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Gita rahasya अष्टम स्कंध

Gita rahasya अष्टम स्कंध

प्रथम स्कंध में शिष्यों का अधिकार बतलाया गया है। अधिकार के बिना ज्ञान शोभा नहीं देता। अनअधिकारी मनुष्य ज्ञान का दुरुपयोग करता है। दूसरे स्कंध में ज्ञान का उपदेश किया है। वहां मनुष्य मात्र का कर्तव्य क्या है यह बताया गया है। मनुष्य जीवन भोग भोगने के लिए नहीं दिया गया है ईश्वर को आराधना करके ईश्वर को पाने के लिए मानव शरीर दिया गया है। तृतीय स्कंध में ज्ञान को जीवन में किस प्रकार उतारना है यह कथा सुनाई गई है। इस ज्ञान को जीवन में उतारने वाले के चारों पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं अतः चौथे स्कंध में चार पुरुषार्थों की कथा सुनाई गई। पांचवें स्कंध में ज्ञानी परमहंस के और भागवत परमहंस के लक्षण बताए गए। सबके स्वामी परमात्मा हैं। इसके बाद छठें स्कंध में पुष्टि का कथा आई है जीव पर परमात्मा अनुग्रह करते हैं। जीव के पास से ईश्वर कुछ नहीं मांगते। ईश्वर निरपेक्ष हैं तो भी ईश्वर जीव पर कृपा करते हैं। मनुष्य जब अपने किए हुए पापों को याद करेगा तो उसको पता लगेगा कि जो कुछ उसे मिला है उसके लिए वह योग्य नहीं है। जब जन्म हुआ तब जीव शुद्ध था पर जब उसमें समझ आई तब वह असत्य बोलने लगा। ईश्वर जीव को अनेक अवसर देते हैं और वे आशा रखते हैं कि जीव अपना जीवन सुधारेगा। भागवत कथा सुनने से लाभ नहीं होता कथा सुनकर मनन कर के उसे जीवन में उतारो। प्रभु ने हमारे लिए चिंता करने जैसा कुछ नहीं रखा, ईश्वर की जीव पर अनंत कृपा है परंतु जीव उसका उपयोग नहीं करता। पवित्र विचार करने के लिए प्रभु ने मन दिया है जो मन शक्ति का दुरुपयोग करता है वही दैत्य है। मन में शक्ति है जब जीव ईश्वर रूप में लीन होता है तब मन शक्ति का विकास होता है पर जब मन विषयों में भटकता है तब मन शक्ति का विनाश होता है। ईश्वर जीव मात्र पर कृपा करते हैं, उसकी पात्रता से अधिक उसे देते हैं। सातवें स्कंध में वासना की कथा सुनाई और बताया कि प्रहलाद की सद्भावना है मनुष्य की मिश्र वासना और हिरण्यकशिपु की असद वासना है। हिरण्यकशिपु को संपत्ति मिली और समय भी मिला परंतु इन सब का उपयोग उसने भोग विलास में किया, शक्ति का उपयोग दूसरों को दुख देने में किया। मर्यादा के बिना भोग मनुष्य को रोगी बनाता है। भोग इंद्रियों को रोगी बनाने के लिए नहीं है, इंद्रियों को निरोगी रखने के लिए भोग है। अग्नि में लकड़ियां ना डालना ही अग्नि को शांत करने का उपाय है इसी तरह इंद्रियों को भोग ना देने से इंद्रियां शांत होगी। भोग देने के बाद ऐसा लगता है इंद्रियों को शांति मिली है परंतु यह बात सत्य नहीं है उससे तो अशांति ही बढ़ती है। मुझे जो कुछ मिला है वह सिर्फ मेरे लिए ही है ऐसा मानना ही असद वासना है। परमात्मा ने मुझे जो कुछ दिया है वह सब के लिए है ऐसा सोचना ही सद्वासना है। प्रह्लाद में सद्वासना थी अतः उनको देव माना गया। हिरण्यकशिपु को उसकी असद्वासना के कारण राक्षस माना गया। हिरण्यकशिपु भोगवृत्ति, अहंकार और लोभ हैं। देव होना या ना होना यह मनुष्य के हाथों में है। जगत के सब लोग पुण्य के फल की इच्छा तो रखते हैं परंतु वे खुद पुण्य करते नहीं हैं। सदा ध्यान में रखो कि तुम्हारे कर्म के फल तुमको ही भोगने पड़ेंगे इसमें दोष किसका। अगर दांतो के नीचे आकर जीभ कट जाए तो दोष किसका। वह तो सहना ही पड़ेगा। भक्ति मार्ग में आगे बढ़ने का पहला साधन संयम है। संयम को धीरे धीरे बढ़ाओ और भोग मार्ग की ओर बहती हुई इंद्रिय शक्ति को प्रभु के मार्ग की ओर मोड़ दो। वासना का विनाश होने पर ब्रह्मभाव जागता है। जब तक मन में सूक्ष्म वासना है तब तक जीव और ईश्वर का मिलन नहीं होता। वासना ज्ञान अनुभव में विघ्नकर्ता है। वासना के विनाश के लिए आठवें स्कंध में 4 उपाय बताए गए हैं। भागवत का फल है रासलीला। जीव को कृष्ण से मिलना है। एक बार श्रीकृष्ण से मिल जाने के बाद जीव उनसे अलग नहीं हो पाता। रास में उसी को प्रवेश मिलता है जो वासना का विनाश करता है। अनेक जन्मों की वासना मन में भरी हुई है, वासना अनेक प्रकार के दुख देती है फिर भी मनुष्य उसको छोड़ता नहीं है। ईश्वर का अनुभव हुए बिना वासना जाती नहीं है। जब तक वासना में आकर्षण होगा तब तक वासना नहीं जाएगी। कुंभक को बढ़ाओगे तो वासना का विनाश होगा, प्राणों को शरीर में टिकाए रखोगे तो वासना का विनाश होगा। एक बार मन से ऐसा संकल्प करो कि मुझे परमात्मा से मिलना है। जब तो आत्माएं मिलती है तब उनके मिलन से भी अति आनंद मिलता है तो सब प्राण सूछ्म रूप से जिन परमात्मा में बसे हुए हैं उन परमात्मा से मिलते समय कितना आनंद होगा। मुझे ईश्वर से मिलना है ऐसी कामना करो। वासना को अलौकिक बनाओ। जो दुष्ट संस्कार मन को मिले हुए हैं वह दूर हो और मन को अच्छे संस्कार मिले इसलिए सत्संग जरूरी है। सत्संग से वासना उच्चतम बनेगी। वासना को अलौकिक बनाओ। मनुष्य बार-बार जैसा बोलता है और जिसका विचार करता है वैसा ही वह खुद भी बनता है। आठवें स्कंध में वासना का विनाश करने के लिए 4 उपाय बताए गए हैं। वासना का विनाश इन 4 उपायों से होता है। जब जीव ईश्वर से दूर होता है तब वासना जागती है। सतत हरि स्मरण करने की आदत डालोगे तो वासना नहीं जागेगी। ह्रदय में यदि हमेशा राम का वास होगा तो वहां कामवासना नहीं आ सकेगी। हरि स्मरण की आदत रखने से वासना का विनाश होगा। यह सब ईश्वर का है और सब के लिए है ऐसा समझोगे तो वासना का विनाश होगा। संपत्ति मेरी है ऐसा सोचने से वासना बढ़ेगी। जीव लक्ष्मी का मालिक कभी नहीं हो सकता जीव तो लक्ष्मी का पुत्र है। बालक होने से जो आनंद मिलता है वह मालिक होने से नहीं मिलता। बालक बनोगे तो सुखी होगे। सूत जी सावधान करते हैं- बलि राजा ने सर्वस्व का दान किया। विपत्ति में स्ववचन का पालन करो। चौथा उपाए है शरणागति। यदि जीव भगवान की शरण में नहीं जाएगा और भगवान का स्मरण नहीं करेगा तो वह वासना का विनाश नहीं कर सकेगा, वासना का नाश करने के बाद ही रासलीला में जाना है। धीरे धीरे राजा परीक्षित के मन की शुद्धि करके शुकदेव जी उन्हें रासलीला में ले जायेंगे। अष्टम स्कंध में मन्वंतर लीला का वर्णन है। शुकदेव जी वर्णन करते हैं हे राजन् प्रत्येक मन्वंतर मे प्रभु का जन्म होता है, प्रत्येक मनु के राज्य में प्रभु का एक विशिष्ट अवतार होता है। इस कल्प में 6 मनु हुए हैं। प्रथम स्वयांभू मनु की कथा मैंने तुम्हें सुनाई। स्वयांभू मनु की पुत्रियां आकृति और देवहूति के चरित्र की कथा मैंने सुनाई। दूसरे मन्वंतर में स्वयांभुव मनु तपस्या करने के लिए वन में गए, वहां श्री यज्ञ भगवान ने राक्षसों से उनकी रक्षा की। उन्होंने कहा है- यह सारा जगत और जगत में रहने वाले सब चर-अचर प्राणी परमात्मा में ओत-प्रोत हैं अतः संसार के किसी भी पदार्थ से मोह ना रखकर इनका त्याग करके जीवन निर्वाह के लिए जितना जरूरी है उतना ही उपभोग करना चाहिए। तृष्णा का सर्वथा त्याग करना चाहिए। इस जगत की संपत्ति किसकी है और कब किसकी हुई है। अतः हे मनुष्य! त्याग करके तुम इसका उपभोग करो अर्थात सर्व ईश्वर को अर्पण करो और अनासक्त रहकर तुम उपभोग करो। दूसरों के धन को प्राप्त करने की चेष्टा मत रखो। यह सारा जगत ईश्वर से व्याप्त है अर्थात प्रभु सर्वव्यापक है ऐसा जो मनुष्य सोचेगा वह कभी भी किसी से द्वेष नहीं करेगा। विषय में मन ना फंसे इस बात का ध्यान रखो। इस जगत के पदार्थ आज तक किसी के नहीं हुए और होंगे भी नहीं फिर भी मनुष्य उनसे ममता रखता है और उनमें अपनी आसक्ति बढ़ाता है। ऊपर बतलाया हुआ अद्वैतवाद सुंदर है। द्वैतवाद का त्याग करो। ऋषि भी मोक्ष पाने से पहले सत्कर्म करते हैं। सत्कर्म करने वाले मनुष्य ही निष्काम भाव को प्राप्त करते हैं। ईश्वर को भी कर्म करने पड़ते हैं परंतु ईश्वर किसी भी क्रम में आसक्त नहीं होते वे तो अनासक्त रहकर कर्म करते हैं। राम, कृष्ण आदि अवतारों में मनुष्यों को श्रेष्ठ आचरणों का आदर्श बतलाने के लिए भगवान ने सत्कर्म किए हैं। कर्म किए बिना नहीं चलेगा। अतः अनासक्त रहकर ही कर्म करो। तीसरे मनु हुए हैं उत्तम। प्रभु ने सत्यसेन के रूप में अवतार धारण किया था।

चौथे मन्वंतर में प्रभु का हरि के रूप में जन्म हुआ था और उन्होंने गजेंद्र की मकरग्राह से रक्षा की थी। दूसरे अध्याय से चौथे अध्याय तक गजेंद्र मोक्ष की कथा कही है। परीक्षित राजा कहते हैं कि मुझे गजेंद्र मोक्ष की कथा सुनाइए। शुकदेव जी राजा से कहते हैं- राजन, त्रिकूट पर्वत पर एक बलवान हाथी रहता था वह अनेक हथिनियों का पति था। गर्मी के दिन थे कड़ी गर्मी का मौसम था। गजेंद्र हथिनियों के साथ सरोवर में जल क्रीड़ा करने गया। हथिनियों से और बच्चों से घिरा हुआ वह आनंद विहार करने लगा। गजेंद्र जल क्रीडा में तन्मय है यह जानकर एक मगर ने उसका पांव पकड़ लिया। उस के पंजे में से छूटने के लिए हाथी ने बहुत प्रयत्न किए। हाथी स्थलचर और मगर जलचर है अतः हाथी जल में दुर्बल बन गया। मगर हाथी को छोड़ता नहीं है। गजेंद्र मोक्ष की कथा प्रत्येक घर में होती है। संसार ही सरोवर है, जीव ही गजेन्द्र है, काल ही मगर है। सरोवर के विषयों में आसक्त हुए जीव को कालका भी भान नहीं रहता। जीवमात्र गजेंद्र है। हाथी की बुद्धि स्थूल है। यदि ब्रह्मचर्य का भंग होगा तो बुद्धि जड़ होगी। हाथी अति कामी है। सिंह साल में एक ही बार ब्रह्मचर्य का पालन करता है इसलिए उसका बल कम होने पर भी वह हाथी को मार सकता है। काम क्रीडा करने वाले की बुद्धि जड होती है। यह जीवात्मा गजेंद्र त्रिकुटाचल पर्वत पर रहता है। त्रिकुटाचल शरीर है। त्रिकुटा चल का दूसरा अर्थ होता है- काम, क्रोध और लोभ। यह संसार सरोवर है। संसार में जीव काम क्रीडा करता है। संसार सरोवर में जीवात्मा स्त्री और बालकों के साथ क्रीडा करता है। जिस जिस संसार में जीव खेलता है उसी संसार में ही उसका काल नियत किया गया है। संसार में जो कामसुख का उपयोग करता है उसे काम पकड़ता है जिसको काम मारता है उसे काल भी मारता है। मनुष्य कहता है कि मैं कामसुख का उपभोग करता हूं यह बात झूठी है। काम मनुष्य का उपभोग करके उसे क्षीण करता है। इंद्रियों को जब भक्ति रस मिलता है तब वे शांत होती है। अनेक जन्मों से जीव काल को मारता चला आ रहा है। मगर और सांप को काल की उपमा दी गई है। जिस संसार में मनुष्य काम क्रीडा करता है वहां काल भी रहता है। जिस समय जन्म होता है उसी समय मरण का समय भी नियत किया जाता है। मगर ने हाथी का पांव पकड़ा था। काल जब आता है तो सबसे पहले पांव ही पकड़ता है। पांव की शक्ति क्षीण हो जाए तो मान लो कि काल ने पकड़ लिया है। पांव की शक्ति क्षीण हो जाए तो सावधान हो जाना चाहिए कि अब काल समीप आ गया है, उस समय घबराना नहीं चाहिए भगवत स्मरण में लग जाना चाहिए। जब काल आकर पकड़ेगा तब तुम्हें न पत्नी छुड़ा सकेगी और ना पुत्र ही छुड़ा सकेगा। जब काल पकड़ेगा तक कोई भी प्रयत्न काम नहीं आएगा। इस मगर ने जब हाथी को पकड़ा तब ना तो हथिनियां और बच्चे ही उसे छुड़ा सके और ना दूसरे हाथी। मनुष्य को जब काल पकड़ता है तब उसको कोई नहीं बचा सकता। पत्नी, पुत्र और संबंधी कोई भी उसे नहीं बचा सकता। काल के मुख में से वही छूटेगा जिसको परमात्मा का दर्शन होगा। काल के भी काल श्री कृष्ण के दर्शन से काल का नाश होगा। काल मगर के मुख में से तो श्रीहरि का सुदर्शन चक्र ही छुड़ा सकता है। मगर के मुख में से छूटने के लिए हाथी ने बहुत प्रयत्न किए परंतु कोई प्रयत्न काम ना आया। हथिनियों और बच्चों ने भी प्रयत्न किए परंतु कुछ काम ना आया। जब काल पकड़ता है तो कोई भी प्रयत्न काम नहीं आता। एक महीना इसी प्रकार दोनों के बीच युद्ध चलता रहा मगर हाथी को गहरे पानी में खींचता चला जा रहा है अतः अब हाथी मर जाएगा ऐसा सोचकर हथिनियां तो उसका त्याग करके चली गई। मनुष्य के जन्म से पहले उसका कोई संबंध नहीं था और ना तो मरने के बाद कोई रहेगा फिर भी जन्म और मरण दोनों के बीच में जो समय है उस समय में उसे एक दूसरे के बिना चैन नहीं आता। परंतु अंत काल में कोई भी काम नहीं आता। मनुष्य को ऐसी इच्छा रखनी चाहिए कि मेरी ऐसी हालत हो कि मुझे प्रभु के बिना चैन ना आए। गजेंद्र अब मर जाएगा ऐसा सोचकर सब उसको छोड़कर चले गए। गजेंद्र अकेला ही रह गया। मनुष्य जब अकेला हो जाता है तब जाकर ज्ञान जागृत होता है। अकेला अर्थात जब जेब में पैसा भी ना हो तब ज्ञान जागृत होता है और वह ईश्वर की शरण में जाता है। निर्बल का बल राम है। द्रौपदी ने जब तक साड़ी का आंचल पकड़ रखा था तब तक श्री कृष्ण नहीं आए। ईश्वर संपूर्ण प्रेम चाहते हैं जबकि जीव ईश्वर को थोड़ा प्रेम देता है अतः ईश्वर मदद नहीं करते। गजेंद्र निराधार हो गया, उसको यकीन हो गया कि अब मेरा कोई नहीं है। जीव जब दुख से व्याकुल होता है तब वह परमात्मा को आवाज देता है। हर रोज गजेंद्र मोक्ष का पाठ करना जरूरी है। बुड्ढा जब बीमार पड़ेगा और अधिक दिन बीमार रहेगा तो सब ऐसी इच्छा करेंगे कि अब यह बुड्ढा मर जाए तो अच्छा है। बेटा छुट्टी लेकर आया हो और बुड्ढे की बीमारी बढ़ती जाए तो वह कहेगा मैं जा रहा हूं मेरी छुट्टी खत्म हुई है, बुड्ढे को कुछ हो जाए तो खबर देना। जीव जब मृत्यु शैया पर अकेला होता है तब उसकी हालत गजेंद्र जैसी होती है। अंत काल में जीव को ज्ञान होता है परंतु तब तक वह ज्ञान उसके काम नहीं आता। मनुष्य घबराता है और सोचता है कि मैंने मरने की कोई तैयारी नहीं की है अब मेरा क्या होगा। जहां जाकर वापस आना होता है ऐसे सफर के लिए तो मनुष्य बहुत तैयारी करता है परंतु जहां जाकर वापस लौटना नहीं होता है ऐसे सफर के लिए वह कुछ भी तैयारी नहीं करता। परमात्मा को राजी करोगे तो तुम्हारा बेड़ा पार होगा। यह गजेंद्र पशु है। पशु होकर भी वह परमात्मा को आवाज देता है परंतु मनुष्य तो मृत्यु शैया पर पड़कर भी हाय हाय ही करता है पर हाय हाय करने से अब क्या मिलेगा। गजेंद्र जब अकेला हो गया तो उसको यकीन हो गया कि अब ईश्वर के सिवा मेरा कोई नहीं है। ईश्वर के आधार के बिना जीवन निराधार है। अंत में सब छोड़ कर चले जाते हैं। जिनके लिए सारे जीवन का भोग दिया वे भी छोड़ कर चले जाते हैं। अंत काल में जीव को यकीन हो जाता है कि ईश्वर के सिवा मेरा कोई नहीं। अंत काल में जीव पछताता है, हाय हाय करके उसकी जान जाती है। अंत काल में हाय हाय करके ह्रदय जलाना नहीं चाहते हो तो अभी से श्रीहरि का नाम लेना शुरू कर दो। आज से श्रीहरि का स्मरण करोगे तो अंत काल में भी श्रीहरि याद आएंगे। पशु संग्रह नहीं करता है, मनुष्य संग्रह करता है। मनुष्य आने वाली कल की चिंता करता है। काल ने पांव को पकड़ा हुआ है, यह भूलना नहीं चाहिए। पांव की शक्ति क्षीण हो जाए तो मान लेना कि मरने का समय आ गया है। जब गजेंद्र बहुत व्याकुल हो गया तब वह स्तुति करने लगा। गजेंद्र ने जो हरि की स्तुति की उसकी बड़ी महिमा है। संसारी लोगों को गजेंद्र की तरह नित्यश्री हरि की स्तुति करनी चाहिए इस तरह स्तुति करने से अज्ञान का नाश होता है और मरण सुधरता है। काल जब जीव को पकड़ने के लिए आता है तब वह प्रभु को पुकारता है कि हे नाथ आपकी शरण में मैं आया हूं। जीव जब चारों ओर से निराधार बन जाता है तब पूर्व जन्म के संस्कार से और सतकर्मो से वह प्रभु की शरण में जाता है। गजेंद्र स्तुति करता है- भिन्न-भिन्न रूपों में नाटक करने वाले अभिनेता के वास्तविक स्वरूप को जिस प्रकार साधारण दर्शक नहीं जान सकता उसी प्रकार सत्व प्रधान देवता या ऋषि भी तुम्हारे स्वरूप को नहीं जान सके तो फिर दूसरे साधारण लोग तो तुमको पहचान ही कैसे सकेंगे या तुम्हारे स्वरूप का वर्णन कैसे कर सकेंगे। ऐसे दुर्गम चरित्र वाले हे प्रभु मेरी रक्षा करो। मेरे जैसा शरणागत पशु तुल्य अविद्या ग्रस्त जीव की अविद्यारूपी फांसी को सदा के लिए काटने वाले, अत्यंत दयालु और दया करने में कभी भी देरी न करने वाले नित्य मुक्त प्रभु को मैं वंदन करता हूं। तुम्हारे अंश से सर्व जीवो के मन में तुम अंतर्यामी रूप से प्रकट हो रहे हो। सबके नियंता और अनंत ऐसे तुमको मैं वंदन करता हूं। मैं पशु हूं। काल के पाश में फंसा हुआ हूं। जरा विचार करो। जीव मात्र पशु है। सब काल के मुख में फंसे हुए हैं, मुझे काल से बचाओ। जहां काल का अस्तित्व ना हो वहां मुझे ले चलो। जहां काल है वहां दुख है। जिसके सिर पर काल है वह सुखी नहीं है। जहां काल ना हो ऐसे तुम्हारे निजधाम में ले चलो। जो लोग शरीर, पुत्र, मित्र, घर संपत्ति और स्वजनों में आसक्त हैं उनको तुम्हारी प्राप्ति होनी बहुत कठिन है क्योंकि तुम स्वयं गुणों की आसक्ति से रहित हो। जीवनमुक्त पुरुष अपने हृदय में तुम्हारा निरंतर चिंतन करते हैं। सर्व ज्ञान स्वरूप, सर्व समर्थ परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूं। नाथ इस मगर के पाश से छूटकर मैं जीने की इच्छा नहीं रखता हूं। हाथी का शरीर अंदर और बाहर दोनों ओर से अज्ञान रूप आवरण से ढका हुआ था। ऐसे शरीर को रख कर क्या फायदा। मैं तो आत्म प्रकाश को ढक देने वाले उस अज्ञान रूप आवरण से छूटना चाहता हूं जिसका कालक्रम से अपने आप नाश नहीं होता है। उस अज्ञान आवरण का तो केवल आपकी कृपा से या तत्वज्ञान से ही नाश होता है। हे नाथ मुझ पर कृपा करो। शरणागत की रक्षा करने वाले हे प्रभु मेरी रक्षा करो, मैं तुम्हारी शरण में आया हूं। गजेंद्र इस तरह दुख से आर्द्र होकर सी हरि की स्तुति करता है। बड़े-बड़े महात्मा गजेंद्र मोक्ष का पाठ करते हैं। जब काल पकड़ता है तब जीव भय से व्याकुल होकर कैसा घबराता है ऐसा सोचकर गजेंद्र जैसे आर्द्र बनकर गजेंद्र मोक्ष का पाठ करोगे तो जीवन सुधरेगा। स्तुति के एक एक श्लोक में दिव्य तेज भरा हुआ है। इस स्तुति का पाठ नित्य करोगे तो अंत काल में परमात्मा लेने के लिए आएंगे। प्रातः काल में पवित्र हो कर जो भी व्यक्ति भगवान की गजेंद्र स्तुति का पाठ करेगा उसकी बुद्धि अंतकाल में भी निर्मल रहेगी, उसे अंतकाल में भी हरि का स्मरण रहेगा। इस स्तुति का पाठ मनुष्य को संकट से मुक्त करता है। यह स्तुति दुष्ट स्वप्न के फल का नाश करती है। इस स्तुति का पाठ करने वाले को बुरे सपने नहीं सताते। यह जीव अंतकाल में घबराता है। जब वह चेतन हीन हो जाता है तब यमदूत उसे बाहर निकालते हैं। अंतकाल में जीव अतिशय दुखी होता है। ऐसे समय में ईश्वर का स्मरण हो सकना बड़ा कठिन है। ईश्वर की कृपा हो तभी उनका स्मरण हो सकता है। अतः हो सके तो प्रतिदिन गजेंद्र स्तुति का पाठ करो। हो सके तो मत्स्य अवतार चरित्र का भी पाठ करो। मध्य रात्रि को रास पंचाअध्यायी का पाठ करो। ऐसा करने से प्रभु कृपा से काम उसे नहीं सताएगा। गजेंद्र प्रार्थना कर रहा है- अब तो मुझे अविनाशी दिव्य शरीर दीजिए, यमुना महारानी की कृपा से अलौकिक शरीर के तत्व का दान मिलता है। नाथ, कृपा करके मुझे अव्यय अविनाशी तेजोमय शरीर दीजिए। नाथ, आप शीघ्र ही पधारें। हे गोविंद, हे नारायण मैं दीन हुआ हूं। काल के मुख से मुझे मुक्ति दें। जब उस गजराज को बचाने के लिए ब्रह्मा आदि कोई भी देवता ना आए तो परमात्मा को चिंता हुई। स्वयं दौड़ते हुए आए। द्वारिकानाथ निराधार के आधार हैं। अंत काल में याद करने पर तो वे दौड़ते हुए आते हैं। गजेंद्र ने भगवान को आते हुए देखा तो उसने सरोवर में से एक कमल फूल लेकर भगवान को अर्पित किया। तुलसी और कमल परमात्मा को अति प्रिय है। परमात्मा की नाभि से कमल उत्पन्न हुआ है। कमल ब्रह्मा का सर्जन नहीं है। भगवान ने इस कमल फूल को स्वीकार किया और अपने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का वध किया। ज्ञान चक्र से ही काल का नाश हो सकता है। ऐसा ज्ञान होना चाहिए कि सबमें भगवान दिखाई दें। जिसे ब्रह्म दृष्टि प्राप्त होती है वह सभी स्थान और वस्तुओं में प्रभु का ही दर्शन करता है। ब्रह्मज्ञानी तो संसार में कभी-कभी मिल जाएंगे किंतु शुकदेव जी की तरह दृष्टि वाले बहुत अल्प ही मिलेंगे। ऐसे ज्ञानी के लिए जगत बाधक नहीं है। अज्ञानी के लिए संसार बाधक है ज्ञानी को नहीं। ज्ञानी के लिए जगत् जगत् नहीं है। मनुष्य को अज्ञान की पकड़ से छूटना है। भगवान ने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ की हत्या की थी अर्थात सुदर्शन भगवान के दर्शन से काल की हत्या होगी। सर्व में भगवत दर्शन ही सुदर्शन है। जब काल पकड़ता है तो उसकी पकड़ में से काल के भी काल भगवान ही छुड़ा सकते हैं। सुदर्शन से कालरूपी मगरमच्छ का नाश हुआ। इसका एक अर्थ यही है कि तुम्हारी दृष्टि जब सुदर्शन अर्थात सभी में प्रभु का दर्शन करने वाली होगी तभी तुम काल के मुख से मुक्त होगे। तुम भी तब काल हो जीत लोगे। ऐसे ज्ञानी पुरुष का काल क्या बिगाड़ सकता है जिसके हृदय में सब के प्रति भगवत भाव जागृत हुआ है वह काल के मुख से तो मुक्त हो जाएगा। सर्व में श्री कृष्ण का दर्शन करते करते उसको अपने में भी श्रीकृष्ण का ही दर्शन होने लगता है। अपने स्वरुप में भी श्री कृष्ण का दर्शन करोगे तो काल तुम्हें मार नहीं सकेगा। शरण में आए हुए गजेंद्र का जिस प्रकार उद्धार किया उसी प्रकार शरण में जाने से सभी जीव का प्रभु उद्धार करते हैं। वह गजेंद्र अपने पूर्व जन्म में इन्द्रद्युम्न नाम का राजा था। वह ध्यान में बैठा हुआ था कि वहां अगस्त्यमुनि आए। राजा ने उठकर उनका स्वागत नहीं किया तो मुनि को यह व्यवहार अपमानजनक लगा। भगवान से भी अधिक उनके भक्तों का सम्मान किया जाए। पत्थर की मूर्ति के प्रति सद्भाव रखने से वह चेतनमयी होती है तो चेतन के प्रति सद्भाव रखने से ईश्वर की प्राप्ति क्यों नहीं होगी। अगस्त्यमुनि को बुरा लगा तो उन्होंने शाप दिया चूंकि मेरे आने पर भी तू जड सा ही बैठा रहा अतः अगले जन्म में तुझे पशु का अवतार प्राप्त होगा। पूर्व जन्म में गजेंद्र ने बहुत भक्ति की थी, अतः गजेंद्र योनि में भी उसे अंतकाल में प्रभु का स्मरण हुआ और फलतः उसका उद्धार हुआ। जो भी संस्कार मन में दृढ़ होकर जम जाते हैं वे अंत काल में और अगले जन्म में भी काम आते हैं। ठाकुर जी का पहले स्वप्न में अनुभव होता है। गोपाल सहस्त्रनामावलि में भगवान का एक नाम है- ‘भक्तानाम् स्वप्नवर्धना’। भगवान ने गजेंद्र को सारूप्य मुक्ति दी अपने ही जैसा रूप दिया। गजेंद्र की भांति तुम भी दीनता और व्याकुलता से गजेंद्र स्तुति का पाठ करो। अंतकाल में ठाकुरजी गजेंद्र की भांति तुम्हें भी लेने के लिए आएंगे। छठे अर्थात चाक्षुष मन्वंतर में समुद्र में से जो अमृत मिला उसे भगवान ने देवों को पिलाया। इस मन्वंतर में भगवान ने अजीत नाम से अवतार लिया था। समुद्र मंथन करके अमृत निकाला। स्वयं विष्णु ने की कच्छप रूप धारण करके मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया। परीक्षित राजा ने पूछा भगवान ने समुद्र मंथन कैसे किया। कच्छप रूप लेकर मंदरांचल को अपनी पीठ पर क्यों धारण किया, उन्होंने देवताओं को कैसे अमृत पिलाया। इस समुद्र मंथन की कथा कृपया मुझे भी तो सुनाइए। शुकदेव जी वर्णन करते हैं- एक बार इंद्र इधर उधर घूम रहा था कि मार्ग में ऋषि दुर्वासा मिल गए। दुर्वासा ने इंद्र को पुष्प माला अर्पित की। साधु ऋषि जब कुछ देते हैं तो सद्भाव पूर्वक देते हैं उसे इंकार ना करके आदर से ग्रहण करना चाहिए। इंद्र संपत्ति के मद से विवेक भ्रष्ट हो गया था। उसने माला हाथी की सूंड पर फेंक दी और हाथी उसे पांव से कुचलने लगा। दुर्वासा ने सोचा कि इंद्र मेरा और पुष्प वासी लक्ष्मी का अपमान कर रहा है तो उन्होंने इंद्र को शाप दिया- ‘तू दरिद्र होगा’। संपत्ति के मद से विवेक भ्रष्ट हुआ व्यक्ति दरिद्र हुए बिना फिर विवेकी नहीं बन पाता। इंद्र दरिद्र हो गया और स्वर्ग का राज्य दैत्यों को मिल गया। देवगण ने भगवान का आसरा लेकर भगवान से प्रार्थना की कुछ ऐसा उपाय करें जिससे हमें स्वर्ग का राज्य वापस मिल जाए। भगवान ने समुद्र मंथन करने की आज्ञा दी और कहा कि इससे प्राप्त होने वाला अमृत पिला कर तुम्हें अमर बनाऊंगा। यह काम कोई आसान नहीं है, इस काम में शत्रुओं का भी साथ लेना अन्यथा वे बाधा उपस्थित करते रहेंगे। दैत्यों के साथ मैत्री करके उनकी प्रशंसा करना, वे अभिमानी है अतः अपनी प्रशंसा सुनकर वे मित्र बन जाएंगे। जिसे ज्ञान रूपी, भक्ति रूपी अमृत मिलता है वह अमर हो जाता है। देव और दैत्य अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन करने लगे। मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकि नाग को रस्सा बनाया गया। संसार ही समुद्र है। अपने जीवन का मंथन करो। समुद्र मंथन जीवन का ही तो मंथन है। संसार समुद्र का मंथन करके ज्ञान और भक्ति रूपी अमृत प्राप्त करना है। ज्ञान और भक्ति रूपी अमृत का पान करने वाला अमर हो जाता है। मन को मंदराचल पर्वत की भांति स्थिर करो। मन ही मन मंदराचल पर्वत है और प्रेमडोर ही वासुकि नाग है।

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