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Gita rahasya द्वितीय स्कंध

Gita rahasya द्वितीय स्कंध

सत्य परमात्मा का नाम है। सभी में जो ईश्वर का दर्शन करें वही सतगुरु है। अधिकारी शिष्य को सद्गुरु अवश्य मिलता है।

प्रथम स्कंध में अधिकार लीला में वर्णन किया था। परीक्षित अधिकारी थे अतः उनको शुकदेव मुनि जैसे सदगुरु मिले। परीक्षित में पांच प्रकार की शुद्धियां है मात्र शुद्धि, पितृ शुद्धि, दिव्य शुद्धि, अन्न शुद्धि और आत्म शुद्धि। सद्शिष्य को ही गुरु कृपा मिलती है और ईश्वर दर्शन होते हैं। सदगुरु तत्व और ईश्वर तत्व एक है। ईश्वर जिस तरह व्यापक है उसी तरह गुरु भी व्यापक है। जिसका कहीं भी अभाव ना हो वही व्यापक है। परमात्मा सनातन सतगुरु भी व्यापक हैं। व्यापक को खोजने की नहीं किंतु पहचानने की आवश्यकता है। परमात्मा की भांति गुरु भी व्यापक है किंतु वह अधिकारी को ही मिलता है। स्वयं संत बने बिना संत को पहचाना नहीं जा सकता तुम्हें संत दिखाई नहीं देते क्योंकि तुम संत नहीं हो जो संत बने उसे संत मिले। संत बनने के लिए व्यवहार को अति शुद्ध करना चाहिए, जब तक मुट्ठी भर चने तन की भी जरूरत है तब तक व्यवहार छूटता नहीं है। जो प्रत्येक व्यवहार को भक्तिमय बनाए वही सच्चा वैष्णव है। संत होने के लिए मन को सुधारने की जरूरत है, मन को बदलने की जरूरत है। जो अपने ह्रदय का परिवर्तन करता है वह संत बनता है। मन शुद्ध होने पर संत मिलता है। संत से मिलने के लिए संत आता है। विलासी कों संत नहीं मिलते। गुरुदेव ब्रह्मा है। गुरु देव नया जन्म देते हैं। नया जन्म देने का अर्थ है कि वे मन को और स्वभाव को सुधारते हैं। गुरुदेव विष्णु है क्योंकि गुरुदेव शिष्य की रक्षा करते हैं। गुरुदेव शिष्य को मोक्ष कुछ भी देते हैं। इसी से वे शिव जी के भी स्वरुप है। गुरु के बिना ना रहो। तुम लायक होगे तो भगवान की कृपा से सतगुरु मिलेंगे ही। तुकाराम जी ने अपने अनुभव का वर्णन किया है। कथा वार्ता सुनते हुए प्रभु के नाम से मेरी प्रीति हो गई मैं भी विट्ठल विट्ठल का जप करने लगाu। प्रभु को मुझ पर दया आई मुझे सपनों में मेरे सतगुरु मिले, मेरे सतगुरु मुझे रास्ते में मिले। मैं गंगा स्नान करके आ रहा था कि वे रास्ते में मिले। उन्होंने मुझसे कहा कि विट्ठलनाथ की प्रेरणा से मैं तुम्हें उपदेश देने के लिए आया हूं। मैंने उनसे कहा मैंने तो भगवान की कोई सेवा नहीं की है फिर भी गुरुदेव ने मुझ पर कृपा की और राम कृष्ण हरि का मंत्र दिया। गुरु दक्षिणा में उन्होंने पांव भर तूप अर्थात घी मांगा। तुकाराम के गुरु को पलभर को पाव भर घी भी मिलता नहीं था क्या। किंतु तुकाराम की बाणी गुणार्थ से भरी हुई है। तूप का अर्थ है तेरापन और मेरापन अर्थात अहम, तू मुझे दे दे। आज से तू भुल जी कि तू पुरुष है तू अपना पुरुषत्व भूल जा। मेरे गुरुदेव ने मेरा तन और तेरा तन मुझसे मांग लिए। मुझे आज्ञा दी कि तू अपना अभिमान मुझे दे दे। आज से अहम को मत रखना। तू पुरुष नहीं है और तू स्त्री भी नहीं है। तू किसी का पुत्र भी नहीं है। देह के सारे भाव तू मुझे अर्पण कर दे। तू शुद्ध है ब्रह्म है, ईश्वर का अंश है। जीव का ईश्वर के साथ संबंध सिद्ध कर दिया, जोड़ दिया। जिसकी प्रत्येक क्रिया ज्ञानमय हो वह उत्तम गुरु है। ज्ञानी भक्तों की प्रत्येक क्रिया ज्ञान और बोध रूप होती है। संतों का सब कुछ अलौकिक होता है। शुकदेव जी मात्र ब्रह्म ज्ञानी ही नहीं थे परंतु उनकी दृष्टि भी ब्रह्म दृष्टि थी। शुकदेव जी हर एक को समभाव से, ब्राह्म भाव से देखते थे जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। जिसकी दृष्टि ब्रह्म में हो उसे जगत का आभास नहीं होता। शुकदेव जी गुरु ही नहीं सद्गुरु भी है। शुकदेव जी जैसे ब्रह्म दृष्टि वाले सुलभ नहीं है वैसे ब्रह्म ज्ञानी, ब्रह्म ज्ञान की बातें करने वाले तो सुलभ हैं। शुकदेव जी जैसे गुरु मिले तो सात दिवस में तो क्या सात मिनटों में भी मुक्ति दिला सकते हैं किंतु शिष्य परिक्षित जैसा अधिकारी होना चाहिए। गुरु और शिष्य दोनों अधिकारी होने चाहिए मंत्र दीक्षा अहम है स्पर्श दीक्षा उत्तम है। ब्रह्मभाव में तल्लीन होकर शुकदेव जी ने परीक्षित के सिर पर वरदहस्त रखा कि तुरंत उनको ब्रह्म का दर्शन हुआ। प्रथम स्कंध में अधिकार की कथा बताई है। भागवत का श्रोता कैसा होना चाहिए वह बताया गया है वक्ता कैसा होना चाहिए वह भी बताया है। आगे कथा आएगी कि ध्रुव जी को मार्ग में नारदजी मिले और प्रचेताओं को शिवजी मिले। अधिकारी शिष्य को सद्गुरु मिलते हैं परीक्षित के लिए भी शुकदेव जी आए। अन्यथा लाख आमंत्रण देने पर भी शुकदेव जी को आंख उठाकर देखने तक की फुर्सत नहीं है क्योंकि सच्चा ज्ञानी एक क्षण भी परमात्मा के दर्शन किए बगैर नहीं रह सकता। तीन प्रकार के श्रोता वक्ता में व्यास जी का क्रम दूसरा है क्योंकि वह समाज सुधारणा की दृष्टि से कथा करते हैं। शुकदेव जी दूसरों को सुधारने की नहीं किंतु अपने अंतकरण को सुखी करने की वृत्ति से कथा करते थे। शुकदेव जी ने कथा का आरंभ किया तो किंतु मंगलाचरण नहीं किया कारण देह भान बिल्कुल नहीं था। तीन अध्यायों के बाद शुकदेव जी ने मंगलाचरण किया। भागवत में तीन मंगलाचरण है प्रथम व्यास जी का, दूसरा शुकदेव जी का और अंत में तीसरा सूत जी का। यौवन में मंगलाचरण, मंगल आचरण की बहुत जरूरत है इसलिए ही सुखदेव जी का मंगलाचरण 12 श्लोकों का है और अन्य सभी का एक एक श्लोक का है। उत्तम वक्ता कौन होता है जो संपूर्णता वैराग्यमय हो वह उत्तम वक्ता है। संसार के किसी भी विषय में मन ना जाए वह वैराग्य है। संसार के विषयों को देखते हुए भी जिसका मन उसमें नहीं रमता उसने ही सच्चा वैराग्य सिद्ध किया है। बिना वैराग्य की दृढ़ता नहीं आती। वैराग्य से ज्ञान शोभित होता है। ज्ञान, भक्ति, वैराग्य परिपूर्ण होने पर मनुष्य ब्रह्ममय बनता है। शुकदेव जी में पूर्णता ज्ञान भक्ति और वैराग्य थे। ज्ञानी का ह्रदय कृष्ण प्रेम में न पिघले तो वह ज्ञान किस काम का। परीक्षित राजा शुकदेव जी से पूछते हैं जिसकी मृत्यु समीप हो उसका कर्तव्य क्या है, मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए मनुष्य मात्र का कर्तव्य क्या है। शुकदेव जी ने कहा राजन ने अच्छा प्रश्न किया है अंत काल में वात, पित्त और कफ से त्रिदोष होता है, मृत्यु की वेदना भयंकर होती है, जन्म मरण के दुखों का विचार करेंगे तो पाप नहीं होगा। सो मृत्यु से डरते रहो उनको स्मरण रखो सोचो कि मैंने मृत्यु के स्वागत की तैयारी की है या नहीं, ऐसा चिंतन करने से वैराग्य आता है। जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि के दुखों का बार बार विचार करो तो वैराग्य उत्पन्न होगा और पाप छूटेंगे वरना पाप के संस्कार जल्दी नहीं छूटते। सोचे समझे बिना वैराग्य उत्पन्न नहीं होता। काल को सिर पर रखकर हमेशा ईश्वर का चिंतन करो काल को याद रखोगे तो पाप वृत्ति का उद्भव नहीं होगा। भजन के लिए अनुकूल समय की प्रतीक्षा ना करो कोई भी क्षण भजन के लिए अनुकूल है कोई तकलीफ ना रहने पर मैं भजन करूंगा ऐसा मानना अज्ञानता है। एक मनुष्य स्नान करने के लिए समुद्र के किनारे पर गया किंतु स्नान करने के बजाए वह वहां बैठा ही रहा। लोगों ने उससे पूछा कि क्यों इस तरह बैठा हुआ है स्नान कब करेगा। उस मनुष्य ने कहा कि समुद्र में एक के बाद एक तरंग उठ रही है तरंगों के बंद होने पर स्नान करूंगा। क्या समुद्र की मौजें कभी रुकती हैं मौजें कब रुकेंगी और कब स्नान होगा। संसार है एक समुद्र है उसमें असुविधा रूपी तरंगे आती ही रहेंगी इसलिए यदि कोई कहे कि अनुकूलता होने पर भगवान का भजन करूंगा तो वैसी सर्वांगी अनुकूलता तो आएगी ही नहीं। जिस तरह वह मनुष्य स्नान नहीं कर सका उसी तरह से ऐसे मनुष्य ईश्वर भजन किए बिना रह जाते हैं। जीवन में चाहे मुश्किलें आए किंतु इस लक्ष्य को मत भूलना कि मुझे परमात्मा से मिलना है प्रभु से मुझे एक होना है लोभी जिस तरह पैसों पर लक्ष्य रखता है उसी तरह महापुरुष परमेश्वर पर लक्ष्य रखते हैं। अंतकाल में जो मेरा स्मरण करता हुआ जो देहत्याग करता है वह मुझे पाता है। अंत काल का अर्थ जीवन का नहीं परंतु प्रत्येक क्षण का अंत काल है। सो प्रत्येक क्षण ईश्वर का चिंतन, ध्यान और स्मरण करना चाहिए। प्रत्येक क्षण को सुधारोगे तो मृत्यु भी सुधरेगी। प्रत्येक क्षण को सुधारने का अर्थ है हर क्षण ठाकुर जी को अपनी दृष्टि में रखना। लोग मानते हैं कि सारा जीवन काम धंधा करेंगे, उल्टा सीधा करके धन कमाएंगे और अंत काल में भगवान का नाम लेकर संसार पार कर लेंगे। यह गलत विचार है इसलिए तो स्पष्टता की गई है कि सदा तद्भावभावितः हमेशा जिस भाव का चिंतन करोगे उसी का अंत काल में भी स्मरण होगा। भगवान ने भी आशा की है कि तस्मात् सर्वेषु कालेषु माम् अनुस्मर। इसलिए सारा समय तू निरंतर मेरा स्मरण कर। यह तो सर्वविदित बात है कि जिस बात का सर्वदा चिंतन किया गया है मृत्यु समय भी उसी का ही स्मरण होता रहेगा। एक सुनार का दृष्टांत है। एक सुनार बीमारी के कारण सैया में पड़ा हुआ था. कई महीनों से वह बाजार नहीं जा सका था तो उसे सोना और सोने के बाजार भाव ही विचार में आता रहता था। अंतकाल आया, बुखार बढ़ता जा रहा था। डॉक्टर ने आकर बुखार नाप कर कहा कि 105 डिग्री है। सुनार समझा कि किसी ने सोने का भाव बताया है। वह अपने पुत्र से कहने लगा कि बेच दे बेच दे हमने 80 के भाव में लिया था, अब 105 हुआ है तो बेच दे। ऐसा बोलते बोलते ही वह मर गया। सुनार ने सारा जीवन सोना खरीदने बेचने और सोने के विचार में ही गुजारा था तो अंत काल में उसे सोने का ही विचार आता रहा। धन संपत्ति की ही चिंता करने वाले को, रुपया पैसा पैदा करने वाले को अंत काल में भी उसी का विचार आता है। धन कमाना कोई पाप नहीं है किंतु उसे कमाते समय भगवान को भुला देना पाप है। शुकदेव जी ने कहा है कि हे राजन मनुष्य की आयु इसी तरह समाप्त हो जाती है। निद्रा और विलास में रात गुजर जाती हैं और धन प्राप्ति के प्रयत्न में तथा कुटुंब के परिपालन में दिन गुजरते जाते हैं। मनुष्य का अधिकतम समय निद्रा और अर्थोपार्जन में चला जाता है। उसका बहुत सा समय बातें करने में चला जाता है। बहुतों का समय पढ़ने में गुजरता है। बहुत पढ़ना भी अच्छा नहीं है अति वाचन से शब्द ज्ञान तो बढ़ता है किंतु साथ-साथ अभिमान भी बढ़ता है। राजन, जो समय चला गया है उसके लिए अब मत रो, उसका विचार भी ना करो। भूतकाल की बातें ही सोचते रहने से कोई लाभ नहीं है तुम अपने वर्तमान को सुधारो। सात दिनों का जो समय मिला है उसी का सदुपयोग कर लो। मनुष्य इंद्रियों के सुख में ऐसा फंसा हुआ है कि उसे अपने लक्ष्य का ध्यान ही नहीं रहता। शरीर, स्त्री, संतान आदि सब कुछ असत्य हैं फिर भी उन सब के मोह में वह ऐसा पागल बन गया है कि उसे समय और लक्ष्य का भी भान नहीं रह गया है। तुम्हें क्या करना है, कहां जाना है, क्या बनना है उसका विचार आज ही कर लो। इच्छा शुद्धि के बिना कर्म शुद्धि नहीं होती। तुम निश्चय कर लो कि मुझे भगवान से मिलना है, मुझे प्रभु के धाम में जाना है, मुझे पुनर्जन्म नहीं लेना है। जगत में विकार और वासना के बढ़ जाने के कारण त्याग और संयम कम हो गया है। काल मनुष्यों को धक्का दे और उन्हें रो रो के घर छोड़ना पड़े उससे यह अच्छा है कि वे विवेक से स्वेच्छापूर्वक ही घर छोड़ दें। हे राजन, मानव जीवन की अंतिम परीक्षा मृत्यु है। मनुष्य की प्रति क्षण मृत्यु होती रहती है। जो प्रत्येक क्षण को सुधारता है उसकी मृत्यु सुधरती है और जिसकी मृत्यु सुधर गई उसका जीवन भी उजागर हो जाता है। प्रभु का स्मरण प्रत्येक क्षण के अंत काल में करना चाहिए। क्षणस्य अंतकाले- मात्र जीवन के अंत काल में नहीं। क्षण क्षण को जो सुधारता है उसी का जीवन सुधरता है। यह शरीर प्रतिक्षण बदलता रहता है, शरीर का नाश होता रहता है। अंत काल में अर्थात प्रत्येक पल के अंत में मनुष्य की मृत्यु होती रहती है तो प्रभु का स्मरण प्रति क्षण करो अन्यथा जिस का जीवन धनोपार्जन और कुटुंब के परिपालन में ही गुजर गया हो उसे अंत काल में वही सब कुछ याद आता रहता है। सारा जीवन जिसमें बीता हो वही अंत काल में याद आता है। एक बूढ़ा बीमार हो गया। उसका सारा जीवन दृव्य आदि के पीछे ही बीता था। अंतकाल नजदीक आया। उसके पुत्रादि कहते हैं कि पिताजी अब आप श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव का जाप कीजिए किंतु उस बूढ़े के मुंह से यह शब्द निकलते ही नहीं है। जीवन में कभी भगवान का नाम लिया हो तब वह नाम याद आए ना। वह बूढ़ा मन से दृव्य का ही चिंतन कर रहा है। उसकी दृष्टि आंगन में गई। उसने देखा कि बछड़ा झाड़ू चबा रहा है। इतना छोटा सा नुकसान भी वह बूढ़ा कैसे सह सकता था। उसका दिल जलता है कि मैंने कैसे-कैसे धन कमाया है यह लोग क्या जाने। उसे लगा कि रुपए पैसों की तथा अन्य चीजों की इन लोगों के लिए कोई कीमत ही नहीं है मेरे जाने के बाद यह लोग घर को लुटा ही देंगे। वह बूढ़ा कुछ स्पष्ट बोल तो सकता नहीं था इसलिए कुछ बड़बड़ाने लगा। उसके एक बेटे ने सोचा कि पिताजी भगवान का नाम लेना तो चाहते हैं किंतु कुछ बोल नहीं सकते। दूसरे बेटे ने सोचा कि पिताजी कभी भगवान का नाम तो लेते नहीं इसलिए वे कुछ मिलकत के बारे में कहना चाहते हैं, कुछ धन छुपा रखा होगा उसके बारे में कुछ कहना होगा। उसके पुत्रों ने डॉक्टर बुलाकर उस से विनती की कि कुछ ऐसा करो कि पिताजी दो चार शब्द बोल सकें। डॉक्टर ने इंजेक्शन देने के लिए हजार रुपए की फीस मांगी। पुत्रों ने सोचा कि पिताजी कहीं गाड़कर रखा हुआ धन बताएंगे अतः हजार रुपए खर्च कर डाले। पिताजी की बात सुनने के लिए सभी आतुर थे, दवाइयों ने अपना काम किया, कुछ शक्ति मिली तो वह बूढ़ा बोला सब मेरी और क्या देख रहे हो वहां देखो वह बछड़ा कब से झाडू खा रहा है और इस तरह बछड़ा झाड़ू झाड़ू बछड़ा करते हुए बूढ़े ने देह त्याग दिया। आप देखें ध्यान रखें कि कहीं आपकी भी ऐसी दशा ना हो। यह बात हंसने के लिए नहीं सावधान करने के लिए कही गई है। लक्ष्मी जी अकेले आती हैं तो रुलाती हैं किंतु साथ में ठाकुर जी भी आए तो सुखी करती हैं। लोग कहते हैं कि आने वाले काल की खबर कैसे हो सकती है किंतु वह तो पहले से ही सावधान करके आता है। काल सभी को सावधान करता है किंतु लोग मानते ही नहीं हैं। काला आगमन के पहले पत्र लिखता है किंतु काल का पत्र पढ़ना कोई नहीं जानता। बाल श्वेत होने लग जाए तो मानो की काल की नोटिस आ गई है, दांत गिरने लगे तो मानो की काल की नोटिस आ पहुंची है और सावधान बनो। दांत गिर जाते हैं तो लोग नकली दांत लगवाते हैं। दांत गिरने लग जाएं तो समझ लेना चाहिए कि अब तो दूध भात खाकर प्रभु भजन करने का समय आ गया है लेकिन लोग नकली दांत बनवाकर इसलिए लगवाते हैं कि पापड़ खाने का मजा आएगा। ऐसे कहां तक चलेगा। खाने से शांति तो मिलती ही नहीं इसके विपरीत वासना और अधिक भड़कती ही है। मृत्यु की कई निशानियां बताई गई हैं- अरुंधति का तारा ना दिखाई दे तो मानना चाहिए कि 1 वर्ष में मृत्यु होगी, स्वप्न में कीचड़ शरीर धंसता हुआ दिखे तो मानो कि 9 महीने में मृत्यु होगी, स्वप्न में कुम्हार के हाथी अर्थात गधे पर सवारी करने का दृश्य दिखाई दे तो मानिए कि 6 महीने में मृत्यु हो जाएगी, कान में उंगली डालने के बाद अंतर्ध्वनि ना सुनाई दे तो मानो कि 8 दिनों में मृत्यु हो जाएगी। मृत्यु के लक्षण जानकर भयभीत मत होना, सावधान होने के लिए यह लक्षण बताए गए हैं। सावधान होने के लिए ही यह भागवत की कथा है। भागवत की कथा सुनकर परीक्षित कृतार्थ हो गए। मरण को सुधारने के लिए भागवत शास्त्र है। जीवन को जो सुधारता है उसी का मरण सुधरता है। राजन मरण को सुधारना हो तो प्रत्येक क्षण को सुधारो। रोज सोचो विचारों मन को बार-बार समझाओ कि ईश्वर के बिना मेरा कोई नहीं है। इस शरीर को भी एक दिन मुझे छोड़ना पड़ेगा अतः यह भी मेरा नहीं है। जब शरीर भी मेरा नहीं है तो मेरा है ही कौन क्योंकि सभी संबंध शरीर के कारण ही उत्पन्न हुए हैं। भावना करो कि ना तो मैं किसी का हूं और ना कोई मेरा है इस तरह ममता को हटाओ। संग्रह से ममता बहती है इसलिए अपरिग्रही बनो। शक्ति भोग में नहीं त्याग में है। समता सिद्ध करने के लिए सबसे ममता रखो, व्यक्तिगत ममता दूर करो। प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह प्रतिक्षण सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का ही श्रवण, कीर्तन और मनन करे। इंद्रियों को भोग से नहीं प्रभु स्मरण से प्रभु से ही शांति मिलती है। दुख का कारण यही है दुख भोगने के लिए ही तो देह मिली है। पाप ही ना किए होते तो यह शरीर और यह जन्म ही क्यों मिला होता। देह धारण करना ही पाप है। मनुष्य हर तरह से सुखी नहीं हो सकता। हे राजन, मानव शरीर सुख के उपयोग के लिए नहीं मिला है मानव शरीर तो भजन करके भगवान को प्राप्त करने के लिए ही मिला है। इंद्रिय सुख सभी प्राणियों को एक सा ही मिलता है। शरीर संग से जो सुख स्त्री पुरूष को मिलता है वही सुख कुत्ते को भी कुतिया के संग से मिलता है। अतःमनुष्य जीवन पाकर प्रभु स्मरण में लीन रहो रहो। तुम जीवन को कुछ ऐसे सांचे में डालो कि मृत्यु के क्षण में भगवान की ही याद आए। जीव शिव बनने का प्रयत्न ही नहीं करता अन्यथा वह तो शिव बनने के लिए ही जन्मा है। जीव जब ईश्वर से कहता है कि मैं आपका हूं तो वह संबंध अपूर्ण है परंतु ईश्वर जब जीव से कहता है कि तू मेरा है तभी वह संबंध परिपूर्ण होता है। पाप को टालो, पुण्य कार्य तुरंत करो। ईश्वर हमें पाप की प्रवृतियों से कभी नहीं जोड़ता परंतु जन्मों के संचित संस्कार ही पाप करने के लिए प्रेरणा देते हैं। एकांत में ईश्वर भजन करो मन को एकांत जल्दी एकाग्र बनाता है। एक ईश्वर में ही सब का अंत करना एकांत है। ईश्वर एक और अद्वितीय है। मन को एकाग्र करने के लिए एकांत में रहने की जरूरत है। ग्रहस्थ घर में समभाव नहीं रख सकता वह फिर चाहे गीता का पाठ ही क्यों ना करें। गृहस्थ आश्रम के व्यवहार विषमता से भरे हुए हैं वहां समता नहीं रखी जा सकती। गृहस्थ के घर में भोग के परमाणु भरे हुए होने के कारण घर में रहकर परमात्मा का सतत ध्यान करना कठिन है। भागवत में शुकदेव जी ने कहा है कि जिसकी मृत्यु समीप आ गई हो वह घर छोड़ दें। धैर्य सहित घर छोड़ो ,पवित्र तीर्थ के जल में स्नान करो और पवित्र एकांत स्थल में आसन जमा कर बैठ जाओ। मनसे प्रणव का जाप करो। प्राणायाम से प्राणवायु को वश में करो। मन को अन्य विचारों से रोककर भगवान के मंगलमय रूप से जोड़ दो। मीराबाई ने एकांत में गिरिधर के आगे नाचना तय किया था। उसकी टेक थी मैं गिरधर के आगे नाचूंगी तभी उसकी भक्ति सिद्ध हुई। एकांत में बैठ कर प्राणायाम करो मन का प्राण से संबंध है प्राण से मन भी स्थिर होता है। प्राणायाम के तीन भेद होते हैं। प्रथम पूरक प्राणायाम करना होता है की दाहिनी नासिका द्वारा बाहर की हवा अंदर खींचो यह सब योग की प्रक्रियाएं हैं। महाप्रभु जी ने सुबोधिनी में कहा है कि योग को भी भक्ति का सहकार चाहिए। योग को जो भक्ति का साथ ना मिले तो वह योगी रोगी बन जाता है। बिना भक्ति का योग रोग उत्पन्न करता है। बिना भक्ति किए योग साधक नहीं होता, इतना ही नहीं वह कभी-कभी बाधक भी हो जाता है। भक्ति से योग किया जाए तो प्रभु के साथ संयोग होता है। योग से योगी मन को स्थिर कर सकता है किंतु हृदय विशाल नहीं होता हृदय की विशालता तो भक्ति और ज्ञान से ही होगी इसलिए पूरक प्राणायाम से ऐसी भावना करो कि प्रभु का तेजोमय स्वरूप तुम्हारे हृदय में उतर रहा है। भगवान का व्यापक तेज तुम्हारे हृदय में आ रहा है फिर जब कुंभक करो तब भावना करो कि मैं ईश्वर का आलिंगन कर रहा हूं। प्राण को शरीर में रोके रखना ही कुंभक है। उस समय ब्रह्म संबंध की भावना करो। उस समय सोचो कि मेरे प्रभु के साथ मेरा मिलन हुआ है, मेरे प्रभु ने मेरा आलिंगन किया है। यह ब्रह्म संबंध सतत टिक जाए तो मुक्ति मिलती हैय़ मनुष्य इस ब्रह्म संबंध को सदा बनाए नहीं रख सकता। संसार के विषयों में मन को जाने देने से ब्रह्म संबंध भंग हो जाता है। फिर प्राणायाम करना होता है। बाए नाक से सांस बाहर छोड़ना रेचक कहलाता है। उसमें ऐसी भावना करो कि मैं प्रभु के साथ एक हो गया हूं। मैं भगवान से एक रूप हो गया हूं, भगवान का बन गया हूं इसलिए मेरे पाप बाहर निकल रहे हैं, वासना बाहर निकल रही है। मेरे मन के सारे विकार बाहर निकल रहे हैं और अब मैं शुद्ध हो रहा हूं। जब तक कुछ ना कुछ लौकिक व्यवहार भी करना है तब तक मन स्थिर नहीं हो सकता। बाहर का संसार तो भजन में कीर्तन में विक्षेप नहीं करता किंतु मन का संसार अवश्य विक्षेप करता है। ब्राह्मण संध्या में अघमर्षण करता है। वह सोचता है कि मेरे पाप बाहर निकल रहे हैं। मन की मलिनता दो प्रकार की होती है। स्थूल मलिनता- साधारण साधन तप, व्रत, अनशन आदि से यह मलीनता दूर होती है। सूक्ष्म मलिनता- तीव्र भक्ति ही उसे दूर कर सकती है। शुकदेव जी ने इसलिए आरंभ में विराट पुरुष का ध्यान धरने की बात कही है। विराट पुरुष की धारणा किए बिना मन शुद्ध नहीं होता। शुक देव जी कहते हैं कि वैसे तो मेरी निष्ठा निर्गुण में है तथापि नंदनंदन यशोदानंदन मेरे मन को बार-बार अपनी ओर खींच लेते हैं। श्री कृष्ण भगवान की मधुर लीलाएं मेरे मन को, मेरे हृदय को बलपूर्वक अपनी और आकर्षित करती हैं इसी कारण से मैंने भगवत पुराण का अध्ययन किया और वह मैं आपको सुनाऊंगा। भगवान के नाम का प्रेम से संकीर्तन करना ही सभी शास्त्रों का सार है। सभी शास्त्र पढ़ो उन पर विचार करो किंतु याद रखो कि नारायण हरि ही सच्चा है। मैंने सब शास्त्र देख डाले कई बार विचार किया फिर भी सार तो एक ही निकला कि उन सभी के लिए केवल नारायण हरि ही हैं। सभी शास्त्रों के वाचन मनन के बाद मैंने तय किया है कि केवल भगवान का ही ध्यान करना चाहिए। निर्गुण के प्रति जब तक निष्ठा ना हो सके तब तक मन के राग द्वेष नहीं जाएंगे। जिसकी सगुण में तो निष्ठा हो किंतु वह निर्गुण को ना माने तो उसकी भक्ति अपूर्ण ही रहती है। ध्यान के आरंभ में मन की सेवा करो। ध्यान के समय मन शुद्ध ना हो तो आनंद नहीं मिलता। मन के बाहरी विषयों में भटकते रहने की आदत पड़ गई है। वर्तमान काल में जीवन भोग प्रधान बन गया है अतः मन को अंतर्मुख करना बड़ा कठिन है। ज्ञानी पुरुष मन की मलिनता धोने के लिए विराट पुरुष की धारणा करते हैं। विराट पुरुष की धारणा का अर्थ है सारे जगत को ब्रह्म रूप मानना। ब्राह्मण उस विराट पुरुष का मुख है, क्षत्रिय हाथ है, वैश्य जंघा है, शूद्र पग है, नदियां नाड़ी है। इस प्रकार जगत के प्रत्येक पदार्थ को ब्रह्म रूप देखकर मन को शुद्ध करना है। साधारण साधक के लिए इस विराट पुरुष की अवधारणा कठिन है। कुछ लोग अति सुंदर नारायण भगवान का ध्यान करते हैं। जगत को जब तक ब्रह्मरूप नहीं मानेंगे तब तक राग द्वेष नहीं मिटेंगे। कुछ लोग जगत को ब्रह्मामय मानते हैं तो कुछ लोग प्रत्येक पदार्थ में ब्रह्म स्वरूप का अनुभव करते हैं। राग द्वेष के नाश के लिए विराट पुरुष का ध्यान करो। सारा विश्व उसी विराट पुरुष का स्वरुप है ऐसी भावना मन में दृढ़ हो जाए तो जगत की किसी भी वस्तु के प्रति हीन भाव या कुभाव ना हो। हरि ही जगत है ब्रह्म दृष्टि से जगत सत्य है। ब्राह्मण भगवान के मुख से निकला है वैश्य जंघा से निकला है शूद्र चरण से निकला है इसलिए किसी का भी अपमान भगवान का ही अपमान है इसलिए किसी का भी अपमान और तिरस्कार ना करो। जगत में जड़ और चेतन का जब तक भेद रखोगे तब तक ध्यान में एकाग्रता नहीं आएगी। उसके बाद भागवत में वैराग्य का उपदेश दिया गया है बिना बैराग्य के ध्यान नहीं हो सकता, ध्यान में एकाग्रता नहीं हो सकती। संसार का स्मरण ही दुख है और संसार का विस्मरण ही सुख है। ज्ञान मार्ग में तीव्र वैराग्य होना चाहिए। भक्ति प्रेम मार्ग में समर्पण की प्रधानता है। भक्ति करनी हो तो वह बैरागी के बिना तो चल सकती है किंतु सबके साथ प्रेम तो करना ही पड़ेगा। वैराग्य से यह काम अधिक कठिन है। सबके साथ प्रेम करो अथवा अकेले ईश्वर से प्रेम करो। जगत् के प्रत्येक पदार्थ के साथ प्रेम करना भक्ति मार्ग है। ज्ञानमार्ग त्यागप्रधान है। भक्ति मार्ग में समर्पण का प्राधन्य है। ज्ञानी सब का निषेध करता हुआ परिनिषेध में जो शेष रहता है उसी में मन को दृढ़ करता है। साधारण मनुष्य के लिए ज्ञान मार्ग सुलभ नहीं है। मनुष्य सर्वस्व त्याग तो नहीं कर सकता। शरीर से आत्मा भिन्न है ऐसा सब समझते तो है किंतु उसका अनुभव आसान नहीं है। भक्त मानता है कि गाय में बसे हुए श्री कृष्ण की सेवा घास में बसे हुए श्री कृष्ण से करूंगा। भक्ति मार्ग में सद्भाव आवश्यक है सभी के प्रति सद्भाव रखना कठिन कार्य है। श्री कृष्ण भगवान तो स्वयं को लात मारने वाले को भी स्वभाव की दृष्टि से देखते हैं। मन की मलिनता धोने के लिए विराट पुरुष का ध्यान करना है। विराट पुरुष के ध्यान करने का अर्थ है इस जगत में जो कुछ दिख रहा है उसमें परमात्मा का वास है ऐसा समझकर व्यवहार करना। सारा जगत विराट पुरुष का स्वरुप है विराट पुरुष के ध्यान के लिए तीव्र वैराग्य जरूरी है। सारा विश्व ब्रह्मरूप है ऐसा मानकर ज्ञानी पुरुष ललाटमें ब्रह्मके दर्शन करता है। वैष्णवजन ह्रदय में चतुर्भुज द्वारिकानाथके दर्शन करते हैं।प्रभु के एक अंगका चिंतन करना ध्यान है और प्रभुके सवाँगका चिंतन करना धारणा है। दास्यभक्ति द्वारा हृदय जल्दी दीन बनेगा। पहले भगवानके चरणार्विका ध्यान करो, फिर मुखारविदका और अंत में सबका ध्यान करो। ध्यानयोगकी कथा कपिल गीता में विस्तारसे दी गयी है जिसका यहाँ संक्षेप किया गया है। साधक सावधान होकर ध्यान करेगा तो उसकी समझमें यह बात आ जाएगी कि मायाकी शक्ति भ्रांतिमय ही है। ईश्वरका चिंतन न हो सके तो भी कोई नहीं है किंतु संसारका चिंतन तो कभी भी नहीं करना चाहिए। ईश्वरका ध्यान चाहे न हो सके किंतु संसारका ध्यान छोडनेकी आदत डालनी चाहिए। ध्यानके विना ईश्वरका साक्षात्कार नहीं हो सकता। जिस तरह रुपये-पैसेका ध्यान करते हो उसी तरह परमात्मा का ध्यान करो। आरंभावस्था में आंखों के सामने अंधकार-सा छा जायेगा। किंतु धैर्य से योगधारणा करके मन को वशमें करो। बुद्धि द्वारा प्रभु के सर्वांगों की धारणा करो। ज्यो ज्यो बुद्धि स्थिर होती जाऐगी, त्यो त्यो मन भी स्थिर होने लगेगा। धारणा स्थिर होने पर ध्यानमें प्रभुका मंगलमय स्वरूप दीखता है और भक्तियोगकी प्राप्ति होती है। ध्यान में मन यदि स्थिर न हो सके तो उस मनको मृत्यु से भयभीत करो। तभी वह स्थिर होगा। मनको किसी भी तरह समझाओ और स्थिर करो।

क्षणभंगुर जीवनको कलिका, कल प्रातः समय खिली न खिली;
मलयाचलकी शुचि शीतल गंध समीर चली न चली।
कलिकाल कुठार लिए फिरता तन नम्र है चोट झिली न झिली;
रट ले हरिनाम अरी रसना, फिर अंत समयमें हिली न हिली॥

ज्ञानदेवने मनको गुरु बनाया है। मन का सच्चा गुरु आत्मा है। एकनाथ महाराजके पास एक वैष्णव आया। उसने महाराजसे पूछा कि आपका मन ईश्वरसे, सदासर्वदा श्रीकृष्णमें कैसे स्थिर रहता है? मेरा मन तो आधा घंटा भी प्रभुमे स्थिर नहीं रह सकता। मनको स्थिर करनेका कोई उपाय बताये। एकनाथने सोचा कि उपदेश क्रियात्मक होना चाहिये। उन्होंने कहा कि जाने दे इस बातको अभी। मुझे लगता है कि तेरी मृत्यु समीप आ रही है। मृत्युके पहले वैर और वासनाका त्याग करना चाहिए। वैर और वासना मृत्युको बिगाड़ती है। सात दिनोंके बाद फिर मेरे पास आना।

मृत्यु का नाम सुनते ही उस वैष्णव के तो मानो होश ही उड़ गए। वह घर लौटा। धन संपत्ति आदि सब कुछ पुत्र के हाथों में सौंप दिया। उसने सबसे क्षमा याचना की और वह ईश्वर का ध्यान करने लगा, 7 दिनों के बाद वह एकनाथ महाराज के पास आया। महाराज ने पूछा कि इन 7 दिनों में तूने क्या क्या किया। तूने कुछ पाप तो नहीं किया। वैष्णव ने उत्तर दिया कि मैं मृत्यु से ऐसा डर गया कि सब कुछ छोड़कर प्रभु के ध्यान में लग गया। तो एकनाथ ने कहा कि मेरी एकाग्रता का यही राज है मैं मृत्यु को रोज याद करता हूं, मैं मृत्यु का मन में डर रखकर सतत ईश्वर भजन करता हूं अतः सभी विषयों से मेरा मन हट जाता है और वह सदा सर्वदा श्री कृष्ण में एकाग्र रहता है। परमात्मा मे मन तन्मय ना हो सके तो कोई बात नहीं किंतु संसार के साथ कभी तक तन्मय न बनो। परमात्मा के ध्यान से जीव ईश्वर में मिल जाता है। ध्यान करने वाला ध्येय में मिल जाता है। ध्याता, ध्यान और ध्येय तीनों एक होते हैं, यही मुक्ति है यही अद्वैत है। दृष्टि, द्रष्टा और दर्शन एक होने चाहिए। साधन, साधक और साध्य एक बनने चाहिए। ध्याता, ध्यान और ध्येय तथा दृष्टा और दृश्य एक बने तो समझो कि ध्यान में और दर्शन में एकतानता उत्पन्न हो गई है। एकतानता होने से वह अन्य सब कुछ भूल जाता है और उसे ईश्वर के सिवा दूसरा कुछ भी नहीं दिखता। लोग परमात्मा को धन देते हैं किंतु वे तो मन मांगते हैं। व्यवहार तो करो किंतु इस ईश्वर में कृष्ण में मन रख कर करो। पानिहारि ने पानी से भरे घड़े सिर पर रखकर बातचीत करती हुई चलती है फिर भी उनका ध्यान सिर पर रखे हुए घड़ों में रहता है कि कहीं वे गिर न पड़े। इसी तरह संसार के व्यवहार करते समय भी हमेशा ईश्वर का स्मरण भी करते रहो। जगत के पदार्थों में आसक्ति न रखो। विषयानंदी व्यक्ति ब्रह्मानंद को समझ नहीं सकता। ब्रह्मानंद का वर्णन कोई भी नहीं कर सकता। उपनिषद में दृष्टांत दिया गया है कि शक्कर, मिश्री से बनी हुई गुड़िया ने सागर की गहराई को जानने का प्रयत्न किया किंतु वह सागर में जो गई सो गई ही, उसी में विलीन हो गई। जो ईश्वर में लीन हो गया उस जीवको कोई ईश्वर से अलग भी नहीं कर सकता। ज्यों ज्यों ध्यान किया जाता है त्यों त्यों जीव का परमात्मा मे लय होता जाता है और फिर जीव का जीवत्व रहता ही नहीं है। भागवत में ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग दोनों बताए गए हैं। ज्ञान मार्ग में जीव ईश्वर के साथ एक होता है और ईश्वर में विलीन हो जाता है। दूसरी ओर कतिपय वैष्णवाचार्य कुछ अद्वैत को मानते हैं। भक्ति का आरंभ भले ही द्वैत से हो किंतु उसकी समाप्ति तो आज से ही होती है। भक्त और भगवान अलग नहीं रह सकते जो जीव ईश्वर में विलीन हो गया है उसे भगवान अपने स्वरूप से अलग नहीं कर सकते। उपनिषद में ईश्वर का वर्णन करते हुए कहा है- रसो वै सः। अर्थात ईश्वर रस रूप हैं। वैष्णव आचार्य अभेद भाव में श्रद्धा रखते हैं। जल में रहने वाली मछली पानी नहीं पी सकती। इस तरह ब्रह्मरस में डूब गया है, जो ब्रह्म रूप हो चुका है वह फिर परमात्मा के रसात्मक स्वरूप का अनुभव नहीं कर सकता। ब्रह्मरूप होने से जीव की दुख निवृत्ति तो होती है किंतु वह आनंद का अनुभव नहीं कर सकता। रचनात्मक और आनंदात्मक ब्रह्म का स्वरूप अनुभव करने के लिए जीव को कुछ अलग करना पड़ेगा, थोड़ा सा द्वैत रखना ही होगा। तब भक्त कहता है कि मैं अपने प्रभु का अंश हूं मैं अपने भगवान की गोपी हूं मुझे परमात्मा के साथ एक नहीं होना है मुझे तो परमात्मा की सेवा करनी है, मुझे गौलोक धाम में जाना है। भक्त जब लौकिक देह को छोड़कर अप्राकृत शरीर धारण करके गौलोक धाम में प्रवेश करता है तो भगवान को आनंद होता है। वे कहते हैं मेरा अंश मुझमें मिलने आया है। इसलिए भगवान उत्सव मनाते हैं किंतु तुकाराम कहते हैं कि कीर्तन करने में मुझे जो आनंद मिलता है वह विट्टल बनने में नहीं मिलता। जीव ईश्वरका अनुभव कब कर सकेगा। जब ईश्वर से वह भिन्न रहेगा तभी वह उस रस का अनुभव कर सकेगा। वैष्णवाचार्य चाहते हैं कि जीव ईश्वर से कुछ अलग रहे। कीडा भंवरीका चितन करता हुआ स्वयं भंवरीरूप बन जाता है। उसी तरह ब्रह्मका चिंतन करता हुआ जीव स्वयं बहा रूप बन जाता है। यह तो है केवल्यमुक्ति। किंतु वैष्णवजन ऐसा केवल्यमुक्ति इच्छा नहीं रखते। वे ईश्वर की सेवा-पूजा और उसका रसास्वादन करने के लिए थोडा-अद्वैतभाव रखते ही हैं। जो व्यापक ब्रह्म में लीन हो चुका है वह उससे अलग कैसे हो सकता है। पानीके जड़ या ठोस होने के कारण मछली अलग रह सकती है। किंतु जो पानी में हर तरहसे डूब गया हो वह पानीको स्वाद नहीं ले सकता है। उसी तरह इश्वरमें डूबा हुआ जीव ईश्वरके स्वरूपका रसानुभव नहीं कर सकता। इसलिए, वैष्णव महापुरुष थोड़ा-सा द्वैत रखकर भगवान की सेवा स्मरण में कृतार्थताका अनुभव करते हैं। यह दोनों सिद्धांत सत्य हैं। खंडन मंडन के पचड़े में मत पडो। गौरांग प्रभु भी इस भेदाभेद भावको मानते हैं। लीलाभेद को मानते है। परंतु तत्व दृष्टि से अभेद हैं। अभिन्न होने पर भी उन दोनोमे सूक्ष्म भेद है। एकनाथ महाराज ने भावार्थ रामायणमें उस सिद्धांत को समझाने के लिए एक दृष्टांत दिया है। अशोक वनमें राम के विरह में सीताजी रामका अखंड ध्यान स्मरण करती है। सीताजी रामक ध्यान में तन्मय हैं। विरह में तन्मयता विशेष होती है। सर्वत्र राम दीखते हैं। माताजी भूल जाती हैं कि वे सीता है। सभी में रामका अनुभव करनेवाला रामरूप बनता है। यही कैवल्यभक्ति है। सीताजीको एक बार लगता है कि वह रामरूप है। वे अपना स्त्रीत्व भी भूल जाती हैं। एक बार सीताने त्रिजटा से पूछा कि मैने सुना है कि कीडा भंवरी का चितन करता हुआ स्वयं भंवरी बन जाता है तो इसी भांति रामजीका सतत चिंतन करने में भी याद मैं राम बन गई तो क्या होगा। सीता जी रामके ध्यानमें ऐसी तन्मय हो जाती है कि मानो वे स्वयं राम ही हो जाती है। त्रिजटाने कहा कि माताजी, आप रामरूप हो जाये तो अच्छा ही होगा। जीव और शिव एक हो जाय तो जीव कृतार्थ हो जाता है। तो सीताजी कहती है कि यदि मैं रामका चितन करती हुई स्वयं राम बन गई तो फिर श्री रामजीकी सेवा कौन करेगा? सीता रहकर रामकी सेवा करनेमे जो आनंद है वह स्वयं रामस्वरूप बनने में नहीं है। मुझे राम होने में आनंद नहीं है। मुझे तो रामजीकी सेवा करनी है। सीताजीको दुःख होता है कि उनका युगलभाव खंडित हो जाएगा। उस हालत मे सीतारामका युगलभाव नहीं रह सकेगा। तब त्रिजटाने कहा अन्यान्य प्रेम होनेके कारण रामजी आपका चिंतन करते हुए सीतारूप बन जाएंगे और इस तरह आपका युगलभाव जगतमें अखंडित ही रहेगा। यही भागवती मुक्तिका रहस्य है। वैष्णव आचार्य प्रथम द्वैतका नाश करते हैं और अद्वैत प्राप्त करते हैं। फिर काल्पनिक द्वैत बनाए रखते हैं कि जिसके कारण कन्हैयाकी गोपीभावसे पूजा की जा सके। ज्ञानीजन ज्ञानसे अद्वैत सिद्ध करते हैं। यह अद्वैतमुक्ति है, कैवल्यमुक्ति है। भक्त भक्ति से अद्वैत सिद्ध करते हैं। यह भागवती मुक्ति है। इस प्रकार दो भक्तियोंका वर्णन हुआ है। सत्रह तत्त्वका सूक्ष्म शरीर है। स्थूल और सूक्ष्म शरीरका नाश होने पर मुक्ति प्राप्त होती है। विचारप्रधान मनुष्य ज्ञानमार्ग पसंद करता है। भावनाप्रधान मनुष्य कोमल हृदयी होने के कारण भक्तिमार्ग पसंद करता है। ईश्वर से विमुख न होना ही भक्ति है। सभी साधनमें भक्ति ही श्रेष्ठ है। भक्तिशून्य पुरुषों के सभी साधन निष्फल ही रहते है। जीव और ईश्वरका मिलन करानेका साधन है कथा। भागवतमें जहाँ भी भक्ति शब्द को प्रयोग किया गया है वहाँ तीव्र शब्द भी प्रयुक्त हुआ है। भक्ति तीव्र होनी चाहिए। विना तीव्रता साधारण भक्ति से कुछ नहीं होता। वैराग्यकी इच्छावाला मुमुक्षु भक्त हो तो उसे तीव्र भक्तियोग से परम पुरुष पूर्ण परमात्मा का पूजन करना चाहिए। शुकदेवजी कहते हैं- हे राजन् मुक्ति प्राप्त करनी ही है तो आरंभमें भोगो का त्याग करना ही पड़ेगा। भोगी ज्ञान या भक्ति मार्गमें आगे नहीं बढ़ सकता। भोग भक्तिमें भी बाधक है और ज्ञान में भी। भोग की अपेक्षा त्यागमें अनंत गुना सुख है। इन्द्रियजन्य सुख सभी प्राणियोंमें एक सा ही होता है। पशु का, मनुष्यका और देवगंधर्व का त्वचेन्द्रिय का स्पर्शसुख और जिह्वेन्द्रिय का रससुख समान ही होता है। इन्द्रिय सुख के उपभोग के समय जो आनंद मनुष्यको मिलता है वहा आनंद पशु को भी मिलता है। छप्पन मन रूई की गद्दी वाले पलंग पर जाने वाले सेठ को जो आनंद मिलता है वही आनंद कचरे कूड़े के ढेर में पड़े हुए गधे को भी मिलता है। इसीलिये मनुष्यको चाहिये कि वह बुद्धि पूर्वक भोग छोड़े। भोग में क्षणिक सुख मिलता है पर त्यागसे हमेशा के लिये अनंत सुख प्राप्ति होती हैं। भोग से शांति नहीं मिलती हैं। पशु, पंखी, मनुष्य सभी के लिए इन्द्रिय सुख तो एक समान ही है। मनुष्यको जो सुख श्रीखंड खाने से मिलता है वही सुख सुअरका विष्ठा खान में मिलता है। राजन् ! तुमने आज तक अनेक भोगों का उपभोग किया। अब तुम अपनी एक एक इन्द्रियाको भक्तिरसका पान कराओ। इन्द्रियरूपी पुष्प तुम भगवान को अर्पित करो। राजन् ! जिसकी मृत्यु समीप है उसे चाहिए कि वह संसारका भूलने का और परमात्मा में मन लगाने का प्रयत्न करे। राजन् धीरे धीरे संयमको बढाओ। श्रीकृष्णका सतत ध्यान धरना ही मनुष्यमात्रका कर्तव्य है। जो ईश्वरमें तन्मय होता है उसे मुक्ति मिलती है। राजन्, जन्म उसीका सफल हुआ जानो कि जिसे दूसरी बार माताके गर्भ में आने का अवसर ही न मिले। गर्भवास नरकवास है। कर्म और वासनाको साथ लेकर जो जन्म लेता है। उसके लिए गर्भवास नर्कवास ही है। शुकदेवजी जनकराजाके राजगृहमें विद्या सीखनके लिये गये। विद्याभ्यास समाप्त हुआ। शुकदेवजीने गुरुदक्षिणा देनेकी इच्छा प्रकट की। जनक राजा ने कहा मुझे कई गुरुदक्षिणाकी इच्छा नहीं है। फिर भी तुम आग्रह करते ही हो तो जगत में जो वस्तु बिलकुल निरूपयोगी हो वही मुझे दे दो। जनक राजाने निरुपयोगी वस्तु मांगा तो शुकदेवजी उसकी खोज में निकल पड़े। उन्होने प्रथम मिट्टी उठायी तो उसने कहा कि मेरे तो कई उपयोग हैं। पत्थरने भी वैसा ही कहा। जो भी वस्तु उठायी वह सभी उपयोगी निकल पडी। अंतमें हार कर शुकदेवजीने विष्ठा उठायी। तो उसने भी कहा कि मैं भी उपयोगी हूं। मनुष्यके पेट में जाने से ही मेरी यह अवदशा हुई है। फिर भी में निरुपयोगी नहीं हूं। सोचते सोचते शुकदेवजीने पाया कि यह देहाभिमान ही निरुपयोगी है। परमात्माकी सेवा करते हुए पुरुषत्व और स्त्रीत्वका भान चला जाए तो गोपी भाव सिद्ध होता है और परमात्माकी नित्य लीला में प्रवेश मिल जाता है।  शुक्रदेवजीने जनक राजासे कहा कि मैं अपना देहाभिमान गुरुदक्षिणा में अर्पित करता हूं। यह सुनकर जनकराजाने शुकदेवजीसे कहा कि अब तुम कृतार्थ हो गये हो। शुकदेवजीने देहाभिमान छोड़ दिया। देहभान न होने के कारण ही उन्होंने मंगलाचरण नहीं किया। चीथ अध्यायमे मंगलाचरण किया है बारहवें श्लोकसे।

साधक को कथा मार्ग दर्शन कराती है। इतना ही नहीं सिद्ध पुरुषों को भी कथा सुनने की जरूरत रहती है। शुकदेव जी कथा में भी पराशर जी, व्यास जी आदि बैठे थे। द्वितीय स्कंध में अध्याय 1, 2, 3 में भागवत का पूरा सार और सारा बोध आ गया है। राजा को जो उपदेश देना था वह 3 अध्यायों में विदित है फिर उसके बाद तो परीक्षित राजा का मन विषय की ओर ना चला जाए इसलिए सभी चरित्र कहे गए हैं।

जो महान भक्त वत्सल हैं और हठ पूर्वक भक्ति हीन साधना वाले मनुष्य जिसकी छाया का भी स्पर्श नहीं कर सकते। जिसके समान भी किसी का ऐश्वर्य नहीं है तो फिर अधिक तो कैसे होगा तथा जो ऐश्वर्या युक्त होकर निरंतर ब्रह्म स्वरूप अपने धाम में बिहार कर रहे हैं ऐसे भगवान श्री कृष्ण को मैं बार-बार नमस्कार करता हूं।

प्रेम में पक्षपात हो ही जाता है। शुकदेवजी राधाकृष्णाको दो बार नमस्कार करते हैं। क्योकि राधाजी श्रीशुकदेवजीकी गुरु हैं। राधाजीने शुकदवजीका ब्रह्मसंबंध करवा दिया था। शुकदेवजी पूर्वजन्ममें तोता थे। वे रात-दिन हरेभरे निकुंजमें राधाका नाम सतत रटते रहते थे। शुकदेवजी श्री राधा जी के शिष्य हैं। यही कारण है कि भागवतमें राधाजीके नामका उल्लेख तक नहीं है। गुरुका प्रकट रूपसे नाम लेना शास्त्रनिषिद्ध हैं। भागवतके टीकाकार श्रीधर स्वामी इन पांच वस्तुको नित्य मानते हैं। भगवानका स्वरूप, भगवान की लीला, भगवानका धाम, भगवानके काम और परिकर। परीक्षित राजाने पूछा कि अपनी मायासे भगवान् इस सृष्टिकी रचना कैसे करते हैं। इसकी उत्पति कथा कहिए। शुकदेवजीने कहा। राजन् , तुमने जो प्रश्न मुझसे पूछा है वहीं प्रश्न नारदजीने ब्रह्मा जी से पूछा था। तुम उसकी कथा सुनो। ब्रह्माजीने नारदजी से सृष्टिके आरंभकी कथा कही थी। भगवानकी इच्छा हुई कि वे एक से अनेक बनें। उन्होने २४ तत्व उत्पन्न किये। ये सभी तरव कुछ न कर सके तब प्रभुने उन सभी तत्वोंमें प्रवेश किया। तभी उन तत्वों मे चेतनाशक्ति प्रकट हुई। सातवें अध्याय में भगवान के लीला अवतारोका संक्षिप्त वर्णन है। ब्रह्मा जी की निष्कपट तपश्चर्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें अपने स्वरूपका दर्शन कराया। आत्मतत्व के ज्ञान के लिए उन परम सत्य परमार्थ वस्तुका जो उपदेश किया उसकी कथा सुनाता हूँ। आदिदेव ब्रह्मा जी अपने जन्मस्थान कमल पर बैठ कर श्रृष्टि रचने की इच्छा से सोच में डूबे हुए थे फिर भी जिस ज्ञान दृष्टि से सृष्टि की रचना की जा सकती कि वह प्राप्त ना हो सकी। ऐसे में ब्रह्मा जी ने आकाशवाणी सुनी तप तप। ब्रह्मा जी ने समझा कि मुझे तप करने का आदेश मिला है। ब्रह्मा जी ने सौ वर्षों तक तप किया और उन्हें चतुर्भुज नारायण के दर्शन हुए। तप किए बिना किसी का भी काम नहीं बनेगा जो तप नहीं करता उसका पतन होता है। तप शब्द के अक्षरों को पलट लेने पर पत होता है। नारायण भगवान ने ब्रह्मा जी को चतुश्लोकी भागवत का उपदेश दिया। द्वितीय स्कंध के 90 अध्याय के 32 से 35 श्लोक ही चतुश्लोकी भागवत है। भगवान आंख मिचौली खेलते हैं ।आरंभ में सभी जीव भगवान में निहित थे। भगवान जीव को खोज कर उसके कर्मानुसार शरीर देते हैं फिर कहते हैं अब मैं छिप जाता हूं तू मुझे खोज लेना। जब जगत अस्तित्वमें नहीं था तब भी मैं था । जब जगत नही रहेगा तब भी मैं रहूँगा। जिस तरह स्वप्न में एक ही अनेक स्वरूप देखता है उसी तरह जागृत अवस्था में भी अनेक में एक ही तत्व है ऐसा ज्ञानी पुरुषों का अनुभव है। आभूषण के आकार से भित्र होने पर भी सभी एक ही प्रकारके सुवर्ण से बने होते है। मूल्य भी उस स्वर्ण का ही है आकार का नहीं। ईश्वर के सिवाजो भी कुछ दिखायी देता है वह सत्य है। ईश्वरके सिवा दूसरा जो कुछ भी दिखायी दे, वह ईश्वरकी माया ही है। अस्तित्व न होने पर भी जो दिखायी देता है और सभी में व्याप्त होते हुए भी ईश्वर दिखायी नहीं देता यह ईश्वरकी माया ही है। यह मायाका ही कार्य है। उसे ही महापुरुष आवरण और विक्षेप कहते है। सभीका मूल उपादान कारण प्रभु है। प्रभुमें भासमान से संसार सत्य नहीं है, किंतु माया के कारण आभासित होता है। मायाकी दो शक्तियां है :

१) आवरण शक्ति :- मायाकी आवरण शक्ति परमात्माको छुपाए रहती है।

(३) विक्षेप शक्ति :- मायाकी विक्षेप शक्ति ईश्वरके अधिष्ठानमें ही जगत् का भास कराती हैं। ईश्वर में जगत् का भास कराती है।

अंधकारके दृष्टांत द्वारा यह सिद्धांत समझाया गया है। जो नहीं है वह भूलसे दीखता है और जो है वह दीखता नहीं है। आत्म स्वरूप का विस्मरण ही माया है। अपने स्वरुपकी विस्मृति स्वप्न ही है। जो स्वप्न देखता है देखने वाला सच्चा है। स्वप्न में एक ही पुरूष दो दिखाई देता है। तात्विक दृष्टि से देखें तो सपने का साक्षी और प्रमाता एक ही है। वह जब जागता है तो उसे विश्वास हो जाता है कि मैं तो घर में सेज पर ही सोया हूं। सपने का पुरुष भिन्न है ।जगत का ब्रह्म तत्व एक ही है किंतु माया के कारण अनेकत्व का आभास होता है। माया जीवन से लगी हुई है यह माया जीवन से कब लगी। कहा नहीं जा सकता क्योंकि माया अनादि है उसका मूल खोजने की जरूरत नहीं है।

माया का अर्थ है अज्ञान। अज्ञान कब से शुरू हुआ वह जानने की क्या जरूरत है। माया जीव से कब लगी है उसका विचार ना करो। उसका पार कोई भी नहीं पा सकता। कब विस्मरण हुआ यह कहा नहीं जा सकता, उसी तरह अज्ञान का कब आरंभ हुआ वह भी नहीं कहा जा सकता पर अज्ञान का तात्कालिक विनाश करना जरूरी है। कपड़ों पर दाग लग जाए तो वह कैसे लगा, किस जगह लगा, कौन सी स्याही होगी आदि का विचार करने की अपेक्षा उस दाग को तुरंत दूर करना ही हितकारी ।है माया के बारे में सोचते रहने की अपेक्षा माया को दूर करने के लिए परमात्मा की शरण लेना अच्छा है। माया का दर्शन करनेकी सुदामाकी इच्छा होने पर उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि आपकी मायाका मैं दर्शन करना चाहता है। वह कैसी होती है ? श्रीकृष्ण ने कहा कि समय आने पर उसका दर्शन कराऊँगा। चलो, पहले हम गोमतीमें स्नान कर ले। दोनों गोमती तट पर आए। स्नान करने लगे। भगवान तो स्नान करके पीतांबर पहनने लगे। सुदामाने गोमतीके जलमें गोता लगाया। उसी समय भगवान ने अपनी मायाका दर्शन कराया। सुदामाको लगा कि गोमतीमे बाढ़ आ गई है। वे उसमें बहे चले जा रहे हैं। उन्होंने एक घाटका आसरा लिया। घूमते-फिरते वे एक गांवके पास आए। वहां एक हथिनि ने उनके गले में फूलमाला पहनाई। लोगों ने सुदामासे कहा कि हमारे देशके राजाकी मृत्यु हो गई है। इस गांवका नियम है कि पहले राजाकी मृत्युके बाद हथिनी जिसके माला पहनाए वही राजा हो। इसलिए आप हमारे देशके राजा हो गए हैं। सुदामा राजा बन गए। एक राजकन्याके साथ उनका विवाह भी हो गया। बारह वर्ष के दांपत्य जीवनमे दो पुत्र भी उत्पन्न हो गए। फिर एक दिन बीमार होने से रानीकी मृत्यु हो गई। सुदामा दुःखसे रोने लगे क्योंकि वह रानी सुंदर और सुशील थी। लोगों ने सुदामा से कहा कि मत रोओ। हमारी मायापुरीका नियम है कि आपकी पत्नी जहाँ गई है वहां आप भी जाये। पत्नीकी चिता में आपको भी प्रवेश करना होगा। अब सुदामाने पत्नीका रोना बंद कर दिया और वे अपना रोना ही रोने लगे। हाय मेरा क्या होगा। उन्होंने लोगो से कहा कि मैं तो परदेशी हूं। आपके गाँवका कानून मुझ पर नहीं लग सकता। मुझे एक बार स्नान-संध्या करने दो फिर चाहे मुझे जला देना। वे स्नान पर ले गए तो चार पुरुष निगरानी करने लगे कि सुदामा कहीं भाग न जाएं। सुदामा खुब डर गए । घबडाहट के मारे वे परमेश्वर को याद करने लगे। वे रोते हुए नदी से बाहर आए। उस समय भगवान् तो तट पर खड़े हुए पीतांबर पहन रहे थे। भगवान ने पूछा कि तुम क्यों रो रहे हो। सुदामा ने कहा कि वह सब कहां चला गया। यह सब क्या है। मेरी समझमें तो कुछ नहीं आता। भगवान् ने कहा कि यही मेरी माया है। मेरे बिना जो आभास होता है वही मेरी माया है। मायाका अर्थ है विस्मरण। मा निषेधात्मक है और या हकारात्मक, इसप्रकार जो न हो उसे दिखाये वह माया है। माया के तीन प्रकार हैं। 1. स्वमोहिका, 2 स्वजन मोहिका, 3. विमुखजन मोहिका। जो सतत ब्रह्मदृष्टि रखता है उसे माया पकड़ नहीं सकती। माया जीव से लगी हुई है यह सिद्धांत तत्व दृष्टि से सच्चा नहीं है। माया नर्तकी है। यह सबको नचाती है। नर्तक-माया के मोह से छूटना है तो नर्तकी शब्द को उल्ट दो और तब होगा कीर्तन। कीर्तन करोगे तो माया छूटेगी। कीर्तन-भक्तिमें हरक इन्द्रिय को काम मिलता है। इसलिए ही महापुरुषों ने कीर्तन-भक्तिको श्रेष्ठ माना है। मायाका पार पानेके लिए, माया जिसकी दासी है उस मायापति परमात्माको पानेका प्रयत्न करो। मायाकी पीड़ा से मुक्ति पाना चाहते हो तो माधवराय की शरणमें जाओ।

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ।। मुझे ही जो भजते हैं वे इस दुस्तर माया अथवा संसारको पार कर जाते हैं। तस्मात् स्वात्मना राजन् हरिः सर्वत्र सर्वदा।। श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यो भगवान्नृणाम् ।।

राजन्, इसीलिये मनुष्यको चाहिये कि वह हरकोई स्थानमें और हर किसी समय, अपनी संपूर्ण शक्तिसे भगवान् श्री हरिका श्रवण, कीर्तन और स्मरण करता रहे। मायाकी अधिक चर्चा न करो । ब्रह्माजीने नारदजीको ऐसी आज्ञा दी थी कि माया जिनकी दासी है ऐसे मायापति परमात्माके चरणका आसरा लेकर प्रभु भक्ति बढे उस तरहसे इस सिद्धांतका प्रचार करो। नारदने वह उपदेश व्यासजीको दिया । व्यासजीने उन चार श्लोको के आधार पर हजार श्लोको का भागवतशास्त्र रचा।।

हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ।

हरे कृष्णा हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।।

 

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