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Gita rahasya चतुर्थ स्कंध

Gita rahasya चतुर्थ स्कंध

प्रथम स्कंध में अधिकार का वर्णन किया गया है। भागवत का श्रोता कैसा होना चाहिए आदि बातें बतलाई गई हैं, दूसरे स्कंध में ज्ञान लीला बताई गई है। मृत्यु जब समीप आ गई हो तब जीव कैसा व्यवहार करें उस समय मनुष्य मात्र का क्या कर्तव्य है आदि का ज्ञान गुरु ने द्वितीय स्कंध में दिया है। पात्रता के अभाव में ज्ञान टिकता नहीं है। सुपात्र के अभाव में ज्ञान शोभा नहीं पाता है। धन और ज्ञान सुपात्र के बिना शोभा नहीं पाते हैं। जब तक ज्ञान क्रियात्मक नहीं होता तब तक वह अज्ञान जैसा ही होता है। बहुत जानने की अपेक्षा तो जितना जान लिया है उसे जीवन में उतारने का प्रयत्न करना चाहिए। ज्ञान जब तक क्रियात्मक ना बन जाए तब तक उसकी कोई कीमत नहीं होती। जब ज्ञान क्रियात्मक होता है तभी वह शांति देता है। ज्ञान को शब्द रूप ही मत रहने दो उसे क्रियात्मक बनाओ। विचार करने पर ज्ञान होता है कि ज्ञान का अंत ना कभी हुआ और ना कभी होने वाला ही है परंतु ज्ञान जब क्रियात्मक बनता है तभी शांति मिलती है। गुरु के द्वारा दिए गए ज्ञान को क्रिया में और जीवन में किस प्रकार उतारना चाहिए यह बात तीसरे स्कंध में बताई गई है। ज्ञान और क्रिया का मधुर मिलन कैसे करना चाहिए यह बात तीसरे स्कंध में बताई गई है। कपिल अर्थात जो जितेंद्रिय है वही ज्ञान को पचा सकता है। विसासी जन ज्ञान का अनुभव नहीं कर सकते। वेदांत ज्ञान का अधिकार सबको नहीं है, वेद ज्ञान का अधिकार विरक्त को ही है। वेद का संहिता भाग मंत्र रूप है। ब्राह्मण संहिता का भाष्य है। आरण्यक में उपनिषद आते हैं। अत्यंत सात्विक जीवन बिताने वाले ऋषि जो चिंतन करते हैं वह उपनिषद है। वही वेदांत है। वेद का अंत ही वेदांत है। अंत का अर्थ है समाप्ति। वेद की समाप्ति उपनिषद है। वैराग्य और संयम के अभाव में ज्ञान पचता नहीं है। उस ज्ञान को जीवन में उतार कर भक्तिमय जीवन बिताने वाले बहुत ही बिरले हैं। ज्ञान प्राप्त करना हो तो सरस्वती के किनारे रहना पड़ेगा। कर्दम होना पड़ेगा। आप कर्दम बनेंगे तो आपकी देवहूति बनेगी अर्थात यदि आप जितेंद्रिय बनेंगे तो आपकी बुद्धि निष्काम बनेगी। ज्ञान सिद्ध होगा। ज्ञान के सिद्ध होने के बाद पुरुषार्थ सिद्ध होगा अतः चौथे स्कंध में ऐसे चार पुरुषार्थ की कथा कही है। तृतीय स्कंध में सर्ग लीला थी और इस चौथे स्कंध में विसर्ग लीला है। पुरुषार्थ चार है- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। अतः चौथे स्थान में चार प्रकरण है- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म प्रकरण में 7 अध्याय हैं। सात प्रकार की शुद्धि होने पर धर्म की सिद्धि होती है। सात प्रकार की शुद्धि जिसकी होती है उसी को धर्म की सिद्धि होती है 7 सूक्तियां यह है 1.देश शुद्धि 2.काल शुद्धि 3.मंत्र सिद्धि 4.देहशुद्धि 5.विचारशुद्धि 6.इन्द्रिय शुद्धि और 7.द्रव्य शुद्धि। अर्थ प्रकरण में 5 अध्याय हैं जो यह बताता है कि अर्थ की प्राप्ति पांच साधनों से होती है। अर्थ की प्राप्ति के पांच साधन यह है 1.माता पिता के आशीर्वाद, 2.गुरु कृपा, 3.उद्यम, 4.प्रारब्ध और 5.प्रभु कृपा। इन पांच प्रकार के साधनों से ध्रुव को अर्थ की प्राप्ति हुई थी। काम प्रकरण में 11 अध्याय है यह अध्याय यह बताते हैं कि काम 11 इंद्रियों में बसा हुआ है- पांच ज्ञानेंद्रियां पांच कर्मेंद्रियां और 11वां मन। इन 11 ठिकानों में काम बसा हुआ है। रावण के दस मस्तक थे अतः रावण अर्थात काम इंद्रियों में बसा हुआ है। जो सबको आनंद देता है वह राम और जो सब को रुलाता है वह रावण। काम जीव मात्र को रुलाता है। काम मन से जाता नहीं है यही विघ्नरूप है। मन में काम आंख द्वारा प्रवेश करता है इसलिए आंखों में रावण काम को मत आने दो ।राम जैसे निर्विकारी बनोगे तो रावण अर्थात काम मरेगा। काम मिलेगा तो राम मिलेंगे। मोक्ष प्रकरण के 8 अध्याय हैं। महाप्रभु जी ने कहा है प्रकृति के आठ प्रकार हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, और अहंकार। इस अष्टधा प्रकृति को जो काबू में रखता है जो उसे मोक्ष मिलता है। जो अष्टधा प्रकृति के बंधन में से मुक्त होता है वह कृतार्थ होता है। प्रकृति पर विजय पाने वाले को मुक्ति मिलती है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, और अहंकार को काबू में रखो। प्रकृति का अर्थ है स्वभाव। अनेक जन्मों के संस्कार मन में संचित रहते हैं। बड़े-बड़े ऋषि भी प्रकृति को अर्थात स्वभाव को वश में नहीं रख सके हैं इसलिए वे बंधन में पड़े हैं। अष्टधाप्रकृति पर विजय पाने वाले को मुक्ति मिलती है। प्रकृति के बस में जो होता है वह जीव है और जो प्रकृति को बस में रखता है वह ईश्वर। श्रवण, कीर्तन और आठ प्रकार की भक्ति जिसकी सिद्ध होती है वह ईश्वर का हो जाता है। तुम भगवान जैसे ना बन सको तो कोई हर्ज नहीं मगर भगवान के तो हो कर रहो। इस प्रकार 31 अध्यायों का चौथा स्तंभ है। चार पुरुषार्थों में पहले धर्म है और अंत में मोक्ष, बीच में अर्थ और काम है। इस क्रम को लगाने में भी रहस्य है। धर्म और मोक्ष के बीच में काम और अर्थ को रखा गया है। यह क्रम यह बतलाता है कि अर्थ और काम को धर्म और मोक्ष के अनुसार प्राप्त करना है। धर्म और मोक्ष के यह दोनों पुरुषार्थ मुख्य हैं। बाकी के दोनों अर्थ और काम गौण हैं। धर्म के विरुद्ध कोई भी पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता। धर्म का हमेशा स्मरण रखो। सबसे पहला पुरुषार्थ धर्म है। धर्मानुसार ही धर्म और काम की प्राप्ति करनी है। पैसा मुख्य नहीं है धर्म ही मुख्य है। मानव जीवन में धर्म ही प्रधान है। धन से सुख नहीं मिलता, सुख मिलता है अच्छे संस्कारों से, संयम से, और सदाचार से। प्रभु भक्ति से और त्याग से सुख मिलता है। धर्म से धन कभी भी श्रेष्ठ नहीं हो सकता। धर्म इहलोक और परलोक में सुख देता है। मरने के बाद धन साथ नहीं देता धर्म ही साथ जाता है। अतः धन से धर्म श्रेष्ठ है। जब से लोग अर्थ को महत्व देने लगे हैं तब से जीवन बिगड़ गया है। स्वामी श्री शंकराचार्य ने एक जगह अर्थ का अनर्थ कहा है। जब मनुष्य धर्म को धन से विशेष समझता है तब जीवन सुधारता है। अर्थ को धर्मानुकूल रखो जो अर्थ धर्मानुकूल नहीं होता वह अनर्थ है। देश को संपत्ति की जितनी जरूरत है इससे अधिक अच्छे संस्कारों की जरूरत है। तुम अपने जीवन में धर्म को सबसे पहला स्थान दो। जीवन में जब काम सुख और अर्थ गौण बनता है तभी जीवन में दिव्यता आती है। दिव्यता का अर्थ है देवत्व। धर्म की गति सूक्ष्म है। धर्म भी अनेकों बार अधर्म बन जाता है। सद्भावना के अभाव में किया गया धर्म सफल नहीं होता। सत् का अर्थ है ईश्वर। ईश्वर का भाग जो सब में प्रत्यक्ष सिद्ध करें उसी का धर्म पूर्णता सफल होता है। मनुष्य के शत्रु बाहर नहीं है वे तो मन के अंदर ही है अंदर के शत्रुओं को मारोगे तो जगत में तुम्हारा कोई शत्रु नहीं रहेगा। धर्मक्रिया सद्भाव के बिना सफल नहीं होती। जगत के किसी भी चीज के प्रति कुभाव रखोगे तो वह जीव तुम्हारे प्रति भी कुभाव ही रखेगा। सभी क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ रुप से परमात्मा बसे हुए हैं इसलिए किसी भी चीज के प्रति कुभाव रखना ईश्वर के प्रति कुभाव रखने के बराबर है। शास्त्र में तो यहां तक कहा गया है कि किसी जीव के साथ तो क्या किसी जड़ पदार्थ के प्रति भेदभाव नहीं रखना चाहिए। कहा गया है कि जड़ पदार्थों के साथ भी प्रेम करना है। सब में सद्भाव रखो और जड़ पदार्थों के प्रति भी प्रेम रखो। मनुष्य में जब स्वार्थ बुद्धि जागती है तब वह दूसरे का विनाश करने के लिए तत्पर होता है। तुम यदि दूसरों के प्रति कुभाव रखोगे तो उसके मन में भी तुम्हारे प्रति कुभाव जागेगा। इस पर विचार करने योग्य एक दृष्टांत है। एक देश में वहां के राजा और नगर सेठ गाढ़ मित्र थे ।दोनों सत्संग करते थे, दोनों का एक दूसरे पर खूब प्रेम था। उस बनिए का व्यापार चंदन की लकड़ी बेचने का था। सेठ का धंधा अच्छा नहीं चल रहा था, चार-पांच साल तक घाटा हुआ आखिर मुनीम जी ने बताया कि अब तो लकड़ी में दीमक लग गई, बिका हुआ माल कोई लेता नहीं है। यदि इस साल में पूरे प्रमाण में चंदन नहीं बिकेगा तो व्यापार ठप हो जाएगा। अब चंदन जैसी कीमती लकड़ी ज्यादा प्रमाण में राजा के सिवा और कौन लेता। स्वार्थ मनुष्य को पागल बना देता है। मनुष्य मन में जब स्वार्थ जागता है तब वह दूसरे का विनाश करने को भी तैयार हो जाता है। दूसरे का नुकसान करने वाले को कभी फायदा नहीं होता। मनुष्य के हृदय में जब स्वार्थ जागता है तब विवेक नहीं रहता। प्रत्येक मनुष्य के हृदय में स्वार्थ तो रहता ही है मगर उसमें विवेक तो रखना ही चाहिए। जिसे बोलने में शर्म आए ऐसा सोचना भी नहीं चाहिए। नगर सेठ ने सोचा कि इस राजा को कुछ हो जाए तो बहुत अच्छा हो, वह मर जाएगा तो उसको जलाने के लिए चंदन की लकड़ी की जरूरत पड़ेगी इस प्रकार मेरा सारा चंदन बिक जाएगा और व्यापार ठीक चलेगा। इस तरह सेठ के मन में राजा के प्रति कुभाव उत्पन्न हुआ दूसरी ओर राजा के मन में सेठ के प्रति कुभाव जागा। उस दिन जब राजा से मिलने के लिए सेठ आया तब राजा के मन में विचार उत्पन्न हुआ कि यह सेठ निसंतान है यदि यह मर जाए तो उसका सारा धन राज्यभंडार में आ जाए। रोज के नियमानुसार सत्संग हुआ तो सही मगर किसी को आनंद नहीं आया। दो-तीन दिन के बाद राजा के मन में विचार पैदा हुआ कि जो पहले कभी नहीं उत्पन्न हुआ था ऐसा दुष्ट विचार मुझे नगर सेठ के बारे में कैसे उत्पन्न हुआ। मनुष्य पाप को मन में छुपाए रखता है जिससे उसका जीवन बिगड़ता है। राजा ने सारी हकीकत सेठ से कह दी। राजा ने कहा तुम्हारे बारे में मेरे मन में बुरे विचार कभी नहीं आए इसका कोई कारण मेरी समझ में नहीं आ रहा है क्या तुमने भी मेरे बारे में कुछ बुरे विचार किए थे। सेठ ने कहा कि मेरा चंदन का व्यापार चलता नहीं है। सबका पोषण करना है कोई माल लेता नहीं है सो मैंने विचार किया कि यदि आप मर जाए तो कितना अच्छा हो, आप मरेंगे तो आप को जलाने के लिए चंदन की जरूरत पड़ेगी और मेरा सारा चंदन बिक जायेगा। राजा ने सेठ को उलाहना दी कि खराब विचार तुमने क्यों किया, वैष्णव होकर ऐसे दुष्ट विचार करते हो। यह वैष्णव को शोभा नहीं देता तुम्हारे मन में ऐसा विचार क्यों ना आया कि राजा अपने महल के दरवाजे चंदन के बनवाएं और इसलिए चंदन खरीद लें। राजा ठाकुर जी के लिए चंदन का झूला बनवाएं और मेरा चंदन बिक जाए। इस प्रकार राजा का भी मन शुद्ध हो और बनिया सेठ का मन भी। इसके बाद दोनों में एक दूसरे के प्रति शुभ भावना जागी और दोनों सुखी हो गए। भाव शुद्धि सबसे बड़ा तप है। मानव जीवन तप के लिए ही है ।जगत के किसी भी जीव के प्रति बैर मत रखो। शुद्ध भावना से रहित किया गया सत्कर्म भी किसी काम का नहीं होता उससे कई बार धर्म भी अधर्म बन जाता है। सत्कर्म करने में यदि हेतु सिद्ध नहीं हो तो वह सत्कर्म भी पाप बन जाता है। दक्ष प्रजापति ने शिवजी के प्रति कुभाव रखा। उसका धर्म अधर्म में बदल गया। उसका यज्ञ ही उसको ही मारने वाला हो गया। प्रत्येक मनुष्य के प्रति सद्भाव रखने से कार्य सफल होता है। सबका कल्याण हो यही सत्य और सत्कार्य है। अनेकता में एक का दर्शन करना ही सबसे उत्तम है। एक ब्राह्मण यदि रास्ते में किसी स्त्री को देख कर उसमें लक्ष्मी की भावना करेगा तो इससे उस स्त्री में बसे हुए अंतर्यामी ईश्वर आपको आशीर्वाद देंगे जबकि एक कामी पुरुष काम भाव से उस स्त्री को देखेगा तो उस स्त्री में बसा हुआ परमात्मा उसे शाप देगा। सभी में सद्भाव रखो। यदि तुम सब में सद्भाव रखोगे तो दूसरे भी तुममें ईश्वर भाव रखेंगे। कई बार धर्म भी अधर्म बन जाता है उसका कारण यह है कि धर्म करने वाला सद्भाव नहीं रखता सब में सद्भाव रखना ही सबसे उत्तम धर्म है। सब में सद्भाव रखोगे तो सुखी होओगे। सद्भाव का अर्थ है ईश्वर का भाव। सब में जो ईश्वर का भाव रखता है वह सुखी होता है उसका धर्म भी सफल होता है। किसी भी चीज़ में कुभाव रखने वाले का धर्म सफल नहीं होता। महाभारत में हम देखते हैं कि श्री कृष्ण कई बार अधर्म करते हैं किंतु उनके मन में सबके लिए सद्भाव ही होता है इसलिए उनका अधर्म भी धर्म बन जाता है। सब में सद्भाव रखकर किया हुआ अधर्म भी धर्म बन जाता है। महाभारत के कर्ण पर्व में और द्रोण पर्व में इसी विषय के दृष्टांत मिलते हैं। कर्ण पर्व में कहा गया है कि जिस समय कर्ण अपने रथ का पहिया जमीन से निकाल रहा था और निशस्त्र था उसी समय भगवान ने अर्जुन से कहा कि तू इस कर्ण को मार दे। कर्ण कहता है युद्ध शास्त्र का नियम है कि जब शत्रु निशस्त्र हो उस समय उस पर प्रहार ना करो अतः अर्जुन को मुझ पर प्रहार नहीं करना चाहिए तब श्री कृष्ण कर्ण से कहते हैं कर्ण तुमने आज तक धर्म का कितना पालन किया है। तुमने स्वयं धर्म का पालन किया नहीं है और दूसरे को धर्म का पालन करने का उपदेश देते हो ।भरी सभा में द्रौपदी का अपमान किया गया उस समय तुम्हारा धर्म कहां गया था। इस प्रकार द्रोण पर्व में कथा आती है। द्रोणाचार्य पांडव सेना का विनाश कर रहे थे। श्रीकृष्ण ने सोचा कि यह बुड्ढा मरेगा नहीं तो अनर्थ होगा। इतने में अश्वत्थामा नाम का हाथी मारा गया। श्रीकृष्ण ने सोचा कि यदि दोनों द्रोणाचार्य को कहा जाए कि तुम्हारा पुत्र मारा गया है तो वे पुत्र शोक के कारण युद्ध बंद कर देंगे। यह सोचकर उन्होंने घोषणा करवा दी कि अश्वत्थामा मारा गया। द्रोणाचार्य ने सोचा कि बेटा तो मार दिया गया है अब युद्ध क्यों करूं परंतु यदि धर्मराज युधिष्ठिर कह दें कि अश्वत्थामा मार दिया गया है तो मैं सच मानूं। युधिष्ठिर से भगवान कहते हैं अश्वत्थामा मारा गया। युधिष्ठिर कहते हैं कि राज्य के लिए मैं असत्य कैसे बोलूं। भगवान कहते हैं कि दुर्योधन पापी है वह मरेगा तो सुखी होगा और जीवित रहेगा तो अधिक पाप करेगा और दुखी होगा। जिससे सब का कल्याण हो वही सत्य है। द्रोणाचार्य ब्राह्मण होकर भी अधर्मी दुर्योधन को सहायता कर रहे हैं। वे पाप कर रहे हैं। द्रोणाचार्य अगर युद्ध छोड़ दे तो उनसे ज्यादा अधर्म नहीं होगा इसलिए कहता हूं कि बोलो कि अश्वत्थामा हतः। भगवान ने बहुत आग्रह किया इसलिए युधिष्ठिर को बोलना पड़ा कि अश्वत्थामा हतः। असत्य बोलने का पाप ना लगे इसलिए वे उसके बाद बोले कि ‘नरो वा कुंजरो वा’ परंतु यह अंतिम शब्द किसी को सुनाई दें इससे पहले ही प्रभु ने जोर से शंखनाद कर दिया। यह शब्द किसी को सुनाई ना दिया। दक्ष प्रजापति का यशरूप धर्म शिवजी के प्रति कुभाव रखकर करने के कारण अधर्म बनकर उसको ही मारने वाला बना दूसरी तरफ श्री कृष्ण का असत्य भाषण रूप अधर्म भी सबके कल्याण के लिए किया गया होने के कारण धर्म रूप बन गया। सत्कर्म करते समय भाव शुद्ध रखो। ह्रदय शुद्ध रखो। शुद्ध भाव रखना ही सबसे बड़ा तप है इसीलिए तो सब के प्रति सद्भाव रखो, सबको सद्भाव से देखो। सद्भाव के बिना किया हुआ सत्कर्म सफल नहीं होता। मैत्रेय जी कहते हैं मनु भगवान के यहां तीन कन्याएं हुई- एक आकृति, दूसरी धरती और तीसरी प्रसूति। देवहूति की शादी कर्दम के साथ हुई थी। उसकी 9 कन्याएं हुई थी उन नौ कन्याओं का विवाह ब्रह्मार्षियों के साथ हुआ था। प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ था। यह सब कथा कह चुके हैं। इन कर्दम की कन्याओं के वंश का वर्णन करता हूं। मरीचि और कला के यहां कश्यप और पूर्णिमा नाम के दो पुत्र पैदा हुए। अत्रि की पत्नी अनुसूया के यहां दत्तात्रेय, दुर्वासा और चंद्रमा के नाम के 3 पुत्र हुए थे। वे अनुक्रम से विष्णु, शंकर और ब्रह्मा के अंश से उत्पन्न हुए थे। विदुर जी पूछते हैं कि इन सर्वश्रेष्ठ देवो ने अत्रि मुनि के यहां क्या करने की इच्छा से अवतार लिया था वह कथा कहिए। मैत्रेय जी कहते हैं दत्तात्रेय अत्रि के घर गए आए हुए हैं। पुरुष यदि स्त्री जैसा तपस्वी बने और स्त्री अनुसुइया जैसी तपस्वी नहीं बने तो आज भी उनके घर दत्तात्रय आने को तैयार है। सत्व, रज और तम। इन 3 गुणों का जो नाश करें और निर्गुणी बने वही अत्रि हैं। सत्व रज और तम इन 3 गुणों में जीव मिल गया है। इन तीनों गुणों से जीव को अलग होना है। तर्जनी कुंडली जीव भाव बताती है- अभिमान बताती है। जीभ में अभिमान प्रधान है, पांचवी उंगली सत्व गुण है। अंगूठा ब्रह्म है इसीलिए पुष्टि संप्रदाय में प्रभु को तिलक अंगूठे से लगाया जाता है। वेद में ब्रह्मा का नेति कहकर वर्णन किया गया है। इस जीव ब्रह्म का संबंध सतत होना चाहिए। इन तीन गुणों में जीव मिलता है और इन तीन गुणों को छोड़कर ब्रह्म संबंध करना है। जो त्रिगुणातीत ब्रह्म स्वरूप को प्राप्त हुआ है वह अत्रि ।है शरीर में जो तमोगुण हैं उसे रजोगुण से मारो, दूर करो। रजोगुण को सत्वगुण से मारो। रजोगुण काम और क्रोध का जनक है। सत्कर्म से सत्वगुण बढ़ता है। सत्वगुण भ बंधन कर्ता है। इसमें भी थोड़ा अहंभाव रह जाता है। अतः अंत में सत्वगुण से ही सत्वगुण को मारना है। सत्वगुण का भी त्याग करना है और निर्गुणी होना है। यदि जीव अत्रि हो तो उसकी बुद्धि अनुसूया हो। अनुसूया से रहित बुद्धि ही अनुसूया है। बुद्धि में सबसे बड़ा दोष असूया या मत्सर है। दूसरों का भला देखकर ईर्ष्या करना, जलना यही असूया या मत्सर है। दूसरों के दोषों का विचार श्री कृष्ण दर्शन में विघ्नकर्ता है। बुद्धि में जब तक असूया या मत्सर होगा तब तक ईश्वर का चिंतन नहीं कर सकेंगे। भगवान का दर्शन सबमें करना है। यदि जीव सब में ब्रह्मा का दर्शन करें तो वह कृतार्थ होता है। जिसकी बुद्धि असूयारहित होती है वही अत्रि बनता है। तत्पश्चात दत्तात्रेय पधारते हैं। जीव तीन गुणों का त्याग करके निर्गुणी बने और बुद्धि असूयारहित बने तब ईश्वर प्रकट होते हैं। प्रभु के स्मरण से बुद्धि जागृत होती है। असूया ईश्वर के मार्ग में आगे बढ़ने में रुकावट करने वाली है। असूया ज्ञान शक्ति के मार्ग में रूकावट करती है इसलिए किसी से असूया मत करो। जब बुद्धि अनसूया बनती है तब वह ईश्वर का चिंतन कर सकती है। अनसूया महान पतिव्रता है। एक बार देवर्षि नारद कैलाश में आए। शंकर समाधि में थे, पार्वती जी पूजन कर रही थी। पार्वती जी ने नारद को प्रसाद दिया नारद जी कहते हैं कि लड्डू बहुत सरस है। आज आपके हाथ का प्रसाद मिला है परंतु उस अनुसूया के घर के लड्डू आपके लड्डू से श्रेष्ठ हैं। पार्वती जी पूछती हैं कि यह अनुसूया कौन है। नारद जी कहते हैं कि आप पतिव्रता है मगर अनुसुइया महान पतिव्रता है। पार्वती के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई अनुसुइया मुझ से भी बढ़कर है। श्री शंकर जब समाधि से जागे तो पार्वती ने वंदन किया। घर के आदमी बहुत वंदना करें तो समझ लेना कि गड्ढे में उतारने की तैयारी है। शंकर ने पूछा देवी क्या बात है पार्वती ने कहा कि किसी भी प्रकार से अनुसूया का पातिव्रत्य भंग हो ऐसा करो। शिव जी कहते हैं जो दूसरों का बुरा करने की इच्छा करता है उसका ही बुरा होता है, इसमें कल्याण नहीं है देवी। परंतु तेरी इच्छा है तो प्रयत्न करूंगा। इस ओर नारदजी बैकुंठ में आए, लक्ष्मी जी से मिले उन्होंने नारद जी से पूछा कि आज इतने आनंद में क्यों है। नारद जी कहते हैं कि बैकुंठ की महिमा तो पहले थी परंतु अब तो अनुसूया के आश्रम के सिवा कहीं भी जाने की इच्छा नहीं होती। मैं उनके आश्रम से आ रहा हूं अतः अति आनंद में हूं। लक्ष्मी जी पूछती है कि यह अनुसूया है कौन। नारद जी कहते हैं कि वह तो महान पतिव्रता। लक्ष्मी जी ने श्री विष्णु से कहा कि आप कुछ ऐसा करें कि जिससे अनुसूया का पति व्रत भंग हो। पार्वती का अर्थ है बुद्धि। बुद्धि विद्या में मत्सर हैं। लक्ष्मी का अर्थ है द्रव्य। द्रव्य में ईर्ष्या अर्थात असूया रहती है। ब्रह्माणी रजोगुण है। शंकर, विष्णु, ब्रह्मा तीनों देवता चित्रकूट में एक साथ मिले। तीनों देवता अनुसूया के आश्रम में आए। भिक्षा मांगते हुए उन्होंने कहा कि हम भिक्षा मांगते हैं मगर आप नग्न होकर भिक्षा दे तो हम लेंगे। अनसूया सोचती है कि यदि नग्न होकर भिक्षा दूँगी तो मेरा पातिव्रत्य भंग होगा और अगर भिक्षा नहीं दूं तो घर आंगन में आए हुए अतिथि वापस जायेंगे तो यह महापाप होगा। मुझे पाप लगेगा। प्रभू कहते हैं कि हमें नग्न होकर भिक्षा दो। अर्थात् वे कहते हैं कि वैष्णव, मुझे वासनारहित होकर भिक्षा दो। ईश्वर को वासना रहित होकर निष्काम होकर सब कुछ अर्पण करना है। अनुसूया के मन में कोई वासना नहीं थी। सूक्ष्म वासना भी यदि मन में हो तो यह तीन देवता उसके पास नहीं आते। अनुसूया ने ध्यान किया और तीनों देवताओं पर पानी छिड़का। तीनों देव बालक बन गए। पतिव्रता में इतनी शक्ति होती है। पार्वती सोचते हैं कि शिवजी प्रातः काल के गए हैं फिर भी अभी तक आए नहीं हैं। लक्ष्मी और सावित्री भी अपने अपने पतियों को खोजने निकली है। तीनों देवियों चित्रकूट में आई, इतने में नारद जी भी वहां पहुंचे और अनुष्ठान में बैठे। देवियों ने उनसे पूछा हमारे पति का कुछ समाचार जानते हो। नाराज जी कहते हैं कि पहले यह तो बताओ कि बड़ी कौन है आप या अनुसूया। देवियां कहती है कि अनुसूया बड़ी है परंतु हमारे पति हैं कहां। नारद जी ने कहा- सुना है कि आपके पति बालक बन गए हैं। वे अनुसूया के घर में मिलेंगे। दूसरों से असूया करने वाले को शांति नहीं मिलती। देवियां डरती हैं सोचती हैं कि यदि हम वहां जाए और अनुसूया यदि शाप दे तो। नारद जी कहते हैं कि आप भले मत्सर करें परंतु अनुसूया मत्सर नहीं करेंगी। अनुसूया तो आपको सद्भाव से देखेंगी, आप के प्रति सद्भाव रखेंगी। देवियां आश्रम में आती हैं। अनुसूया ने देवताओं से अनेक प्रतिज्ञा करवाई है। आज से प्रतिज्ञा करो कि पतिव्रता को कभी कष्ट नहीं दोगे। जगत की किसी भी स्त्री को नहीं सताओगे। इतने में अत्रि ऋषि पधारते हैं। यह तीन बालक कौन है। अनुसूया कहती हैं यह तीन मेरे बालक हैं और यह 3 बालकों की स्त्रियां हैं। अत्रि ऋषि कहते हैं देवी ऐसा ना कहो यह तीन महान देवता है। इसके बाद जल छिड़का और तीनों देवता प्रकट हुए। तीनों देवता कहते हैं कि हम आपके आंगन में बालक होकर खेलते थे। वह सुख सदा के लिए आपको हम देंगे। इन तीनों देवताओं के तेज मिलकर दत्तात्रेय के रूप में प्रकट हुए हैं। जब यह जीव कुछ मांगता नहीं है तब परमात्मा उसको अपने स्वरूप का दान करते हैं। मार्गदर्शन गुरु कृपा के सिवा मिलता नहीं है। गुरु दत्तात्रेय मार्गदर्शन कराने वाले हैं इसलिए उनका जन्म मार्गशीर्ष मास में हुआ है। पहले अध्याय में कर्दम ऋषि की कन्याओं के वंश का वर्णन किया गया है। दक्ष प्रजापति और प्रसूति के यहां 16 कन्याएं हैं उनमें से 13 उन्होंने धर्म को, एक अग्नि को, एक पितृ गणों को और सोलवीं सती श्री शंकर जी को दी। धर्म की 13 पत्नियां कही गई है। उनके नाम है- श्रद्धा, दया, मैत्री, शांति, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, स्मृति, तितिक्षा, धृति और मूर्ति। धर्म के 13 ब्याह हुए हैं। इन 13 गुणों को जीवन में उतारने से धर्म जरूर फलता है। इन 13 गुणों के साथ ब्याह करोगे तो भगवान मिलेंगे। धर्म की पहली पत्नी है श्रद्धा। ईश्वर में श्रद्धा रखो। धर्म की प्रत्येक क्रिया श्रद्धा से करो, श्रद्धा दृढ़ होनी चाहिए। एक दिन नामदेव जी के पिता को कहीं बाहर जाने का प्रसंग आया। नामदेव जी उस समय छोटी उम्र के थे, घर में देव पूजा रखी हुई थी। उस पूजा का काम नामदेव को सौंप दिया गया। पिताजी ने नामदेव को पूजा की विधि समझा दी। उसी तरह नामदेव जी भगवान को दूध के प्रसाद का भोग करते हैं। भगवान दूध पीते नहीं हैं। नामदेव जी बहुत मिन्नतें करते हैं। रोज तो पिताजी के हाथ से आप भोग को स्वीकार करते हैं। आज मुझसे कोई भूल हुई है क्या। आप दूध क्यों नहीं पीते। पिताजी ने नामदेव से कहा था कि भगवान विट्ठलनाथ शर्माते हैं उन को मनाना पड़ता है। इसलिए नामदेव बहुत मनाते हैं। विट्ठलनाथ यदि आप दूध नहीं पिएंगे तो मेरे पिताजी मुझे मारेंगे। विट्ठल दूध पियो ना। पर जब सब विनती विनती व्यर्थ हो गई तो नामदेव जी मूर्ति के आगे अपना सर फोड़ने को तैयार हो गए। बोले विट्ठल दूध पीना है कि नहीं, दूध नहीं पियोगे तो मैं अपना सिर फोड़ लूंगा। भगवान, नामदेव जी की दृढ़ श्रद्धा और भक्ति देखकर प्रसन्न हुए। ज्योहिं नामदेव सिर पटकने को तैयार हुए वहां भगवान प्रकट हो गए। भगवान ने दूध का कटोरा ले लिया और दूध पीने लगे। 5 वर्ष के नाम देव भगवान को दूध पिलाते हैं। जब नामदेव को लगा कि भगवान विट्ठलनाथ सारा दूध पी जाएंगे तो उन्होंने प्रभु को जोर से आवाज दी- विट्ठल तुम तो सारा दूध पिए जा रहे हो। क्या मुझे प्रसादी नहीं दोगे। पिताजी तो मुझे रोज प्रसादी देते हैं। नामदेव का प्रेम देखकर विट्ठलनाथजी बहुत पसंद हुए। प्रभु ने नामदेव को गोद में ले लिया और दूध पिलाया। दृढ़ श्रद्धा भक्ति से प्रेम से जब भी चेतन बनता है जीव मात्र के साथ मैत्री रखो। श्रीधर स्वामी ने कहा है सबके साथ मैत्री रखना हो तो शक्य नहीं है पर यदि सब के साथ मैत्री ना हो सके तो कोई हर्ज नहीं मगर किसी के साथ वैर मत रखो। किसी से वैर ना करना भी मैत्री करने के समान है।

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