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Gita rahasya दशम स्कंध

Gita rahasya दशम स्कंध

अब दशम स्कंध का आरंभ हो रहा है।  भागवत का फल दशम स्कंध है दशम स्कंध में शुकदेव जी मानव पूर्व बहार में खिल गए हैं। यह शुकदेव जी के इष्ट देव की कथा है। श्रीमद्भागवत 7 दिनों में मुक्ति दिलाने वाला ग्रंथ है। अनेक जन्मों तक साधन साधना करने पर भी नहीं मिलने वाली मुक्ति अति दुर्लभ मुक्ति राजा परीक्षित को 7 दिनों में मिल गई थी। परीक्षित का प्रश्न था- आसन्न मृत्यु व्यक्ति का क्या कर्तव्य है। शुकदेव जी यदि यज्ञ करने की आज्ञा दें तो 7 दिनों में मुक्ति पाना संभव नहीं था। जीवन के अंतिम सांस में भी विकार का विचार ना आए वैसा उपाय करना था। शुकदेव जी ने सोचा कि यदि कृष्ण कथा में तन्मय हो सके तो उसे मुक्ति मिल सकती है। मुक्ति मन को मिलती है आत्मा को नहीं। कुछ आचार्य मानते हैं कि आत्मा और परमात्मा एक है। वे मानते हैं कि आत्मा अंश है और परमात्मा अंशी। शंकर स्वामी का सिद्धांत इस प्रकार है- जीव और ईश्वर एक हैं। यह जो भेद दिखाई देता है वह अज्ञान के कारण दिखता है। भेद औपाधिक भेद है। उपाधि के कारण भेद का आभास होता है किंतु तत्वतः भेद नहीं है। भेद के दो प्रकार होते हैं- स्वता सिद्ध भेद और औपाधिक भेद। घोड़ा और गाय का भेद स्वतः सिद्ध है। ना तो घोड़ा गाय बन सकता है और ना तो गाय घोड़ा। औपाधिक भेद जल का वास्तविक रूप शीतलता है। उष्ण जल की उष्णता का कारण उपाधि है। वास्तविकता में तत्वतः आत्मा और परमात्मा, जीव और ईश्वर एक ही हैं। जो भेद दिखता है वह औपाधिक है। घटकाश और व्यापक आकाश एक ही है किंतु घट की उपाधि के कारण भेद का आभास होता है। घट के टूट जाने पर घटाकाश और महाकाश एक हो जाते हैं किंतु मिलता क्या है। वे तो एक ही हैं। वास्तविक दृष्टि से वे तो मिले हुए ही हैं। व्यापक चैतन्य ही ईश्वर है। व्यापकाधिष्ठ चैतन्य ही परमात्मा है। शरीराधिष्ठ चैतन्य ही जीव है। अविद्या के आवरण से युक्त चैतन्य ही जीव है। अविद्या रूपी आवरण के दूर होने पर जीव और शिव एक बनते हैं। उपाधि के कारण ही शिव और जीव की भिन्नता भासमान होती है। यह वेदांत का सिद्धांत है। यह जीव अंश नहीं बन सकता। यदि अंशी में से अंश विभक्त हो जाए तो अंशी का स्वरूप खंडित होगा। पुष्प की एक पंखुरी अलग होने पर पुष्प का स्वरूप खंडित होता है। अंशी में से अंश अलग होने पर अंशिका अखंडित स्वरूप स्वरूप टूट जाएगा। अतः शंकराचार्य कहते हैं जीव अंश जैसा है पूर्णांश नहीं है। ईश्वर ऐसे नहीं है कि जिसका विभाजन किया जा सके। वे व्यापक चैतन्य हैं, सर्वव्यापी हैं। आकाश की भांति वे सभी जगह हैं। वैष्णव आचार्य मानते हैं कि जीव और ईश्वर एक नहीं हैं। जीवन ईश्वर का अंश है। अंशी से अंश के विभक्त होने पर भी अंशी का नाश नहीं हो पाता। समुद्र में से एकाध बूंद पानी लेने पर समुद्र का नाश नहीं होता है। इसी प्रकार अंश के विभक्त होने पर अंश का नाश नहीं हो पाता, उसके स्वरूप में भी परिवर्तन नहीं होता। हम सब मानो एक राजा की संतान हैं। माया एक दासी है जो हमारा लालन-पालन के लिए ही है, हमें सताने के लिए नहीं। यदि वह हमें सताएगी तो राजा (प्रभु) उसे छुट्टी दे देंगे। परमात्मा के साथ घनिष्ठता से प्रेम करेंगे तो माया का बंधन टूट जाएगा। गोकुल लीला का यही तो रहस्य है। अति सूक्ष्म बुद्धि वाला व्यक्ति वेदांत के विवर्तवाद को समझ सकता है। उर्मि प्रधान व्यक्ति को वैष्णवाचार्यों का सिद्धांत पसंद आएगा। यह दोनों सिद्धांत दिव्य हैं। शुकदेव जी सावधान करते हैं। चाहे जो भी समझा या माना जाए किंतु मुक्ति मन को मिलती है आत्मा को नहीं। आत्मा तो नित्य मुक्त है। जीव को ईश्वर मानो या अंश किंतु वह आत्मा से भिन्न है। सुख और दुख का अनुभव मन को होता है आत्मा को नहीं फिर भी आत्मा पर उसका आरोप किया जाता है। परीक्षित को मात्र सात ही दिनों में मुक्ति प्राप्त करानी है। यदि उसका मन श्री कृष्ण के सिवाय अन्य किसी भी वस्तु से ना लगे तो उसे मुक्ति मिलने की संभावना है। मुक्ति उसे मिलती है जिसका मन करता है। पूर्व जन्म का शरीर चाहे मर गया तो किंतु पूर्व जन्म का मन लेकर जीवात्मा इस जन्म में आई है। मन को किसी भी प्रकार मारना ही है। थोड़े से पानी में मछली ना तो बराबर जी सकती है और ना मर सकती है। मन यदि सांसारिक विषयों का चिंतन छोड़ दे तो वह ईश्वर में लीन हो सकता है। कृष्ण कथा का आकर्षण मन को ईश्वर में लीन कर सकता है। मन को संसार के विषयों की ओर से हटाकर कृष्ण लीला में लगा दो। कृष्ण की बाल लीला, गोपालन लीला आदि को याद करो। मन को प्रतिकूल बातों में से हटाकर अनुकूल विषयों से जोड़ दो। इस कथा का हेतु भी तो यही है। इस कथा से ज्ञान और वैराग्य बढ़ते हैं। इस कथा के श्रवण मनुष्य को प्रवृत्ति। से छुटकारा पाने का मन हो जाता है। भागवत की कथा ज्ञान, वैराग्य और कृष्ण प्रेम बढ़ाने वाली है। भागवत की कथा श्रोता को कृष्ण प्रेम में पागल बना देती है। परीक्षित राजा का संसारमोह नष्ट हो सके और कृष्ण लीला में तन्मय हो जाए तभी उसके मन का निरोध हो सकता है। श्री कृष्ण लीला निरोधलीला है। मन का विरोध करना है। जगत का विस्मरण और भागवत आसक्ति ही निरोध है। सांसारिक विषयों का विस्मरण होने पर ही सच्चा आनंद प्रकट होता है। सांसारिक संबंध छूटने पर ही ब्रह्म संबंध जुड़ता है। यदि सांसारिक विषयों में आनंद होता तो यह सब कुछ छोड़ कर निद्रा की इच्छा ही नहीं होती। कृष्णकथा ऐसी है कि जगत को भुला देती है। जगत में रहना भी है और उसे भुलाना भी है। संसार को छोड़कर कहां जाओगे। जहां भी जाओगे संसार साथ साथ आएगा। संसार को छोड़ना तो नहीं है किंतु उसे मन से निकाल बाहर करना है। संसार से रहते हुए ही उससे अलग भी रहना है। भागवती कथा भूख प्यास और सांसारिक झंझटों को भुला देती है। दशम स्कंध के आरंभ में शुकदेव जी ने राजा की कसौटी की। 5 दिनों से एक आसन बैठे हो। यदि कुछ जलपान करना हो, खाना पीना हो तो कर सकते हो। परीक्षित ने कहा भगवान अन्न तो क्या मैंने तो जल का भी त्याग किया है। जिस भूख और प्यास के कारण कभी मैंने मुनि को मृत सर्प का हार पहनाया था वही भूख प्यास मुझे अब बिल्कुल सता नहीं पाते इसका कारण यही है कि मैं आपके मुख कमल से बह रहे श्री हरि कथा अमृत का पान कर रहा हूं। कथा का रसपान के कारण मुझे भूख और प्यास सता नहीं सकते। राजा के वचन सुनकर शुकदेव जी को बड़ी प्रसन्नता हुई। राजा सुपात्र है और जिज्ञासु भी है। कथा में ऐसी ही तन्मयता होनी चाहिए। कृष्ण कथा अनायास ही संसार को भुला देती है। इससे जगत भूल जाता है। कृष्ण की कथा जगत का भी विस्मरण कराती है। कृष्ण कथा की यही महिमा है कि वह देह भास भुला देती है। कृष्ण कथा महिमावती है। इस कथा में लीन मन जगत को भूल जाता है। संसार का संपूर्ण विस्मरण और परमात्मा का सतत स्मरण हो तो मुक्ति है। कथा तुम्हें अपने दोषों का मान कराती है। कथा सुनने पर रोना आए तभी मानो की कथा सुनी गई है। अंबरीश की भक्ति कैसी दिव्य थी और मेरा जीवन कैसा क्षुद्र है। हाय मेरा जीवन कुत्तों की भांति व्यर्थ ही चला गया। कृष्ण कथा सभी को आनंद देती है क्योंकि इसमें सभी रसों का समन्वय है। यह कथा बालक को भी आनंद देती है और सन्यासी को भी। श्री कृष्ण बालक के साथ बालक हैं और युवा के साथ युवा। ज्ञानी के लिए ज्ञानी है और योगी के लिए योगी। श्री कृष्ण भोगी तो हैं फिर भी रोगी नहीं योगी ही हैं। सामान्यतः भोगी बन जाता है। किंतु एकादश स्कंध के अनुसार श्री कृष्ण 125 वर्ष की आयु पूर्ण करके स्वर्ग में पधारे तब उनका एक भी शिरकेश श्वेत नहीं हुआ था। मनुष्य का मन किसी न किसी रस में फंसा हुआ होता है। इस कथा में हास्य, श्रंगार, करूण, भयानक आदि सभी रस भरे हुए हैं क्योंकि श्री कृष्ण स्वयं ही रस रूप हैं। बाल लीला में हास्य रस है, रासलीला में श्रृंगार रस है। चाणुर, मुष्टिक, कंस आदि की हत्या में वीर रस है। चाहे जिस रस में रुचि हो कृष्ण कथा सभी को पसंद आती है। यही विशेषता है इस कथा की। कन्हैया सभी को दसवां रस देता है- प्रेम रस। इस कृष्ण कथा में सर्वश्रेष्ठ रस प्रेमरस छलाछल भरा हुआ है। जिसने प्रेम रस का आस्वाद किया है उसके लिए अन्य सभी अ-रस ही हैं। मीराबाई के शब्दों में कहें तो अन्य सभी रस कड़ुए हैं अर्थात कृष्ण प्रेम शक्कर और ईख का मीठा रस है उसे छोड़कर कड़ुए नीम का (सांसारिक) रस क्यों पिया जाए। राधा कृष्ण के बिना और क्या और क्यों मीठा बोला जाए। इस संसार का आस्वाद शंकर, शुकदेव, जोगी और व्रज की गोपी जैसे ही कर पाते हैं। जगत के सभी कटुत से भरे हुए हैं। श्रृंगाररस आरंभ में मीठा लगता है किंतु अंत में तो कड़ुवा ही लगेगा। अन्य किसी भी रस में मिठास नहीं है मात्र प्रेम रस ही मधुर है। प्रेम के बिना प्रभु का साक्षात्कार नहीं हो पाता श्री कृष्ण प्रेम रूप हैं। वे अलौकिक प्रेम रस का दान करते हैं। प्रेम रस में ना तो वासना है ना तो विषमता है ना तो स्वार्थ है और ना तो मैं और तू है। गोपी कृष्ण को ढूंढने गई तो उसका अपनापन नहीं रहा वह कृष्ण से एक रूप हो गई। श्री कृष्ण के समक्ष मैं और मेरा पन बाकी नहीं रह सकता। मानव जीवन की यही विशेषता और सार्थकता है कि वह कृष्ण प्रेम में पागल हो जाए, प्रतिदिन ठाकुर जी से प्रार्थना करो आप मेरे मन को अपनी ओर खींच लीजिए मुझ में ऐसी शक्ति नहीं है कि मैं आपको खींच सकूं। अतः आप ही मुझे खींच लीजिए। कृष्ण प्रेम में ह्रदय लीन हो जाए, सराबोर हो जाए, आंखें प्रेम अश्रु से भीग जाए तभी ब्रह्म संबंध होगा, तभी जीव ब्रह्म रूप होगा। ब्रह्म संबंध सतत बनाए रखो। सावधान रहना कि कहीं फिर से माया के चक्कर में मन फंस न जाए। यदि परीक्षित की भांति माया के साथ विच्छेद और ब्रह्म के साथ संबंध हो जाए तो सात ही दिनों में मुक्ति प्राप्त हो सकती है। ब्रह्म चिंतन करते करते मर जाने से मुक्ति मिल जाती है। दशम स्कंध तो भगवान श्री कृष्ण का हृदय है। वे रस स्वरूप हैं अतः जीव भी रस स्वरूप है। प्रत्येक जीव को किसी न किसी रस में रूचि होती है। भिन्न रूचि वाले सभी लोगों को यह कृष्ण कथा आनंद देती है। श्री कृष्ण भी एक दिव्य रस ही हैं। प्रेम और विरह दोनों में ह्रदय आर्द्र बनता है तब रस की अनुभूति होती है। श्री कृष्ण कथा सभी प्रकार की जीवों को आकर्षित करती है। सामान्यतः जीव के चार भेद हैं- पामर, विषयी, मुमुक्षु और मुक्त। अधर्म से धन का अर्जन करें और अनीति पूर्वक उपभोग करें वह जीव पामर जीव है। धर्म का पालन करके कमाई करके इंद्रिय सुख का उपभोग करें वह जीव विषयी जीव है। सांसारिक बंधनों से मुक्ति पाने की इच्छा और प्रयत्न करने वाला जीव मुमुक्षु जीव है। कनक और कांतारूपी माया के बंधनों से मुक्त होकर प्रभु में तन्मय हुआ जीव मुक्त जीव है। श्री महाप्रभुजी कहते हैं राजस, तमस और सात्विक किसी भी प्रकृति का जीव कृष्ण कथा में से आनंद पा सकता है। इसी कारण से तो उन्होंने दशम स्कंध के तीन भाग किए हैं- सात्विक प्रकरण, राजसिक प्रकरण और तामसिक  प्रकरण। श्री कृष्ण कथा सभी के लिए उपयोगी और सभी को आनंद देने वाली हैष इसका कारण यह है कि श्री कृष्ण भोगी भीं हैं और महान योगी भी। इसीलिए तो शुकदेव जी जैसे योगी को भी इस कथा से आनंद लाभ होता है। राजा परीक्षित ने कहा आपने सूर्यवंश और चंद्रवंश की कथा सुनाइ। चंद्रवंशी श्री कृष्ण की कथा संक्षेप में ही बताई। कृष्ण कथा योगी और भोगी दोनों को आनंद देती है। शुकदेव जी तो महायोगी हैं। ध्यान की आत्यंतिकता के कारण वस्त्र भान भी नहीं रहा है। वे कृष्ण कथा में पागल हो गए हैं। परीक्षित कहते हैं आपने वैसे तो सर्वस्व का त्याग किया है किंतु कृष्ण कथा का त्याग नहीं कर सके। आप ने अपने पिता से भी कह दिया था कि ना तो आप उनके पुत्र हैं और ना तो वह आपके पिता। आपने पिता का त्याग तो किया किंतु कृष्ण कथा का नहीं। आपके लिए भी यह कथा आनंददायिनी है। शुकदेव जी जैसे वितरागी साधु पुरुष श्री कृष्ण कथा का मोह छोड़ नहीं पाए। महापुरुषों को लगता है कि जब तक नाक पकड़ कर बैठे हैं अर्थात तप कर रहे हैं तब तक तो ठीक है किंतु आसन से उठ जाने पर कब मन भागने लगता है उसकी खबर तक नहीं हो पाती। मन को निर्विषयी बनाओ। उसे कृष्ण लीला में परोए रखो। चिंतन करना है तो कृष्ण लीला का चिंतन करो। मन को निर्विषयी बनाने का आदेश वेदांत भी देता है। यह बड़ा कठिन काम है। इसीलिए तो वैष्णव कहते हैं कि मन को प्रतिकूल विषयों से हटाकर अनुकूल विषयों में जोड़ दो। वेदांती कहते हैं कि जब आत्मा को बंधन ही नहीं है तो फिर मुक्ति का प्रश्न ही कैसे उपस्थित हो सकता है। वैष्णवों को भगवान की सेवा में ऐसा आनंद मिलता कि मुक्ति की वे इच्छा ही नहीं करते हैं। योगी जब तक आंखें मूंदकर समाधि में बैठे रहते हैं तब तक उनका मन स्थिर करता है किंतु योगा वस्था में जागृत होने पर आंखे खुलते ही उनका मन चंचल होकर सांसारिक विषयों में खो जाता है। ऋषि विश्वामित्र ने आंखें मूंद कर साठ हजार वर्ष तपस्या की किंतु आंखें खुलते ही वे मेनका की माया में फंस गए। अजी खुली आंखों और खुले कानों से भी समाधि लगे वही समाधि सच्ची समाधि है। साधो सहज समाधि भली। समाधि के दो प्रकार हैं- जड़ और चेतन। जड़ समाधि वह है जिसमें योगी मन को वश में रखने का प्रयत्न करते हैं। मन पर ऐसा बलात्कार करना कोई अच्छी बात नहीं है। वैसे योगी कभी रोगी भी बन जाते हैं इसी कारण तो हठयोग की निंदा की गई है। हठ योगी को भक्ति का सहारा ना मिल पाए तो उसका योग निरर्थक है। मन पर बलात्कार करने की अपेक्षा उसे प्रेम से समझा बुझाकर वश में करना अच्छा है। मन सज्जन है। मन को कोई सत्ता नहीं होती। मन आत्मा की आज्ञा में है। आत्मा के आदेशानुसार मन को कार्य करना पड़ता है। मन को शास्त्र में नपुंसक कहा गया है। आत्मा की सत्ता और आज्ञा अनुसार ही मन दौड़ सकता है। योगी मन को बलपूर्वक ब्रह्म रंध्र में स्थापित करते हैं। उस समय उनका शरीर जड़ होता है। जड़ समाधि में शरीर की समानता नहीं रह जाती। जड़े समाधि की तुलना में चेतना समाधि श्रेष्ठ है। गोपियों की समाधि चेतन समाधि है। वे कान बंद करके अंख मूंद के नहीं बैठती। वे तो खुले कान और खुली आंखों के श्रीकृष्ण के ध्यान में तन्मय हो जाती हैं। वे तो अपने कानों और आंखों में श्रीकृष्ण को ही बसाती हैं। इन्हें देखकर तो उद्धव ऊधो (उल्टा) सीधा सरल बन गए थे। ये गोपियां खुली आंखों में भी समाधि लगा सकती हैं, जहां जहां उनकी दृष्टि जाती है वहां वहां उन्हें कृष्ण ही दर्शन होते हैं। समाधि ऐसी साहजिक ही होनी चाहिए इसीलिए तो उद्धव जी की निर्गुण निराकार ब्रह्म की आराधना की बात सुनकर गोपियों ने कहा था हम तो खुले आंखों ही सर्वत्र साकार ब्रह्म श्रीकृष्ण का दर्शन करती हैं। अतः साकार ब्रह्म को छोड़कर तुम्हारे निराकार ईश्वर का ध्यान चिंता क्यों करें। उद्धव जी, जो खुली आंखों से ब्रह्म का दर्शन नहीं पा सकता वही अपनी आंखों को मूंद कर ललाट में ब्रह्म के दर्शन करने का प्रयत्न करता है। हम तो श्री कृष्ण के दर्शन, चिंतन और ध्यान करती हैं। आंखें बंद करने के बाद भी जो समाधिस्थ हो सकता है उसके लिए संभव है कि आंख खुलने के बाद उसका मन संसार में भटक जाए। गोपियां ग्रहस्थ होने पर भी महा परमहंस है। बृजवासी ही उत्तमोत्तम परमहंस हैं जो सभी बाह्य विषयों से अलिप्त होकर कृष्ण प्रेम में तन्मय हो जाते हैं। श्री कृष्ण महा गृहस्थ भी है और महा सन्यासी भी। घर में रहते हुए भी संन्यासी जीवन कैसा किया जा सकता है यह श्री कृष्ण ने बताया है। वे 13 बार भोजन करते हैं और 16000 स्त्रियों के स्वामी हैं फिर भी वे अच्युत, युवान हैं। वे कभी वृद्ध नहीं होते, जीर्ण नहीं होते। वे अर्जुन और दुर्योधन दोनों को समान दृष्टि से देखते थे और उन्होंने दोनों की सहायता की थी। यदुवंश और सुवर्ण द्वारिका का विनाश हो गया फिर भी उनकी मनोशांति अविचल रही। भागवत परमहंसों की संहिता है। परिक्षित कहते हैं- महाराज आप वितरागी योगी है फिर भी कृष्ण कथा नहीं छोड़ पाए। कथा मनुष्य की थकावट दूर करती है। भगवान की कथा आतुरता बढ़ाती है। बार बार सुनने पर भी तृप्ति नहीं होती। श्रीखंड जैसे मिष्ठान का आहार करने पर विषय सुखों का उपभोग कर लेने पर तृप्ति होती है और अरूचि भी। किंतु वह तृप्ति और अरूचि कायम नहीं रह पाती। यदि कायम रहे तो बेड़ा पार हो जाए। महाराज मुझे कृष्ण कथा सुनने की इच्छा है। विस्तारपूर्वक आप सुनाइए। प्रभु की बाल लीला और अन्य सभी लीला मुझे सुनाइए। आपके चरणों में बार-बार प्रणाम करके मैं प्रार्थना करता हूं। शुकदेव जी- राजन कई दिनों से आपने कुछ खाया पिया नहीं पहले कुछ जल पान कर लीजिए फिर कथा सुनेंगे। परीक्षि-त कुछ दिन पहले तो मैं भूख और प्यास के मारे व्याकुल हो जाता था। एक बार शिकार करने वन में गया था तो भूख प्यास की व्याकुलता के कारण ही मैंने ऋषि का अपमान तक कर दिया था किंतु आपसे कथा सुनने के बाद ना तो मुझे भूख सताती है और ना प्यास बस आप कथा ही सुनाते रहिए। शुकदेव जी- कृष्ण कथा के लिए तेरा प्रेम व्यवहार देख कर मुझे बड़ा आनंद हुआ, राजा तेरे ही कारण मुझे भी कृष्ण कथा गंगा का अमृत पान करने का लाभ मिला। जब से कृष्ण कथा रूपी गंगा का स्नान प्राकट्य हुआ है तब से भागीरथी गंगा का महत्व कम हो गया है। भागीरथी गंगा में स्नान करने से शारीरिक मलिनता तो दूर होती है किंतु मानसिक मलीनता तों कृष्ण कथा ही दूर कर सकती है। कृष्ण कथा तो जहां चाहो वहां प्रकट हो सकती है। किंतु वह भागीरथी गंगा अन्य किसी स्थान पर प्रकट होती नहीं है। शुकदेव जी राजा का आभार मानते हैं कि उसके कारण कृष्ण स्मरण और दर्शन का लाभ मिला। महात्मा तो कहते हैं कि नवम स्कंध तक की कथा शुकदेव जी ने सुनाई और दसम स्कंध की कथा स्वयं श्री कृष्ण ने सुनाई है। शुकदेव जी ने राधा कृष्ण से प्रार्थना की कि ह्रदय में विराजमान होकर वे ही कथा करें। ज्ञानी पुरूष मृत्यु को टालने का नहीं सुधारने का प्रयत्न करते हैं। मृत्यु को सुधारते हैं- कृष्ण कथा, कृष्णनाम, कृष्ण भक्ति। जिसकी मृत्यु सुधरती है उसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता। वेर और वासना जीवन को बिगड़ते हैं। उनके दूर होने पर ही जीवन और मृत्यु उजागर होते हैं। वेर और वासना को मृत्यु के पहले ही हटा दो अन्यथा मृत्यु बिगड़ जाएगी। तुम वेरी को बंदन करो फिर भी वेर बनाए रहे तो उसके पाप का साझीदार तुम्हें बनना नहीं पड़ेगा। दशम स्कंध में निरोध लीला है। ईश्वर में मन को लय करना ही निरोध है। श्री कृष्ण को अपने ह्रदय में रखोगे या श्री कृष्ण के हृदय में बसोगे तो मन का निरोध होगा। मन का निरोध ही मुक्ति है। धरती पर दांतों का उपद्रव बढ़ गया, लोग दुखी हो गए, पाप बढ़ गया। धरती से यह सब सहा ना गया तो उसने ब्रह्मा जी की शरण ली। ब्रह्मादि देव नारायण के पास आए और पुरुष सूक्त से प्रार्थना करने लगे- नाथ अब तो आप कृपा कीजिए। आप अवतार लीजिए। भगवान ने ब्रह्मा जी से कहा कुछ ही समय में मैं वसुदेव देवकी के घर प्रकट होऊंगा। मेरी सेवा के लिए तुम सब भी अवतार लेना। ब्रह्मा ने आकाशवाणी सुनी और सभी देवों को आश्वस्त किया। इधर मथुरा में विवाह करने के लिए वसुदेव आए। वसुदेव देवकी का विवाह हुआ स्वयं कंस ने ही वर वधु का रथ चलाया। कंस वसुदेव को बहुत सताए तो भगवान का प्राकट्य शीघ्र हो जाए। भक्तों के दुख भगवान से सहे नहीं जाते। पापी का दुख तो भगवान साक्षी के रूप में देख लेते हैं और सह लेते हैं किंतु पुण्यशाली का दुख उनसे सहा नहीं जाता। आकाशवाणी सुनाई दी- हे कंस देवकी की आठवीं संतान तेरी हत्या करेगी। कंस ने आकाशवाणी सुनी तो वह तलवार लेकर देवकी की हत्या करने के लिए तैयार हो गया तो वसुदेव उसे समझाने लगे जो आया है वह जाएगा, जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी होगी इसलिए तो महात्मा जन मृत्यु को टालने का नहीं सुधारने का प्रयास करते हैं। मृत्यु का निवारण अशक्य है। शरीर का नाश तो होगाह ही। वेर न करो। वेर या सुख की कामना मृत्यु भ्रष्ट करती है। वेर वासना का त्याग करके प्रभुस्मरण करता हुआ जो मरता है उसी की मृत्यु उजागर होती है। देवकी की हत्या करने से तुम अमर तो नहीं हो सकते और देवकी तो तुम्हारी मृत्यु का कारण भी नहीं है। कंस- हां यह तो है। वसुदे- तो मैं देवकी की सभी संतान तुम्हारे हवाले करता रहूंगा। कंस ने भी सोचा कि यह भी ठीक है। स्त्री हत्या के पाप से तो बच जाऊंगा। उसने कहा- अच्छा, मैं देवकी की हत्या नहीं करूंगा। वसुदेव शुद्ध सत्व गुण का स्वरूप है। विशुद्ध चित्त ही वसुदेव है। देव की निष्काम बुद्धि है इन दोनों के मिलन होने पर भगवान का जन्म होता है। वसुदेव देवकी के घर आए। प्रथम बालक का जन्म हुआ। वसुदेव ने उसको कंस को दे दिया। कंस का ह्रदय पिघला। इस बालक को मारने से मुझे कोई लाभ नहीं होगा। आठवां बालक मुझे मारेगा। यह तो पहला है। सातों बालकों को अपने पास ही रखना। मेरा काल होने वाला आठवां बालक ही मुझे देना। वसुदेव जी बालक को लेकर वापस लौटे। नारद जी ने सोचा कि यदि यह कंस अच्छाई करने लगेगा तो पाप कैसे कर पाएगा। और यह पाप नहीं करेगा तो भगवान अवतार नहीं लेगें। केस का पाप नहीं बढ़ेगा तो वह शीघ्र मरेगा भी नहीं। पाप न करने वाले को भगवान् जल्दी मारते नहीं हैं। ईश्वर तो किसी को नहीं मारते हैं। हमेशा दो वस्तुओं से डरते रहो- पाप से और ईश्वर से। नारद जी केस के पास आए और कहा तू तो बहुत भोला है कंस। देव तुम्हें मारने की सोच रहे हैं। वासुदेव के बालक को छोड़कर तुमने अच्छा नहीं किया। कोई भी बालक आठवां हो सकता है। यदि आंठवें बालक को पहला माना जाय तो वह पहला बालक आठवां माना जाएगा। कंस- तो क्या मैं सभी बालकों की हत्या करता रहूं। नारद जी ने सोचा कि यदि मैं संमति दूंगा तो मुझे भी बाल हत्या का पाप लग ही जाएगा। दूसरों को प्रेरणा देने वाला भी पापी है। नारद जी- राजन मैं तुम्हें सावधान करने के लिए आया हूं, तुम्हें जो ठीक लगे वह करते रहना और वे नारायण नारायण बोलते हुए चले गए। नारद जी ने कंस के पाप को बढ़ाने के हेतु ही उसे उल्टा सीधा पढ़ा दिया। कंस ने वसुदेव देवकी को कारागार में बंद कर दिया। बिना अपराध ही बंधन में बंध गए फिर भी उन्होंने मान लिया कि शायद ईश्वर को वही पसंद है। यह तो भगवान की कृपा ही है कि उनका नाम स्मरण करने के लिए एकांतवास मिला है। अतिशय दुख को भी प्रभु की कृपा ही समझनी चाहिए। कंस अभिमान है। वह जीव मात्र को बंद किए रहता है। सभी जीव इस संसार रूपी कारागृह में बंद हैं। हम सब बंदी हैं। जीव जब तक काम के आधीन है तब तक वह स्वतंत्र नहीं है। सभी बंदीवान ही है। वसुदेव- देवकी कारावास में भी जागृत थे जबकि हम तो सोए ही रहते हैं। हमारा जीव कारागृह के एकांत में जागृत होने की अपेक्षा सोया ही रहता है। संसार में जो जागृत रहता है वही भगवान को पा सकता है। जो भगवान के लिए जागता है उसे ही भगवान मिलते हैं। कंस ने देवकी के 6 संतानों की हत्या कर दी। माया का आश्रय लिए बिना भागवत भगवान अवतार नहीं ले सकते। शुद्ध ब्रह्म का अवतार हो नहीं सकता। यदि ईश्वर शुद्ध रूप से आए और जो भी उनका दर्शन पा सके उसका उद्धार हो जाए। दुर्योधन ने द्वारकाधीश के दर्शन किए थे किंतु माया से आवृत्त होकर प्रभु के दर्शन किए थे। जो निरावृत्त ब्रह्म का साक्षात्कार पाता है उसे मुक्ति मिलती है। मायावृत्त ब्रह्म के दर्शन की मुक्ति नहीं होती। संभव है भगवान् के अवतार के समय हम कीड़े मकोड़े होंगे। हमने भगवान के दर्शन किए तो होंगे फिर भी आज तक हमारा उद्धार नहीं हो पाया है। योगमाया का आगमन हुआ। उन्होंने सातवें गर्भ की रोहिणी के उदर में स्थापना की। रोहिणी सगर्भा हुई और दाऊजी महाराज प्रकट हुए। भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन। बलदेव शब्द ब्रह्म का स्वरूप है। पहले शब्द ब्रह्म आता है और बाद में परब्रह्म। बलराम का आगमन होने पर ही परब्रह्म गोकुल में आते हैं।

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