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Essay on disarmament in Hindi

Essay on disarmament in hindi

‘नि: या निर्’ उपसर्ग और ‘शस्त्रीकरण’ शब्द, इन दो के मेल से बना है-नि:शस्त्रीकरण। ‘नि: या निर्’ उपसर्ग का अर्थ है-रहित, बिना। ‘शस्त्रीकरण’ का अर्थ है शस्त्र बनाना या रखना। दोनों को मिलाकर अर्थ है-शस्त्रों को न बनाना और न ही रखना। अर्थात् मानव जाति की सुख-समृद्धि और शान्ति की रक्षा के लिए एक ऐसे संसार की रचना करना, जिस में न तो शस्त्रास्त्रों के निर्माण की आवश्यकता ही रह जाए और न बनाए ही जाएँ। शस्त्र रहेंगे या बनाये जाते रहेंगे, तो उनका प्रयोग भी होगा। जो धन भयावह शस्त्रास्त्रों के निर्माण और रख-रखाव के लिए, उन्हें प्रयुक्त करने वाले सैनिकों तथा उपकरणों आदि पर खर्च किया जाता है, क्यों न उसका खर्च शांति कार्यों एवं मानव जाति की सुख-समृद्धि के लिए किया जाए, इसी प्रकार की मूल भावनाओं को आधार बनाकर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व नि:शस्त्रीकरण की भावना ने जन्म लिया।

सन् 1946 ई. में अमेरिका, ब्रिटेन, सोवियत रूस ने मिलकर नि:शस्त्रीकरण की योजना तैयार की। सन् 1948 ई. में संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस योजना पर विचार कर बहुमत से इसे स्वीकार कर लिया। रूस ने एक संशोधन यह प्रस्तुत किया कि सबसे पहले आणविक शस्त्रास्त्रों पर प्रतिबंध लगाया जाए और उन पर नियन्त्रण लगाने का कार्य भी साथ ही आरम्भ किया जाए। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में एक नि:शस्त्रीकरण आयोग भी स्थापित किया गया। अनेक बैठकें होने के बावजूद भी नि:शस्त्रीकरण की प्रक्रिया कुछ विशेष फलितार्थ न हो सकी। लेकिन सन् 1955 में सोवियत रूस ने जब अपनी सेना में सात लाख सैनिक कम करने की एकतरफा घोषणा की, तब इस भावना से विस्तार की आशा बँधी। 1957 में हुए अधिवेशन में अमेरिका ने वारसा संधि के देशों में हवाई निरोक्षण करने का प्रस्ताव रखा। ‘नाटो परिषद् ने भी नि:शस्त्रीकरण का महत्व समझ इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री प. नेहरू ने भी देश-विदेश की यात्राएँ करके नि:शस्त्रीकरण की भावना के विस्तार के लिए विशेष प्रयास किया पर कुछ विशेष परिणाम न निकल सका।

सन् 1962 में सोवियत रूस से संयुक्त राष्ट्र संघ में रखे प्रस्ताव से 18 राष्ट्रों की एक नि:शस्त्रीकरण समिति बनाई गई। 1963 में इस सम्बन्ध में जिनेवा-अधिवेशन हुआ, पर परिणाम फिर भी ठस ही रहा। सभी महाशक्तियां अपना हाथ ऊपर जो रखना चाहती थीं। बाद में 25 जुलाई 1963 को अमेरिका, ब्रिटेन और रूस ने ‘ अणु परीक्षण प्रतिबन्ध संधि पर हस्ताक्षर कर दिए, फिर भी नि:शस्त्रीकरण की दिशा में वास्तविक एवं व्यावहारिक कदम नहीं उठाया जा सका। सन् 1968 ई. में हुई ‘परमाणु शक्ति निरोध सन्धि’ पर लगभग 61 राष्ट्रों ने ही हस्ताक्षर कर नि:शस्त्रीकरण की दिशा में व्यावहारिक कदम उठाया। इसके बाद सन् 1970-78 के बीच के कई सम्मेलन होने पर भी परिणाम ढाक के तीन पात रहा। इतना ही नहीं सन् 1978 में अमेरिका द्वारा न्यूटॉन बम की घोषणा करने के कारण जिनेवा में होने वाला नि:शस्त्रीकरण बेकार होकर रह गया। बाद में सन् 1987 तक अमेरिका के सभी राष्ट्रपति इस प्रक्रिया का खुला विरोध करते रहे।

भारत की मान्यता अणु-अस्त्र-निरोध और नि:शस्त्रीकरण के प्रश्न को लेकर आरम्भ से ही यह रही कि छोटे-बड़े सभी देश समान दृष्टि से देखे जाएँ। पहले अणु-शक्ति प्राप्त राष्ट्र अपने भण्डार नष्ट करें, स्वयं परीक्षण आदि बन्द करें, तब अन्य एवं नव स्वतंत्रता प्राप्त विकासशील राष्ट्रों पर यह प्रक्रिया अपनाने का दबाव डालें। लेकिन अमेरिका स्वयं तो सभी तरह के शस्त्रास्त्र निर्माण का अधिकार सुरक्षित रखना चाहता था और है, जबकि वह चाहता है कि अन्य राष्ट्र ऐसा न करें। इसी कारण सन् 1988 में संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में 159 देशों के प्रतिनिधियों के निरन्तर प्रयत्नशील रहने पर भी नि:शस्त्रीकरण सम्बन्धी प्रस्ताव पारित करा पाना संभव न हो सका। भारत आदि देशों ने इसी कारण उस सन्धि पर हस्ताक्षर न कर अपने पास यह अधिकार संरक्षित रखा हुआ है कि आवश्यकता पड़ने पर वह स्वरक्षा के लिए अणु शस्त्र निर्माण करने को स्वतंत्र है। सोवियत संघ के विघटन के बाद अब उच्च शक्ति प्राप्त राष्ट्र केवल अमेरिका ही रह गया है, सो वह अब भी छोटे तथा विकासशील राष्ट्रों पर तरह-तरह के दबाव डालता रहा है कि वे नि:शस्त्रीकरण एवं अणु निरोध सन्धि पर हस्ताक्षर अवश्य कर दें, वह स्वयं कुछ भी क्यों न करता रहे।

नि:शस्त्रीकरण निश्चय ही आज की दुनिया के वर्तमान और भविष्य की रक्षा के लिए बहुत आवश्यक है, एक बहुत ही सुलझा हुआ विचार और प्रस्ताव है। लेकिन इसके साथ अमेरिका के हठ के कारण जो एकांगिता या एकपक्षीयता का प्रसंग जुड़ गया है। निश्चय ही उसे न तो सुखद ही कहा जा सकता है और न भविष्य के लिए शुभ ही। जब तक पूर्व सोवियत रूस की तरह अमेरिका भी स्वेच्छा से नि:शस्त्रीकरण एवं अणु-अस्त्र निरोध की घोषणा नहीं कर देता, तब तक इस दिशा में विश्व राष्ट्रों को आगे बढ़ पाना कतई संभव प्रतीत नहीं होता। अमेरिका वास्तव में ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ वाली उक्ति को ही चरितार्थ कर रहा है, क्योंकि अभी तक धन और बल दोनों पर और इस कारण संयुक्त राष्ट्र संघ पर भी अमेरिका का वर्चस्व है, इस कारण उसको हठ भी उजागर है। अत: आवश्यकता इस बात की है कि भारत जैसे अन्य राष्ट्र भी अपने आप को प्रत्येक क्षेत्र में अमेरिका को चुनौती दे पाने में समर्थ बना लें। तभी नि:शस्त्रीकरण जैसी उदात्त और उदार भावना का सक्रिय स्वरूपाकार दिया जा सकेगा।

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