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Gita rahasya तृतीय स्कंध

Gita rahasya तृतीय स्कंध

आत्मा को यह शरीर बंधन में रखता है। शरीर जड़ है, आत्मा चेतन है किंतु जड़ चेतन की यह ग्रंथि असत्य है गलत है क्योंकि चेतन को जड़ वस्तु किस प्रकार बांध सकती है। यह ग्रंथि असत्य होने पर भी जिस तरह स्वप्न हमें रुलाते हैं वैसे ही यह भी हमें रुलाती है। तात्विक दृष्टि से देखें तो हम यह नहीं कह सकते कि जड़ शरीर चेतन आत्मा को बांधकर रख सकता है। चेतन आत्मा को जड़ शरीर बंधन में नहीं रख सकता। आत्मा शरीर से भिन्न है यह बात सभी जानते हैं किंतु इसका अनुभव बहुत कम लोग कर पाते हैं। शुकदेव जी कहते हैं हे राजन तुम जो प्रश्न करते हो वैसे ही प्रश्न विदुर जी ने मैत्रीय जी से पूछे थे। यह विदुर जी ऐसे हैं कि आमंत्रण के बिना भी भगवान उनके घर गए थे। परीक्षित ने कहा कि विदुर जी और मैत्रेय जी का मिलन कब हुआ वह मुझे बताइए। शुकदेव जी कहते हैं कि आमंत्रण पाए बिना ही भगवान विष्णु जी के घर गए थे उस प्रसंग की बात पहले बता दूं। धृतराष्ट्र ने पांडवों को लाक्षाग्रह में जला देने का प्रयत्न किया था। विदुर जी ने धृतराष्ट्र को उपदेश दिया किंतु उसका धृतराष्ट्र पर कुछ असर नहीं हुआ। विदुर ने सोचा कि धृतराष्ट्र दुष्ट है। उसक कुसंग से मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी फिर भी उन्होंने उसको कई बार उपदेश दिया किंतु धृतराष्ट्र ने एक भी नहीं सुनी तो विदुर जी ने उसके घर को ही छोड़ दिया। विदुर जी अपनी पत्नी सुलभा के साथ समृद्ध घर का त्याग करके वन में चले गए। वनवास के बिना जीवन में सुवास नहीं आ सकता इसलिए तो पांडवों ने और भगवान रामचंद्र जी ने वनवास किया था। विदुर जी तो पहले से ही तपस्वी सा जीवन बिताते थे और भगवान का कीर्तन करते थे इसलिए दुर्योधन के छप्पन भोगों को छोड़कर श्री कृष्ण ने विदुर जी के घर भाजी का प्रासन किया। विदुर और सुलभा वन में नदी के किनारे कुटिया बांधकर रहने लगे और तपस्या करने लगे। हर रोज 3 घंटे कृष्ण कथा, 3 घंटे कृष्ण सेवा, 3 घंटे प्रभु का ध्यान, 3 घंटे प्रभु का कीर्तन और 3 घंटे प्रभु की सेवा करने लगे। 12 वर्ष तक वे इस प्रकार भगवान की आराधना करते रहे। मन को सतत सत्कर्म में लगाए रखो। मन निठल्ला होकर पाप करेगा। भगवान का वे कीर्तन करते थे और भूख लगने पर भाजी खाते थे, भोजन करना पाप नहीं है भोजन में ही खो जाना और भोजन करते समय भगवान को भूल जाना पाप है। कई लोग कढ़ी खाते-खाते उसी में खो जाते हैं और अगले दिन माला फेरते हुए भी कढ़ी को याद करते हैं। मन में सोचते हैं कि कल की कढ़ी कितनी स्वादिष्ट थी। विदुर जी ने सुना कि द्वारिकानाथ संधि कराने के लिए हस्तिनापुर आ रहे हैं। धृतराष्ट्र ने सेवकों को आज्ञा दी कि कृष्ण के स्वागत की तैयारी करो, छप्पन भोग लगाओ। धृतराष्ट्र यह सेवा कुभाव से करते हैं। सेवा सदा सद्भाव से करनी चाहिए। कुभाव से सेवा करने वाले पर भगवान प्रसन्न नहीं होते जो सद्भाव से सेवा करते हैं उसकी सेवा से वे प्रसन्न होते हैं। विदुर जी गंगा स्नान करने गए थे वहां उन्होंने सुना कि कल तो रथ यात्रा निकलेगी पूछने पर लोगों ने बताया कि द्वारिका से भगवान श्रीकृष्ण आ रहे हैं। विदुर जी घर लौटे। वे बड़े ही आनंद में मग्न दिख रहे थे। उनकी पत्नी ने पूछा क्या बात है कि आज आप बड़े खुश दिखाई दे रहे हैं। विदुर जी ने कहा सत्संग में सारी बात कहूंगा। मैंने कथा में सुना था कि जो 12 वर्षों तक सतत सत्कर्म करें उस पर भगवान कृपा करते हैं। 12 वर्ष एक ही स्थान में रहकर ध्यान करने वालों को प्रभु दर्शन देते हैं। मुझे लगता है कि द्वारिकानाथ दुर्योधन के लिए नहीं किंतु मेरे लिए ही आ रहे हैं। सुलभा ने कहा कि मुझे स्वप्न में रथयात्रा के दर्शन हुए थे वह सपना सच होगा। 12 वर्षों से मैंने कभी अन्न नहीं खाया। विदुर जी कहते हैं कि देवी तुम्हारी तपस्या का फल कल मिलेगा, कल परमात्मा के दर्शन होंगे। सुलभादेवी ने विदुर जी से पूछा कि आपका प्रभु के साथ कोई परिचय भी है, विदुर जी ने कहा कि जब मैं कृष्ण को वंदन करता हूं तो वह मुझे चाचा कह कर पुकारते हैं। मैं तो उनसे कहता हूं कि मैं अधम हूं, आपका दासानुदास हूं मुझे चाचा मत कहो। जीव जब नम्न होकर प्रभु की शरण में जाता है तो ईश्वर उसका सम्मान करते हैं। सुलभा के मन में एक ही भावना है कि ठाकुर जी मेरे घर पर भोजन करें और मैं उन्हें प्रत्यक्ष निहारू। सुलभा कहती हैं कि वे आपके परिचित हैं तो हमारे घर पधारने का न्योता दीजिए मैं भावना से तो रोज भगवान को भोग लगाती हूं अब मेरी यही इच्छा है कि वे मेरी दृष्टि के समक्ष प्रत्यक्ष रुप से भोजन करें। विदुर जी कहते हैं कि मेरे आमंत्रण को वे अस्वीकार नहीं करेंगे किंतु एक छोटी सी झोपड़ी में हम उनका आदर सत्कार कैसे करेंगे। उनके आगमन से हमें आनंद होगा किंतु उन को कष्ट होगा। मेरे भगवान 56 भोगों का प्राशन करते हैं। धृतराष्ट्र के घर उनका भली-भांति स्वागत होगा मेरे पास तो भाजी के सिवा कुछ नहीं है। मैं उन्हें क्या अर्पण करूंगा। हमारे यहां आने से ठाकुर जी को परिश्रम होगा अपने सुख के लिए मैं भगवान को जरा भी कष्ट देना चाहता। यही पुष्टि भक्ति है। सुलभा ने कहा कि मेरे घर में चाहे दूसरी कुछ भी चीज भले ही ना हो किंतु मेरे हृदय में प्रभु के लिए अपार प्रेम तो है ही। वह प्रेम ही मैं भगवान के चरणों में समर्पित कर दूंगी हम जो भाजी खाते हैं वही मैं ठाकुर जी को प्रेम से खिलाऊंगी। जीभ के सुधरने पर जीवन भी सुधरता है और जीभ के बिगड़ने पर जीवन भी बिगड़ जाता है। सीधा-साधा भोजन करने से जीवन शुद्ध होता है। यदि आहार सादगी पूर्ण होगा तो शरीर में सात्विक गुण की वृद्धि होगी। सत्व गुण के बढ़ने से सहन शक्ति भी बढ़ती है और अंत में बुद्धि स्थिर होती है। अतः विदुर जी की भांति अतिशय सादगी भरा जीवन जियो। जिसका जीवन सीधा-साधा है वह अवश्य साधु बनेगा। सुलभा ने कहा मैं गरीब हूं तो क्या हुआ गरीब होना कोई अपराध है क्या। आपने कथा में कई बार कहा है कि प्रभु प्यार के भूखे हैं, भगवान गरीबों से अधिक प्यार करते हैं। विदुर जी ने कहा भगवान राज प्रसाद में जाएंगे तो वहां सुख से रहेंगे मेरे घर में उनको कष्ट होगा इसलिए मैं भगवान को यहां लाना नहीं चाहता, देवी हमारे अंदर कुछ पाप अभी बाकी है मैं तुम्हें कल कृष्ण के दर्शन कराने के लिए ले जाऊंगा किंतु ठाकुर जी अपने घर आए ऐसी आशा अभी मत कर। बाद में वे कभी हमारे यहां आएंगे अवश्य पर कल नहीं। वैष्णव इस आशा के सहारे ही जीता है कि मेरे प्रभु आज नहीं तो 5-10 वर्षों के बाद कभी तो आएंगे ही और नहीं तो कम से कम मेरे जीवन के अंत काल में तो आएंगे ही। सुलभा सोचती है कि पति संकोचवश आमंत्रण नहीं दे रहे हैं किंतु मैं तो मन से आमंत्रित करूंगी अगले दिन विदुर और सुलभा बालकृष्ण की सेवा करते हैं। बाल कृष्ण स्मित कर रहे हैं। विदुर और सुलभा भगवान की प्रार्थना करते हैं। रथ यात्रा के समय मार्ग में इकट्ठे हुए ब्राह्मण बंधुओं के द्वारा की गई स्तुति को सुनकर हर कदम के साथ जो द्रवित हो रहे हैं वे दया के सागर, अखिल ब्रम्हांड के बंधु और समुद्र पर कृपा करने के हेतु उसके तट पर निवास करने वाले श्री जगन्नाथ स्वामी सदा मेरे नेत्रों के सम्मुख रहे। हमेशा रथारूढड द्वारिका नाथ के दर्शन करो।

भगवान रथ में बैठकर जा रहे हैं। जब तक जीव शुद्ध नहीं होता तब तक परमात्मा उससे आंख नहीं मिलाते और जब तक चार आंखे एक ना हो तब तक दर्शन में आनंद नहीं मिलता। विदुर और सुलभा रथ देख रहे हैं। विदुर जी सोचते हैं कि मेरी ऐसी दो पात्रता नहीं है कि भगवान मेरे घर आए किंतु क्या वे एक नजर मुझे देखेंगे तक नहीं, मैं पापी हूं कितू मेरे भगवान तो पापी के उद्धारक हैं, पतित पावन है, उनके लिए मैंने सभी विषयों का त्याग कर दिया है। नाथ आपके लिए मैंने क्या-क्या ना सहा, 12 वर्षों से मैंने अन्न नहीं खाया। क्या भगवान मेरी और एक दृष्टि भी नहीं करेंगे। कृपा कीजिए। हजारों जन्मों से मैं आपसे जुदा रहा हूं पर आज आपकी शरण में आया हूं। लोगों की भीड़ से रथ आगे बढ़ रहा था प्रभु की आंखें तो नीचे की ओर देख रही थी। विदुर जी सुलभा ने दर्शन किया। श्रीकृष्ण ने विदुर चाचा को देखा। विदुर कृतार्थ हो गए कि चलो मेरी और भी भगवान ने दृष्टि की। भगवान का दिल भर आया दृष्टि प्रेम से आर्द्र हो गई। भगवान ने सोचा कि विदुर ना जाने कब से मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं सुलभा को लगा कि मेरे प्रभु मेरी ओर देखकर ही हंस रहे थे। मेरे प्रभु ने मेरी ओर देखा वह जानते हैं कि मैं विदुर की पत्नी हूं और इसलिए उन्होंने मुझ पर दृष्टिपात किया। प्रभु ने दृष्टि से ही विदुर जी से कहा कि मैं आपके घर आऊंगा किंतु अति आनंद में डूबे हुए सुलभ विदुर जी भगवान का संकेत समझ ना पाए। कृष्ण हस्तिनापुर गए। धृतराष्ट्र और दुर्योधन प्रभु के स्वागत के लिए 1 महीने से तैयारी कर रहे थे। प्रभु का आगमन हुआ। प्रभु ने धृतराष्ट्र दुर्योधन को बताया कि मैं द्वारिका में राजा की हैसियत से नहीं अपितु पांडवों का दूत बनकर आया हूं। पांडवों का नाम सुनते ही दुर्योधन ने भगवान का अपमान कर दिया। दुष्ट दुर्योधन भगवान का अपमान करते हुए कहता है कि भीख मांगने से राज्य नहीं मिलता सुई की नोक पर रखी जा सके उतनी भी मैं पांडवों को भूमि नहीं दूंगा। मैं युद्ध के लिए तैयार हूं। उसने श्रीकृष्ण की एक नहीं मानी। संधि कराने के प्रयत्न सफल ना हो सके। धृतराष्ट्र ने भगवान से कहा कि इन भाइयों के झगड़े से आप दूर ही रहें आपके लिए छप्पन भोग तैयार हैं, आराम से भोजन कीजिए। श्री कृष्ण ने कहा तुम्हारे घर का अन्न खाने से तो मेरी भी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी। पापी के घर का अन्न खाने से किसी की भी बुद्धि भ्रष्ट हो सकती है। 56 प्रकार की वस्तुएं भगवान के लिए तैयार की गई थी उन्होंने खाने से इंकार कर दिया अन्य राजाओं ने आशा की उनके घर कृष्ण भोजन करेंगे किंतु कृष्ण ने उनको और सभी ब्राह्मणों को भी निराश कर दिया। द्रोणाचार्य ने पूछा कि आप सभी के आमंत्रण से इनकार कर रहे हैं तो फिर कहां जाएंगे भोजन का समय हो गया है कहीं ना कहीं तो भोजन करना ही पड़ेगा। यदि दुर्योधन के यहां भोजन करने में आपको कोई एतराज है तो आप मेरे घर चलिए। भगवान ने उनसे भी इंकार कर दिया और कहा कि मैं तो मेरा एक भक्त जो गंगा किनारे पर रहता है उसी के घर जाऊंगा। द्रोणाचार्य समझ गए कि हम वेदशास्त्र संपन्न ब्राम्हण आज हार गए। धन्य है बिदुर जी। भगवान ने सोचा कि विदुर जी दीर्घकाल से मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं तो मैं आज उनके पास ही चला जाऊं। इस तरफ विदूर जी सोच रहे हैं कि मैं अभी तक अपात्र ही रह गया हूं अतः भगवान मेरे घर नहीं आते। आज सुलभा का ह्रदय भी बड़ी कातरता और आर्द्रता से सेवा कर रहा है। वह भगवान से प्रार्थना कर रही है कि मैंने आपके लिए सर्वस्व का त्याग कर दिया है फिर भी आप नहीं आ रहे हो। गोपियां सच कहती हैं कि कन्हैया के पीछे जो लग जाता है उसी को वह रूलाता है। आपके लिए मैंने संसार को छोड़ दिया सर्वस्व आपके चरणों में रख दिया। फिर भी मेरे घर आपका आगमन क्यों नहीं हो रहा है। कीर्तन भक्ति श्री कृष्ण को अति प्रिय है। सूरदास जी भजन करते हैं तो श्री कृष्णा आकर उनके हाथ में तंबूरा देते हैं। सूरदास कीर्तन करते हैं और कन्हैया सुनता है। भगवान नारद से कहते हैं कि ना तो मेरा बैकुंठ में वास है और ना तो योगियों के ह्रदय में। मैं तो वही पर रहता हूं जहां मेरा भक्तजन प्रेम से होकर मेरा कीर्तन करता है। झोपड़ी में विदुर सुलभा भगवान के नाम का कीर्तन कर रहे हैं किंतु वह नहीं जानते कि जिसका वे कीर्तन कर रहे हैं वह आज साक्षात उनके द्वार पर खड़ा है। मनुष्य का जीवन पवित्र होगा तो भगवान बिना आमंत्रण पाए भी उसके घर आएंगे। जो परमात्मा के लिए जीता है उसके घर परमात्मा स्वयं आते हैं। भगवान बिना बुलाए ही भगवान आज विदुर के द्वार पर आ गए हैं। बाहर प्रतीक्षा करते हुए 2 घंटे निकल गए कड़ी भूख लग रही थी भगवान सोच रहे थे कि उनका कीर्तन कब समाप्त होगा। विद्युत सुलभा का जीवन तो प्रभु के लिए ही था। अंत में व्याकुल होकर श्रीकृष्ण ने झोपड़ी का द्वार खटखटाया और कहा चाचा जी मैं आ गया हूं कीर्तन करो तो ऐसा करो कि भगवान स्वयं आकर तुम्हारे घर का द्वार खटखटाएं। विदुर जी ने कहा देवी द्वारिकानाथ आए हैं ऐसा लगता है। द्वार खोलने पर चतुर्भुज नारायण के दर्शन हुए। अति हर्ष के आवेश में विदुर सुलभा आसन तक ना दे सके तो प्रभु ने स्वयं अपने हाथों से दर्भासन बिछा लिया और विदुर जी को भी हाथ पकड़कर पास में बैठा लिया। ईश्वर जिस का सम्मान करता है उसका मान चिरंजीवी होता है।

भगवान ने कहा कि मैं भूखा हूं मुझे कुछ खाना दो। भक्ति में इतनी शक्ति है कि वह निष्काम भगवान को सकाम बना देती है वैसे तो भगवान को भूख नहीं लगती किंतु भक्त के कारण उन्हें खाने की इच्छा होती है। विदुर जी ने पूछा कि आपने दुर्योधन के घर भोजन नहीं किया क्या। कृष्ण ने कहा चाचा जी जिसके घर आप नहीं खाते वहां मैं भी नहीं खा सकता। ईश्वर भूखे नहीं होते ऐसा उपनिषद का सिद्धांत है। जीव रूपी पक्षी विषय रूपी फल खाता है अतः दुखी होता है। उपनिषद का यह सिद्धांत गलत नहीं है। ईश्वर नित्य आनंद स्वरुप हैं। भागवत का सिद्धांत भी सच्चा है। ईश्वर तृप्त है किंतु जब किसी भक्त का हृदय प्रेम से भर जाता है तो वह निष्काम होने पर भी सकाम बनते हैं। सगुण और निर्गुण एक है। निराकार साकार बनता है। ईश्वर प्रेम के भूखे हैं अतः ज्ञान से प्रेम श्रेष्ठ है प्रेम में ऐसी शक्ति है कि वह जड़ को भी चेतन बना देता है निष्काम को सकाम बना देता है, निराकार को साकार बना देता है वस्तु का परिवर्तन करने की शक्ति ज्ञान में नहीं प्रेम में ही है। पति पत्नी सोचने लगे कि भगवान का स्वागत कैसे करें। वे दोनों तपस्वी थे और केवल भाजी ही खाते थे। उनको संकोच हो रहा था कि कृष्ण को भाजी कैसे खिलाएं। दोनों को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था इतने में तो द्वारिकानाथ ने चूहे से भाजी का बर्तन उतार लिया और उसे खाने भी लगे। स्वादिष्टता और मिष्टता वस्तु में नहीं प्रेम में है। शत्रु की हलवा पूरी भी विश जैसी ही लगती है। भगवान को दुर्योधन के घर के मिष्ठान अच्छे नहीं लगे किंतु विदुर जी की भाजी खाई अतः लोग आज भी गाते हैं

सबसे ऊंची प्रेमसगाई।।

दुर्योधन को मेवा त्यागो साग विदुर घर पाई। जूठे फल शबरी के खाये बहु विधि प्रेम लगाई। प्रेम के बस नृप सेवा किन्हीं आप बने हरि नाई। राजसुयज्ञ युधिष्ठिर किन्हों तामें जूठ उठाई। प्रेम के बस अर्जुन राख हांक्यो भूल गये ठकुराई। ऐसी प्रीत बढ़ी बृंदावन गोपीन नाच नचाई।

सूर क्रूर इस लायक नाहीं कहँ करौं बड़ाई।।

शुकदेव जी कहने लगे राजन संग का रंग मन को भी लगता है। मनुष्य जन्म से ही भ्रष्ट नहीं होता जन्म के समय तो वह शुद्ध होता है बड़े होने पर वह जिसके संग रहता है उसी का रंग उस पर लगता है। जैसा संग होगा वैसा ही बनोगे। सत्संग से जीवन उजागर होता है और कुसंग से भ्रष्ट होता है।

सोचिए कि बालक का जब जन्म होता है तो उस समय वह निर्व्यसनी होता है उसमें ना तो कोई बुरी आदत होती है और ना तो कोई अभिमान। बड़े होने पर उसे जैसा संग मिलता है वैसा ही उसका जीवन बनने बिगड़ने लगता है। आम के वृक्ष के चारों ओर बबूल लगाओगे तो आम नही मिलेंगे। विलासी का संग होगा तो मनुष्य विलासी हो जाएगा और विरक्त का संग होगा तो विरक्त। चाहे सब कुछ बिगड़ जाए किंतु मन बुद्धि को मत बिगड़ने दो। दिल पर लगा दाग 3 जन्मों में भी शायद नहीं मिटेगा। संग का रंग मन को लगता ही है। ज्ञान, सदाचरण, भक्ति, वैराग्य आदि में जो महापुरुष तुमसे बढ़कर हो उन्हीं का आदर्श अपनी दृष्टि समक्ष रखो। रोज इच्छा करो कि भगवान शंकराचार्य सा ज्ञान, महाप्रभु जैसी भक्ति और शुकदेव जी जैसा वैराग्य मुझे भी मिले। प्रातः काल में ऋषियों को याद करने से उनके सदगुण हमारे जीवन में उतारते हैं। अपने अपने गोत्र के ऋषि को भी याद करना चाहिए आज तो लोगों को अपने गोत्र का भी नाम नहीं मालूम है। रोज गोत्र उच्चारण करो. रोज पूर्वजों का वंदन करो, हमेशा सोचते रहो कि मुझे ऋषि जैसा जीवन जीना है, ऋषि होना है, विलासी नहीं होना है। राम भी रोज वशिष्ठ जी को वंदन करते हैं, उनका सम्मान करते हैं। सांसारिक व्यवहार निभाते हुए ब्रह्म ज्ञान निभाना और भक्ति करना कठिन है। संग का असर भी खूब होता है। चोर और व्याभिचार महापाप माने गए हैं। ऐसा पाप करने वाला यदि अपना भाई भी हो तो उसे भी छोड़ दो, किसी जीव का तिरस्कार मत करो पर उसके पाप का तिरस्कार अवश्य ही करो। धृतराष्ट्र जैसे दुष्ट व्यक्ति के संग से मेरा जीवन नष्ट हो जाएगा यह सोचकर ही विदुर जी ने गृह त्याग किया था और गंगा तट पर रहकर भक्ति करते थे, भाजी खा कर ही संतुष्ट थे। इंद्रिय सुख में फंसा मनुष्य भक्ति नहीं कर सकता। आहार ऐसा करो कि जो इंद्रियों को और जीवन को स्वस्थ रखेंय़ धृतराष्ट्र ने विदुर जी के लिए वैसे तो बहुत कुछ भेजा था किंतु उन्होंने कुछ भी ग्रहण नहीं किया था। पापी के घर का कुछ भी खाया नहीं जाता अन्न दोष प्रभु के भजन कीर्तन में बाधक है। भगवान जब कृपा करते हैं तो धन संपत्ति नहीं देते किंतु सच्चे साधु का सत्संग करवा देते हैं। सत्संग ईश्वर कृपा से ही प्राप्त होता है किंतु कुसंग में ना रहना तो अपने हाथ की ही बात है, अपने बस की बात है। कुसंग का अर्थ है नास्तिक का संग,  कामी का संग। पापी का संग मत करो। आगे कथा आएगी कि विदुर जी ने धृतराष्ट्र दुर्योधन का त्याग किया और तीर्थ यात्रा करने चले गए क्योंकि वे कुसंग में नहीं रहना चाहते थे। जीव जब तक अलौकिक सुखों का त्याग नहीं करता है तब तक प्रभु को उसके प्रति दया नहीं आती। सर्वस्व का त्याग करके विदुर परमेश्वर की आराधना कर रहे थे तप कर रहे थे। तपस्या करने से पाप जलते हैं। जीव शुद्ध होता है। ग्रहस्थ का यही धर्म है कि वह वर्ष के 11 मास घर गृहस्थी में बिताए और एक माह किसी पवित्र तीर्थ स्थान में एकांत में रहकर भगवान की आराधना करे तप करें। उस समय वह भक्ति तक में ही लगा रहे अन्य प्रवृतियां छोड़ दे जो भी काम करो प्रभु के लिए ही करो तप करने से परमात्मा प्रसन्न होते हैं। तप का प्रथम चरण है जीह्वा पर अंकुश। जिस व्यक्ति की आवश्यकताएं अधिक हैं वह कभी तप नहीं कर सकता। आज कल लोग अपनी आवश्यकताएं बढ़ाते चले जा रहे हैं परिणाम यह होता है कि संपत्ति और समय का व्यय इंद्रियों को बहलाने में हो जाता है मनुष्य साधना तो करता नहीं है और ऊपर से फरियाद करता है कि भगवान दर्शन ही नहीं दे रहे हैं। भगवान सुलभ नहीं दुर्लभ हैं। विदुर जी ने परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए बड़ी भारी तपस्या की थी और तभी भगवान को दया आई कि मेरे इस भक़्त ने मेरे लिए कितने कठिन कष्ट उठाए हैं और बिना बुलाए ही विदुर जी के घर आ पहुंचे। विदुर जी का प्रेम ही ऐसा था कि उनसे कुछ मांगने की स्वयं प्रभु की इच्छा हुई। जब भगवान के हृदय में हम से कुछ मांगने की इच्छा जागे तभी समझो कि तुम्हारी भक्ति सच्ची है जहां प्रेम है वहां से मांग कर भी खाया जाता है। प्रेम हो तो कन्हैया मक्खन खाएंगे जहां प्रेम ना हो वहां से बिना मांगे मिलने पर भी खाने की इच्छा नहीं होगी। परमात्मा प्रेम के अधीन हो जाते हैं जो ईश्वर के साथ प्रेम करने की इच्छा रखता है उसे चाहिए कि वह जगत के साथ अधिक प्रेम न करे। जगत के प्रति न तो तिरस्कार करो और न उससे अधिक प्रेम करो। प्रेम करने के लिए पात्र है केवल ईश्वर। उसी से तुम अधिक से अधिक प्रेम करो। विदुर जी के घर परमात्मा का आगमन हुआ और उनकी भावना और भक्ति सफल हो गई ठाकुर जी ने उनके घर ही भाजी का भोजन किया। सत्कार्य ऐसा करो कि बिना बुलाए भी भगवान आने की इच्छा करें। मैत्री समान व्यक्तियों में होती है जो ईश्वर के समान बने तो उससे मिलने के लिए भगवान स्वयं आएंगे। प्रभु ने धृतराष्ट्र के घर का पानी तक न पिया सो कौरवों का नाश हो गया। शुकदेव राजा को कथा सुना रहे हैं दुर्योधन ने पांडवों का राज्य हड़प लिया। पांडवो को वनवास मिला। वहां से लौटने के बाद युधिष्ठिर ने राज्य का अपना हिस्सा मांगा किंतु धृतराष्ट्र और कौरवों ने हिस्सा देने से इंकार कर दिया भगवान श्री कृष्ण पांडवों की ओर से संधि कराने के लिए आए किंतु कुरूराज ने उनकी बात अनसुनी कर दी। फिर विदुर जी ने भी धृतराष्ट्र को संबोधित को समझाया। विदुर जी ने धृतराष्ट्र को जो न्याय और धर्म की बातें समझाई थी वह विदुर नीति कहलाती है। जो औरों के धन का धारण करता है वही धृतराष्ट्र है, जिसकी आंखें केवल रुपया पैसा ही देखती हैं आंखें होते हुए भी वह अंधा ही है, पापी पुत्र प्रेम रखने वाला पिता धृतराष्ट्र है। उस युग में तो शायद एक ही धृतराष्ट्र था आज तो हजारों लाखों हैं। विदुर जी धृतराष्ट्र से कहने लगे दुर्योधन पापी है वह तेरा पुत्र नहीं है किंतु तेरा पाप ही पुत्र का रूप लेकर आया है। कई बार अपना पाप ही पुत्र का रूप लेकर आता है और सताता है। शास्त्र ने कहा है कि दुराचारी पुत्र माता-पिता की दुर्गति करता है सदाचारी पुत्र माता पिता की सद्गति करता है दुराचारी पुत्र का संग छोड़ दो मान लो कि यह मेरा पुत्र नहीं है किंतु मेरा पाप ही पुत्र रूप से आया हुआ है। छोटे बच्चों को पाप का डर बताते रहने से वे मान जाएंगे, आज कल का युवक पाप का डर नहीं रखता है अतः वह मार बी खाता है। विदुर जी कहते हैं हे धृतराष्ट्र दुर्योधन दुराचारी है वह तेरे वंश का विनाश करने के लिए ही आया है। चोरी और व्याभिचार महापाप है और सभी क्षम्य हो सकते हैं किंतु यह दोनों क्षम्य नहीं हो सकते। कुछ चोर जेल की हवा खाते हैं तो कई महल की। चोर कौन है जो स्वयं परिश्रम नहीं करता और पराया धन हड़प कर जाता है वही चोर है, जिसका है उसे दिए बिना ही जो खाता है वह चोर है, किसी का कुछ भी मुफ्त में मत खाओ मेहनत किए बिना जो खाता है वह चोर है, स्थिति पात्र होने पर भी जो अतिथियों का भली-भांति सत्कार नहीं करता वह भी चोर ही है, जो अपने लिए ही पकाता है और खाता है वह भी चोर है, अग्नि को आहुति दिए बिना जो खाता है वह चोर है। मुनाफाखोर भी चोर है। सोचो कि इनमें से तुम भी किस प्रकार के चोर तो नहीं हो। धृतराष्ट्र दुर्योधन चोर है प्रभु पांडवों को ही राज सिंहासन पर बैठाएंगे क्योंकि प्रभु ने उनको अपनाया है। धर्मराज सारे अपराध क्षमा करने को तैयार है। धर्म राजा अजातशत्रु हैं। भागवत ने 2 अजातशत्रु बताए हैं एक तो धर्मराज युधिष्ठिर और दूसरे पहलाद जी।

धृतराष्ट्र तुम दुर्योधन का मोह छोड़ो। अन्यथा सारे कौरव कुल का विनाश कर होकर ही रहेगा। दुर्योधन ऐसा दुष्ट था कि द्रोपदी के सौंदर्य को देख कर जल रहा था। शंकराचार्य ने महाभारत के गीता, विष्णु सहस्त्रनाम, उद्योगपर्व और संन्सुजातपर्व इन अंगों पर टीका रची है। धृतराष्ट्र कहता है भाई तेरी बात तो सही है किंतु मेरे पास दुर्योधन के आते ही मेरा ज्ञान गायब हो जाता है। पाप का पिता है लोभ और माता है ममता। लोभ और ममता ही पाप की प्रेरणा देते हैं। सेवकों ने दुर्योधन को समाचार सुनाया कि विदुर चाचा आप के विरुद्ध बोल रहे थे दुर्योधन आग बबूला हो गया और तुरंत ही उसने विदुर चाचा को राज्यसभा में बुलाकर उनका अपमान किया। यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था कि नरक में किसे हमेशा के लिए रहना पड़ता है- आमंत्रित करके, इच्छापूर्ण, दुर्बुद्धि से किसी का अपमान करने वाले को हमेशा के लिए नर्क में रहना पड़ता है।

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