम। कृष्ण माखन चोर हैं अर्थात मृदु मन का चोर हैं। वे सर्वस्व ही मांगते हैं। राम नाम जैसा सरल है वैसा ही उनका काम, उनकी लीला भी सरल है। राम के नाम में एक भी संयुक्त अक्षर नहीं है, कृष्ण के नाम में एक भी अक्षर सरल नहीं है सभी संयुक्त अक्षर ही हैं। श्रीराम दिन को 12:00 बजे आए थे तो श्री कृष्ण रात्रि को 12:00 बजे। एक मध्यान्ह में आए तो दूसरे मध्यरात्रि को। एक राजा दशरथ के राज प्रसाद में अवतरित हुए तो दूसरे कंस के कारागृह में। राम जी को पहचानना, समझना सरल है किंतु कृष्ण को समझना बड़ा कठिन है। किंतु राम जी की मर्यादा जीवन में उतारने का काम सबसे कठिन है। सूक्ष्म वासना के नाश के हेतु नवम स्कंध में संतों के चरित्र कहे गए हैं। सूर्य वंश प्रकरण में रामजी का चरित्र आता है। रामचंद्र मर्यादा है तो श्री कृष्ण प्रेम। मर्यादा और प्रेम को जीवन में उतारोगे तो सुखी होगे। नरसिंह अवतार की कथा में क्रोध नाश की, वामन अवतार की कथा में लोभ के नाश की और रामचंद्र जी के अवतार की कथा में काम नाश की रीति बताई गई है। क्रोध, लोभ और काम का जब नाश होता है तभी कृष्ण भगवान प्रकट होते हैं। वैसे तो भागवत का लक्ष्य श्री कृष्ण लीला का कथन ही है तो फिर प्रथम स्कंध से ही कृष्ण लीला का वर्णन क्यों नहीं है। इसका कारण यही है कि क्रोध, लोभ और काम का नाश होने पर ही परमात्मा कृष्ण मिलते हैं। अष्टम स्कंध में समाप्ति अंश में सत्यव्रन मनु महाराज की और मत्स्य अवतार की कथा कही गई है। राजा परीक्षित ने कहा- मुझे इस सत्यव्रत मनु के वंश की कथा सुनाइए। शुकदेव जी वर्णन करते हैं- राजन, इसमें कल्प में राजर्षि सत्यव्रत वैवस्वत मनु बने थे। विवस्वत के घर वैवस्वत हुए थे। मनु वैवस्वत सूर्यवं के आदि प्रवर्तक हैं। उनका विवाह श्रद्धा नामक स्त्री के साथ हुआ था। उनके दस संताने हुई थीं। उनके नाम हैं- इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति, दिष्टि, करूष, नरिष्यंत, पृषध्न, नभग और कवि। दिष्टि के वंश में मरूत्त नामक चक्रवर्ती राजा हुए थे। मरूत्त के गुरू थे बृहस्पति। वे इन्द्र के भी गुरू थे। मरूत्त राजा को यज्ञ करना था। बृहस्पति ने आने से इंकार कर दिया। हर एक कार्य में पहले कुल गुरु का पूजन तो किया ही जाना चाहिए अब क्या किया जाए। एक बार मरुत्त को मार्ग में नारद जी मिल गए तो उन्होंने नारदजी से अपने कठिनाई सुनाई तो नारद जी ने कहा कि बृहस्पति के छोटे भाई संवर्त को ही बुला लीजिए। वे भी गुरु समान ही है, यज्ञ तो करना ही चाहिए। राजा- संवर्त्त तो योगी हैं उनका कोई पता ही नहीं है। नारद जी- उनका पता मैं बताऊंगा किंतु मेरा नाम मत लेना। कई बार ज्ञानी पुरुष भी संसार से डरते हैं। संसार के स्त्री पुरुषों का संग होने से ब्रह्म आकार आवृति का भंग हो जाता है। संवर्त्त योगी का नियम था कि 24 घंटे में एक बार वे काशी आते थे। महापुरुष भजन में भी नियम का पालन करते हैं। संवर्त्त काशी विश्वनाथ के दर्शन करने के लिए आते थे किंतु मार्ग में शबका यदि दर्शन हो जाता तो उसे ही शिव रूप मान कर वंदन करके वापस लौट जाते थे। महाभारत के अनुशासन पर्व में विस्तार से यह कथा कही गई है। मरुत्त राजा शब लेकर रात को मार्ग में बैठ गए। एक पागल सा व्यक्ति आया। उसने सबको देखा तो वंदन करके वापस लौटने लगा। मरुत्त राजा को विश्वास हो गया कि यह संवर्त्त योगी ही है। राजा ने उनके चरण पकड़ लिए और प्रणाम किया। संवर्त्त कहने लगे- मैं अज्ञानी हूं, मुझे आने दीजिए। मरूत्त- आप संवर्त्त हैं, मेरे गुरु हैं। आप तो गुरु बृहस्पति के लघु बंधु हैं। बृहस्पति देव के गुरु बन गए हैं और मेरे घर आना बंद कर दिया है। मैं यज्ञ करना चाहता हूं। कोई मुझसे यज्ञ ही नहीं करवाता है। संवर्त्त- मैं यज्ञ तो कराऊं किंतु तेरा ऐश्वर्य देखकर बृहस्पति कहेंगे कि वे तुम्हारा करने को तैयार हैं और तुम्हारा गुरु बनना चाहते हैं। यदि वैसा समय आया और तुमने मेरा त्याग किया तो मैं तुम्हें भस्मीभूत कर दूंगा। राजा ने संवर्त्त की शर्त स्वीकार किया। संवर्त्त ने राजा को मंत्र दीक्षा दी। यज्ञ का आरंभ होने चला। यज्ञ के सभी पात्र सुवर्ण के थे। राजा के वैभव और यज्ञ की भव्य तैयारी देख कर दी बृहस्पति लालायित हुए। उन्होंने राजा को संदेश भेजा- तुम्हारा मैं ही आचार्य हूं। मैं यज्ञ कराने को तैयार हूं। बृहस्पति ने इंद्र से कहा और इंद्र ने अग्नि के साथ संदेश भेजा कि बृहस्पति को ही गुरु बनाया जाए अगर ऐसा नहीं हुआ तो इंद्रिय की में बाधा उपस्थित करेंगे। अग्नि ने संवर्त्त से कहा- मेरी आज्ञा का उल्लंघन करोगे तो मैं तुम्हें भस्मीभूत कर दूंगा। जिस देव को संवर्त्त योगी आज्ञा करते हैं वह वहां उपस्थित होता है और वह देव प्रत्यक्ष हविर्भाग ग्रहण करता है। जैसा यज्ञ मरुत का हुआ था वैसा ना तो कभी किसी का हुआ था और ना कभी हो। मरूत्त के इस यज्ञ का वर्णन ऋग्वेद में भी है। भागवत में तो यह संक्षिप्त में ही वर्णित है। मनु पुत्र नभग के घर नाभाग हुए और भगवान शंकर की कृपा से नाभाग के घर भक्त अंबरीश का जन्म हुआ। अंबरीश मर्यादा भक्ति के आचार्य हैं। कांकरोली में विराजमान द्वारिकानाथ राजा अंबरीश के सेव्य ठाकुर जी हैं। ये ठाकुर जी रोज 52 भोग आरोगते थे। कितनी सामग्री इकट्ठी की जाती होगी। अंबरीश शब्द का अर्थ भी तो देखिए। अंबर अर्थात् आकाश और ईश अर्थात ईश्वर। आकाश अंदर भी है और बाहर भी। जिसके अंदर और बाहर सभी स्थान पर ईश्वर है वही अंबरीश है। ज्ञानमार्ग में इन्द्रियरूपी द्वारों को बंद रखने पड़ते हैं। भक्ति मार्ग में सभी इंद्रियों को भगवान के मार्ग में लगानी पड़ती है। भगवान के चरणों में भक्त अपनी इंद्रियां अर्पित कर देता है। भक्त अपनी सारी इंद्रियों का भगवान से विवाह कर देता है। भगवान ऋषिकेश है इंद्रियों के स्वामी हैं। राजा अंबरीश महान भक्त थे। उनका मन भगवान के चरण कमलों में, वाणी भगवद्गुण वर्णन में, हाथ हरि मंदिर की सफाई में, पांव प्रभु के क्षेत्र आदि पदयात्रा में, कान भगवान की उत्तम कथाओं के श्रवण में तथा दोनों नेत्र मुकुंद भगवान की मूर्तियों के दर्शन में व्यस्त रहते थे। मस्तक से वे भगवान श्री कृष्ण को वंदन करते रहते थे। भगवान की सेवा में जो व्यक्ति अपना सारा शरीर लगा देता है उसका देह अभिमान कम हो जाता है। भक्ति मार्ग में धन या तन नहीं, मन ही प्रधान है। जबसे भक्ति में धन का प्राधान्य हुआ है तब से भक्ति छिन्न भिन्न होती जा रही है। राजा अंबरीश तभी सर्वप्रथम कहते हैं- मेरा मन सदा कृष्ण के चरण कमलों में ही रहे। सेवा में धन नहीं मन ही मुख्य है। सेवा का अर्थ है सेव्य-श्री कृष्ण में मन को परोए रखना। सेवा का संबंध मन से है। शरीर से जो क्रिया की जाए उसमें यदि मन का सहकार नहीं होगा तो व्यर्थ ही हो जाएगी। सेवा का क्रम अंबरीश ने बताया है। सेवा का आरंभ मन से होता है। मन सूक्ष्म होता है। वह जगत् और ईश्वर के साथ एक साथ संबंध नहीं रख सकता। मन को मनाओगे तो वह मानेगा किसी के उपदेश से नहीं। तुम स्वयं अपने मन को समझाओगे तो असर होगा। अपने मन को और कोई क्या और कैसे समझा सकता है। राजा अंबरीश के इष्टदेव द्वारिकानाथ है। राजा होने पर भी वे स्वयं सेवा पूजा करते हैं। घर में कई सेवक होने पर भी वे कहते हैं- मैं तो ठाकुर जी का दास हूं। उनकी सेवा स्वयं मुझे ही करनी चाहिए। दास्य भाव में सेवा ही मुख्य है। उसी का पेट भरता है जो स्वयं भोजन करे। जो भजन और सेवा स्वयं करे उसे फल मिलता है। चार काम स्वयं करने पड़ते हैं- भोजन, विवाह, ठाकुर जी की सेवा और मृत्यु। अंबरीश तो चक्रवर्ती राजा था फिर भी वह प्रभु सेवा तो स्वयं ही करता था। ठाकुर जी के मंदिर की सफाई भी करता था। वैसा करने से वैष्णव की चरण रज का लाभ मिलता है। भागवत में स्पष्ट लिखा है कि अमरीश भगवान के दर्शन के लिए खुले पांव पैदल ही जाता था। मानो कि हम अंबरीश का पूरा पूरा अनुकरण नहीं कर सकते किंतु उनका कुछ ना कुछ तो अनुकरण करना ही चाहिए। एक बार तो अंबरीश ने भगवान श्री कृष्ण की आराधना के हेतु एक वर्ष तक एकादशी कथा एकादशी करने का व्रत लिया था। एकादशीव्रत सभी व्रतों से श्रेष्ठ है। इसके दो प्रकार हैं- निषेध व्रत और परिपालन व्रत। अन्नाहार से दोष ना हो इसके लिए निषेध व्रत किया जाता है। भगवान की आराधना के हेतु किया गया भागवत व्रत सुखदाई है। एकादशी का व्रत त्रिदिवसीय है। दशमी के दिन एक बार भोजन करें। हो सके तो हविध्यान्न भोजन करें, दूध और चावल सा सात्विक आहार करें। इस दिन अजीर्ण हो जाय उतना भोजन न करें। एकादशी तो यदि शक्य है तो निर्जला ही की जाए। ऐसा ना हो सके तो दूध या ऋतु फल का संयम पूर्वक आहार करें। ऐसा करने पर ही इस व्रत का फल मिलेगा अन्यथा नहीं। व्रत करने का  विचार दृढ़ होगा तो भगवान शक्ति देंगे। एकादशी करने का संकल्प करोगे तो प्रभु सहाय करेंगे। सत्यनारायण की कथा में उस कठियारे (लकड़ी काट कर बेचने वाला) की बात आती है जिसने अपने पास पैसे न होते हुए भी सत्यनारायण की पूजा का व्रत लिया और परमात्मा ने उसका संकल्प परिपूर्ण किया। परमात्मा सत्कर्म में हमेशा सहायभूत होते हैं। लोग मानते हैं कि एकादशी क्या आई दिवाली के आगमन का संदेश आ गया। ऐसा कभी ना सोचा जाए। एकादशी के दिन घर में अन्न पकाया तो क्या उसका दर्शन तक ना किया जाए। इस दिन अन्न में सभी पापों का वास होता है। वे सब उस अन्न खाने वाले के शिर पर जा पहुंचते हैं। एकादशी के दिन पान सुपारी भी ना खाई जाए, दिन को सोया भी आ जाए। रात को एक दो घंटा भोजन अधिक करें। इस दिन में पंढरपुर में विट्ठलनाथजी भी नहीं सोते।

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