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Essay on increasing culture and decreasing forest in hindi. बढ़ती सभ्यता घटते वन या बढ़ती सभ्यता सिकुड़ते वन पर निबंध

आधुनिक समाज तेजी से प्रगति कर रहा है। समाज में मानव सभ्यता, आर्थिक और राजनीतिक विकास की दृष्टि से दिनोंदिन वृद्धि करती जा रही है वहीं दूसरी ओर सिकुड़ते हुए वन, जंगल और रहने के लिए जगह इसके साथ ही साथ बाग-बगीचों के लिए स्थान की कमीं लगातार बढ़ रही है।

बढ़ती हुई सभ्यता मानव समाज की बाह्य और भौतिक उपलब्धियों की मापक है। लेकिन सिकुड़ते हुए वन सामूहिक आयाम में खिंचाव के परिचायक हैं। एक और विनम्रता और कुलीनता की ओर समाज का झुकाव बढ़ती हुई सभ्यता कहलाता है तो दूसरी ओर प्रकाश किरणों का अवरोध सिकुड़ते वन की संज्ञा है।

विश्व सभ्यता आज प्रगति की दिशा में तेजी से बढ़ती चली जा रही है। गांव और नगरों का रूप परिवर्तन हो रहा है। शहर हाईटेक सिटी बन रहे हैं तो गांव भी शहरों की तरह चकाचौंध किए जा रहे हैं। विद्युत का प्रकाश सभी जगह व्याप्त हो चुका है। परिवहन साधनों का तेजी से विकास हो रहा है। यह सभी परिवहन साधन समय की बचत कर रहे हैं। यातायात के अनेक साधन उपलब्ध हो चुके हैं। निवास के लिए अच्छा मकान, पहनने के लिए ऋतु के अनुकूल वस्त्र तथा खाने के लिए स्वाद अनुसार भोजन आसानी से उपलब्ध हो रहा है। चारों तरफ मोबाइल के टावर लग रहे हैं, देश में उद्योगों का तेजी से विकास हो रहा है। भौतिक उपलब्धियां राष्ट्र की सुख समृद्धि की कुंजी सिद्ध हो रही हैं।

बढ़ती शिक्षा ने मानव के सुसंस्कृत भाव को जागृत किया है। नारी परदे से बाहर निकलकर प्रगतिशील बनकर पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। इस प्रकार नगरीय सभ्यता तो बढ़ रही है लेकिन वन और जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरी करने के लिए जंगलों को तेजी से काटा जा रहा है। भवनों के निर्माण के लिए अतिरिक्त भूमि चाहिए, यह भूमि शांतवन प्रदेश से ही प्राप्त हो सकती है। फर्नीचर और ऊर्जा की आवश्यकता के लिए भी पेड़ों को काटा जा रहा है।  कटते हुए पेड़ इमारती लकड़ी और ईंधन का अकाल उत्पन्न कर रहे हैं। कटते वनों से देश की हरियाली घट रही है, मरुस्थल का फैलाव बढ़ रहा है। वन मिट्टी के कटाव को रोकते हैं। मिट्टी का कटाव अब कम मात्रा में रुकता है। मैदानी वनों के कारण हवा का वेग उठता था और पहाड़ी वनों के कारण वर्षा होती थी और वर्षा-जल का प्रभाव कम होता था, वह सिकुड़ते वनों के कारण अप्रभावित रहने लगे।

सिकुड़ते हुए वनों का ही प्रभाव है कि कागज निर्माण के लिए बांस की लकड़ी और घास की कमी पड़ने लगी है और देश में कागज की कमी हो गई है। फलता विदेशों से कागज आयात करने के लिए सरकार को बाध्य होना पड़ा। हालांकि आजकल मोबाइल फोन और एंड्रॉयड फोन के द्वारा दुनिया डिजिटल बनती जा रही है जिससे कागज के प्रयोग में भविष्य में कमी ही देखने को मिलेगी। लेकिन वनों से जो जड़ी बूटियां मिलती है जिनसे दवाई बनती है, अगर वह इसी तरह काटे जाते रहे तो ये दवाएं हमें मिलना मुश्किल होगी।

इसके अलावा धरती के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। कई जगह सूखा और अकाल पड़ रहा है। वन वर्षा के निमंत्रणदाता तथा नियंत्रक होते हैं। सिकुड़ते होते हुए वन वर्षा का निमंत्रण वापस ले लेते हैं और नियंत्रण खो देते हैं। परिणामतः वर्षा के अभाव में देश कहीं सूखे से पीड़ित होता है तो कहीं अनियंत्रित और असामायिक वर्षा खेती को चौपट कर देती है।

सिकुड़ते वन का मतलब है सामूहिक आयामों में खिंचाव। विकासशील सभ्यता का यह दुर्गुण सामूहिक मान्यताओं को चारों ओर से तोड़ने में लगा हुआ है। समाज जाति-उपजाति तथा उनके वर्गों में विभक्त होता जा रहा है। धार्मिक दंगे और विद्रोह इसी का परिणाम है। एक ओर देश आर्थिक प्रगति और विकास की ओर बढ़ रहा है दूसरी ओर गरीबी की रेखा के नीचे गिरते जाने वाली जनसंख्या का प्रतिशत बढ़ रहा है। एक और दुष्परिणाम सामने आया कि स्वदेश का धनिक वर्ग शक्तिशाली होता गया उसने ना केवल अर्थतंत्र अपितु शासन पर भी अपना कब्जा जमा रखा है। शासकीय वाहनों और नौकरशाही की दलीलों ने उसका औचित्य सिद्ध करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी।

इस प्रकार देश का शोषण जीवन मूल्यों के प्रकाश की खोज में भटक रहा है। आज समाज में सभ्यता के पर्याय विनम्रता, सुशीलता और कुलीनता बढ़ रही है तो दूसरी ओर व्यक्ति बोध के अंकुर, अहम का झूठा अभिमान, परंपराओं और मान्यताओं के प्रति विकर्षण बढ़ाकर जीवन के लाल हाथे बाग-बगीचे हरियाली प्रदाता वनों तथा सामूहिक पारिवारिकता को सिकुड़ता-सिमटने के लिए विवश कर रहा है।

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